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रविवार, 27 अक्टूबर 2019

635. दिवाली (दिवाली पर 7 हाइकु) पुस्तक - 112

दिवाली 
(दिवाली पर 7 हाइकु)   

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1.   
सुख समृद्धि   
हर घर पहुँचे   
दीये कहते।   

2.   
मन से देता   
सकारात्मक ऊर्जा   
माटी का दीया।   

3.   
दीयों की जोत   
दसों दिशा उर्जित   
मन हर्षित।   

4.   
अमा की रात   
जगमगाते दीप   
ज्यों हो पूर्णिमा।   

5.   
धरा ने ओढ़ा   
रोशनी का लिहाफ़   
जलते दीये।   

6.   
दिवाली दिन   
सजावट घर-घर   
फैला उजास।   

7.   
बंदनवार   
स्वागत व सत्कार   
लक्ष्मी प्रसन्न।   

- जेन्नी शबनम (26. 10. 2010)   
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बुधवार, 7 नवंबर 2018

592. रंगीली दिवाली (दिवाली पर 10 हाइकु) पुस्तक 98,99

रंगीली दिवाली

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1.
छबीला दीया
ये रंगीली दीवाली
बिखेरे छटा। 

2.
साँझ के दीप
अँधेरे से लड़ते
वीर सिपाही।

3.
दीये नाचते
ये गुलाबी मौसम
ख़ूब सुहाते। 

4.
झूमती धरा
अमावस की रात
ख़ूब सुहाती। 

5.
दीप-शिखाएँ
जगमग चमके
दीप मालाएँ। 

6.
धूम धड़ाका
बेज़बान है डरा
चीखे पटाखा। 

7.
ज्योति फैलाता
नन्हा बना सूरज
दिवाली रात। 

8.
धरा ने ओढ़ी
जुगनुओं की चुन्नी
रात है खिली। 

9.
सत्य की जीत
दीवाली देती सीख
समझो जरा। 

10.
पेट है भूखा
ग़रीब की कुटिया,
कैसी दिवाली?

- जेन्ना शबनम (7. 11. 2018)
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बुधवार, 10 नवंबर 2010

187. आदमी और जानवर की बात

आदमी और जानवर की बात

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रौशन शहर, चहकते लोग
आदमी की भीड़, अपार शोर
शुभ आगमन की तैयारी पूरी
रात्रि पहर घर आएगी समृद्धि 

पर जाने क्या हुआ कल रात
वे रोते-भौंकते रहे, सारी रात
बेदम होते रहे, कौन समझे उनकी बात
आदमी तो नहीं, जो कह सकें अपनी बात 

कल के दिन न मिले, कोई अशुभ सन्देश
शुभ दिन में श्वान का रोना, है अशुभ संकेत
पास की कोठी का मालिक झल्लाता रहा पूरी रात
जाने कैसी विपत्ति आए, हे प्रभु! करना तुम निदान 

पेट के लिए हो जाए, आज का कुछ तो जुगाड़
सुबह से सब शांत, वे निकल पड़े लिए आस
कोठी का मालिक अब जाकर हुआ संतुष्ट
शायद आपदा किसी और के लिए, है बड़ा ख़ुश 

अमावास की रात, सजी दीपों की क़तार
हर तरफ़ पटाखों की गूँजती आवाज़
भय से आक्रान्त, वे लगे चीखने-भौंकने
नहीं समझ, वे किससे अपना डर कहें 

जा दुबके, उसी बुढ़िया के बिस्तर में
जहाँ वे मिल-बाँट खाते-सोते वर्षों से
दुलार से रोज़ उनको सहलाती थी बुढ़िया
सुन पटाखे की तेज गूँज, कल ही मर गई थी बुढ़िया 

कौन आज उनको चुप कराए
कौन आज कुछ भी खाने को दे
आज कचरा भी तो नहीं कहीं
ख़ाली पेट, चलो आज यूँ ही सही 

ममतामयी हाथ कल से निढाल पसरा
ख़ौफ़ है और उस खोह में मातम पसरा
आदमी नहीं, वह थी उनकी-सी ही उनकी जात
वह समझती थी, आदमी और जानवर की बात 

जब कोई पत्थर मारकर उनको करता ज़ख़्मी
एक दो पत्थर खाकर पगली बुढ़िया उनको बचाती
अब तो सब ख़त्म
कल ले जाएँगे यहाँ से आदमी उसको
वे मरें, तो जहाँ फेंकते उनको 
वहाँ कल फेंक देंगे बुढ़िया को 

- जेन्नी शबनम (5. 11. 2010)
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