Friday, July 1, 2011

तुम्हारे सवाल...

तुम्हारे सवाल...

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न तो सवाल बनी तुम्हारे लिए कभी
न ही कोई सवाल की तुमसे कभी,
फिर क्यों हर लम्हों का हिसाब माँगते?
फिर क्यों उगते हैं नए-नए सवाल तुममें?

कहाँ से लाऊँ उनके जवाब
जिसे मैंने सोचा ही नहीं,
कैसे दूँ उन लम्हों का जवाब
जिन्हें मैंने जिया ही नहीं|

मेरे माथे की शिकन की वजह पूछते हो
मेरे हर आँसुओं का सबब पूछते हो,
अपने साँसों की रफ्तार का जवाब कैसे दूँ?
अपने हर गुज़रते लम्हों का हिसाब कैसे दूँ?

तुम्हारे बेधते शब्दों से
आहत मन के आँसुओं का क्या जवाब दूँ?
तुम्हारी कुरेदती नज़रों से
छलनी वज़ूद का क्या जवाब दूँ?

बिन जवाबों के तुम मेरी औकात बताते हो
बिन जवाबों के तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं अपनाती हूँ,
फ़िर क्या बताऊँ कि कितना चुभता है तुम्हारा ये अनुत्तरित प्रश्न
फ़िर क्या बताऊँ कि कितना टूटता है तुम्हारे सवालिया आँखों से मेरा मन|

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 10, 2008)

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6 comments:

sushma 'आहुति' said...

bhut hi sunder abhivakti....

sushma 'आहुति' said...

such me in sawalo ke jawab kaha sa laaye.... bhut hi acchi rachna....

रश्मि प्रभा... said...

मेरे माथे की शिकन की वजह पूछते हो
मेरे हर आंसुओं का सबब पूछते हो,
अपने साँसों की रफ्तारी का जवाब कैसे दूँ?
अपने हर गुज़रते लम्हों का हिसाब कैसे दूँ?
waah

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया जेन्नी शबनम जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

कैसे दूं उन लम्हों का जवाब
जिन्हें मैंने जिया हीं नहीं

भावनाओंका एक ज्वार-सा है आपकी कविता तुम्हारे सवाल... में …

नारी स्वर के ये भाव पत्थर को पिघलाने में भी सक्षम हो सकते हैं

संपूर्ण हृदय से शुभकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

Mukesh Kumar Sinha said...

kyun sawalo me tum gumm hote ja rahe ho! har ek ki apni identity hai..:)
waise
बिन जवाबों के तुम मेरी औकात बताते हो
बिन जवाबों के तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं अपनाती हूँ,
फ़िर क्या बताऊँ कि कितना चुभता है तुम्हारा ये अनुत्तरित प्रश्न
sach me ye hai anutarit prashn..

सहज साहित्य said...

तुम्हारे सवाल कविता एक दर्द भरा बयान है- कहाँ से लाऊं उनके जवाब
जिसे मैंने सोचा हीं नहीं,
कैसे दूँ उन लम्हों का जवाब
जिन्हें मैंने जिया हीं नहीं|
-आपने सही कहा है जिन पलों को हम जी भी नहीं पाते ,उनका उत्तरकभी नहीं दिया जा सकता है।
"तुम्हारे बेधते शब्दों से
आहत मन के आंसुओं का क्या जवाब दूँ?
तुम्हारी कुरेदती नज़रों से
छलनी वज़ूद का क्या जवाब दूँ?" जो व्यक्ति घनीभूत पीड़ झेलता है वह अन्तत: मूक होकर रह जाता है। क्योंकि सामने वाला समझने की स्थिति में नहीं होता। बहुत आत्मसंघर्ष से भरी कविता है । बस क्या कहूँ और शब्द अवरुद्ध हैं !