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मंगलवार, 25 मई 2021

721. इश्क़ (10 क्षणिका)

श्क़ 

******* 

1.
इश्क़ एक सपना 
*** 
इश्क़ एक सपना   
टूटकर जुड़ता   
बेचैन करवटों में   
हर बार नया फिर से पलता   
मगर रह जाता   
सपना-सा सदा अधूरा। 
______________ 

2. 
इश्क़ एक तलवार
***
इश्क़ एक तलवार   
गर म्यान से बाहर   
एक झटका   
धड़ बदन से ग़ायब   
इश्क़-तलवार   
मन-म्यान के अन्दर। 
_________________ 

3. 
इश्क़ जैसे आँधी 
***
इश्क़ जैसे एक आँधी   
तूफ़ान की तरह आततायी   
सब मटियामेट   
ज़िन्दगी भी और दुनिया भी। 
____________________ 

4. 
इश्क़ जैसे सूरज
***
इश्क़ जैसे सूरज   
जीवन देता और ताप भी   
जिसके माप का पैमाना है 
मगर पकड़ से बाहर   
वो है तो जीवन है   
वो नहीं तो दुनिया नहीं। 
_________________ 

5. 
इश्क़ की दुनिया 
***
इश्क़ की दुनिया गज़ब की   
मिलना-बिछड़ना पर साथ-साथ होना   
न  कोई वायदा न कोई इसरार   
मन में बसा है प्यार   
भले छूट जाए संसार। 
__________________ 

6. 
फ़िज़ा में इश्क़ 
***
जाने ज़िन्दगी किसके जैसी   
न तेरे जैसी न मेरे जैसी   
थोड़ी खट्टी थोड़ी मीठी   
खट्टी-मीठी इमली जैसी   
सोंधी-सोंधी-सी तेरी खुशबू   
फ़िज़ा में इश्क़ ज़िन्दगी ऐसी। 
_____________________ 

7. 
इश्क़ इबादत 
***
दस्तूर-ए-मोहब्बत मालूम नहीं   
इश्क़ ही बस एक इबादत   
इतना ही मालूम है। 
______________________ 

8. 
इश्क़ का एक लम्हा 
***
अल्लाह! एक दुआ क़ुबूल करो   
क़यामत से पहले इतनी मोहलत दे देना   
दम टूटे उससे पहले   
इश्क़ का एक लम्हा दे देना। 
__________________________ 

9. 
इश्क़ पर क़ुर्बान 
***
इश्क़ के आयत की पर्ची   
यादों की ताबीज़ में बंदकर   
सिरहाने के दराज़ में छुपा दी   
अलामतें कोई न देखे,   
यादों की पूरनमासी यादों की अमावस   
यादों का चक्रव्यूह जीवन थक चला है  
अब यादों की ताबीज़ टूट ही जाए   
ज़िन्दगी इश्क़ पर कुर्बान हो जाए। 
_______________________ 

10.
इश्क़ की लकीर 
*** 
ज़िन्दगी के माथे पर नसीब का टीका   
ज़िन्दगी की हथेली पर इश्क़ की लकीर   
फिर उम्र को परवाह क्या   
पल भर मिले या सदियाँ रहे 

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2021) 
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बुधवार, 2 दिसंबर 2020

700. स्त्री हूँ (10 क्षणिका)

स्त्री हूँ 

******* 

1.
स्त्री हूँ 
*** 
स्त्री हूँ, वजूद तलाशती   
अपना एक कोना ढूँढती   
अपनों का ताना-बाना जोड़ती   
यायावरता मेरी पहचान बन गई है  
शनै-शनै मैं खो रही हूँ मिट रही हूँ   
पर मिटना नहीं चाहती   
स्त्री हूँ, स्त्री बनकर जीना चाहती हूँ  

2.
अकेली   
*** 
रह जाती हूँ   
बार-बार हर बार   
बस अपने साथ   
मैं, नितांत अकेली   

3. 
भूल जाओ 
*** 
सपने तो बहुत देखे   
पर उसे उगाने के लिए   
न ज़मीन मिली न मैंने माँगी   
सपने तो सपने हैं सच कहाँ होते हैं   
बस देखो और भूल जाओ   

4.
छलाँग 
*** 
आसमान की चाहत में   
एक ऊँची छलाँग लगाई मैंने   
भर गया आसमान मुट्ठी में   
पाँव के नीचे लेकिन ज़मीं ना रही   

5. 
ज़िन्दगी जी ली 
*** 
ज़िंदा रहने के लिए   
सपनों का मर जाना बेहद ख़तरनाक है   
मालूम है फिर भी एक-एककर   
सारे सपनों को मार दिया   
ख़ुद ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारी   
और ज़िन्दगी जी ली मैंने   


6..  
हँस पड़ी वह 
*** 
वह हँसी, वह बोली   
इतना दंभ, इतनी हिमाक़त   
उसे मर्यादित होना चाहिए   
उसे क्षमाशील होना चाहिए   
उसकी जाति का यही धर्म है  
पर अब अधर्मी होना स्वीकार है   
यही एक विकल्प है   
आज फिर हँस पड़ी मैं   


7.
जर्जर 
*** 
आख़िरकार मैं घबराकर   
घुस गई कमरे के भीतर   
तूफ़ान आता, कभी जलजला   
हर बार ढहती रही, बिखरती रही   
पर जब भी खिड़की से बाहर झाँका   
साबुत होने के दम्भ के साथ   
खंडहर नहीं छुपा सकता, काल के चक्र को   
अंततः सबने देखा झरोखे से झाँकती, जवान काया   
जो अब डरावनी और जर्जर है   


8. 
बाँझ 
*** 
मन में अब कुछ नहीं उपजता   
न स्वप्न न कामना   
किसी अपने ने पीछे से वार किया   
हर रोज़ बार-बार हज़ार बार   
कोमल मन खंजर की वार से बंजर हो गया है   
मेरा मन अब बाँझ है   


9.
खुदाई 
*** 
जाने क्यों, ज़माना बार-बार खुदाई करता है   
गहरी खुदाई पर, मन ने हरकत कर ही दी   
दिल पर खुदी दर्द की तहरीर   
ज़माने ने पढ़ ली और अट्टहास किया   
जाने कितनी सदियों से, सब कुछ दबा था   
अँधेरी गुफ़ाओं में, तहख़ाने के भीतर   
अब आँसुओं का सैलाब है   
जो झील बन चुका है   


10.
जबरन 
*** 
अतीत की बेवकूफ़ियाँ   
मन का पछतावापन   
गाहे-बगाहे, चाहे  चाहे   
वक़्त पाते ही बेधड़क घुस आता है   
उन सभासदों की तरह जबरन   
जिनका उस क्षेत्र में प्रवेश-निषेध है   
 हँसने देता है  रोने देता है   
और झिंझोड़कर रख देता है   
पूरा का पूरा वजूद!   

 - जेन्नी शबनम (2. 12. 2020)
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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

681. घात (10 क्षणिका)

घात

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1. 
घात 
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सपने और साँसें दोनों नज़रबंद हैं   
न जाने कौन घात लगाए बैठा हो   
ज़रा-सी चूक और सब ख़त्म।   

2.
कील 
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मन के नाज़ुक तहों में   
कभी एक कील चुभी थी   
जो बाहर न निकल सकी   
वह बारहा टीस देती है   
जब-जब दूसरी नई कील   
उसे और अंदर बेध देती है।     

3. 
काँटे 
******* 
तमाम उम्र ज़िन्दगी से काँटे छाँटती रही   
ताकि ज़िन्दगी बस फूल ही फूल हो   
बिना चुभे एक भी काँटा अलग न हुआ   
हर बार चुभता, ज़ख्म देता, रूलाता   
धीरे-धीरे फूलों का खिलना बंद हुआ   
रह गए बस काँटे ही काँटे   
अब इसे छाँटना क्या।     

4. 
जल गए 
******* 
वक़्त की टहनी पर रिश्तों के फूल खिले   
कुछ टिके, कुछ झरे, कुछ रुके, कुछ बढे   
जो टिके, वे सँभल न सके   
जो झरे, वे झुलस गए   
ज़िन्दगी आग का दरिया है   
वक़्त के साथ सब जल गए   
वक़्त के साथ सब ढल गए।      

5. 
साथ 
******* 
हम समझते थे   
वक़्त पर साथ मेरे सब खड़े होंगे   
ताल्लुकात के रंग   
वक़्त ने बहुत पहले ही दिखा दिए।     

6. 
हिसाब 
******* 
तमाम उम्र हिसाब लगाते रहे   
क्या पाया क्या न पाया   
फ़ेहरिस्त तो बनी बड़ी लम्बी   
मगर सिर्फ़ कुछ न पाने की।     

7. 
गुज़र गया 
******* 
सूखे पत्तों-सा सूखा मन   
बिखरा पड़ा, मानो पतझड़   
आस की ऊँगली थामे   
गुज़र गया, तमाम जीवन।     

8. 
परिहास 
******* 
संबंधों की पृष्ठभूमि पर   
भाव लिखूँ, अभाव लिखूँ, प्रभाव लिखूँ   
या तहस-नहस होते नातों पर   
परिहास लिखूँ।     

9. 
माँग 
******* 
हर लम्हा वक़्त ने है छीना   
सारी उम्र पे कब्ज़ा है   
अब कुछ भी तो शेष नहीं   
वक़्त अभी भी माँग रहा   
मैं मानूँगी आदेश नहीं   
अब कुछ भी तो शेष नहीं।     

10. 
रूह 
******* 
एक रूह की तलाश में कितने ही पड़ाव मिले   
पर कहीं ठौर न मिला कहीं ठहराव न मिला   
मन का सफ़र ख़त्म नही होता   
रूहों का नगर जाने कहाँ होता है?   
रूहें शायद सिर्फ़ आसमान में बसती हैं।     

- जेन्नी शबनम (20. 8. 2020) 
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शुक्रवार, 22 मई 2020

665. स्वाद / बेस्वाद (10 क्षणिका)

स्वाद / बेस्वाद

******* 

1. 
इश्क़ का स्वाद 
***
तेरे इश्क़ का स्वाद   
मीठे पानी के झरने-सा   
प्यास से तड़पते राही को   
इक घूँट भर भी मिल जाए   
पीर-पैगंबर की दुआ   
क़ुबूल हो जाए।   

2. 
तेरा स्वाद
***
एक घूँट इश्क़    
और तेरा स्वाद   
अस्थि-मज्जा में जा घुला   
जिसके बिना   
जीवन नामुमकिन।   

3. 
स्वाद चख लिया 
***
उस रोज़ नथुनों में समा गई   
रजनीगंधा की ख़ुशबू   
जो तेरे बदन को छूती हुई   
मुझसे आकर लिपट गई थी   
और मेरी साँसों में तू ठहर गया था   
रजनीगंधा की ख़ुशबू अब भी आती है   
और मुझे छूकर गुज़र जाती है   
पर कोई और ख़ुशबू अब मुझे भाती नहीं   
तेरा स्वाद मेरे मन ने   
एक बार चख जो लिया है।   

4. 
मर्ज़ी का स्वाद 
***
तेरी बातें तेरी मर्ज़ी    
तेरी दीद तेरी मनमर्ज़ी   
तेरी मर्जी तेरी मनमर्ज़ी    
इसमें कहाँ मेरी मर्ज़ी    
तेरी मर्ज़ी का स्वाद बड़ा ही तीखा   
भा गई मुझको तेरी मर्ज़ी    
अब तेरी मर्ज़ी मेरी मर्ज़ी।   

5. 
जीवन का स्वाद 
***
जीवन का स्वाद   
मैंने घूँट-घूँट पीकर लिया   
एक घूँट तेरे वास्ते बचाकर रखा है   
गर मिलो कभी तुम   
वह घूँट तुम पी लेना   
मेरी ज़िन्दगी की कड़वाहट   
तुम भी जी लेना।   

6. 
स्वाद भरी ज़िन्दगी 
***
कुछ खट्टी कुछ मीठी   
स्वाद से भरी मेरी ज़िन्दगी   
थोड़ी नरम थोड़ी गरम   
गुलगुले-सी मेरी ज़िन्दगी   
आओ थोड़ा तुम भी चख लो   
एक और स्वाद का मजा ले लो।   

7.
बेस्वाद इश्क़ 
*** 
तेरा स्वाद बदन में घुल गया था   
जब इश्क़ का जाम पिया मैंने   
अब सब बेस्वाद हो गया है   
जब से तेरा इश्क़    
कहीं और आबाद हुआ है।   

8. 
स्वाद बह जाए 
***
झामे से खुरच-खुरचकर   
पूरे बदन को छील दिया है   
कि रिसते लहू के साथ   
तेरे इश्क़ का स्वाद बह जाए।   

9.
कसैला स्वाद 
*** 
तेरे इश्क़ का स्वाद   
कितना कसैला है   
जब-जब तेरी याद आई   
उबकाई-सी आती है।   

10. 
ज़िन्दगी का कसैला स्वाद 
***
कैसी कसक थी   
झिझक में जीती रही   
कहने की बेताबी   
मगर कभी कह न सकी   
दर्दे ए एहसास नहीं रेशमी   
मेरे अल्फ़ाज़ हो गए काग़ज़ी   
जाने किस चूल्हे पर पकी क़िस्मत   
जो ज़िन्दगी का स्वाद कसैला हुआ।   

- जेन्नी शबनम (22. 5. 2020) 
______________________

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

654. समय चक्र (10 क्षणिका)

क्षणिकाएँ 

*******  

1. 
समय चक्र  
***  
समय चक्र और जीवन चक्र  
दोनों घूम रहे हैं  
उन्हें रोकने की कोशिशों में  
मेरे दोनों हाथ छिल चुके हैं  
मैं उन्हें न रोक पाई न साथ चल पाई  
सदा नाकाम रही  
उसी तरह जिस तरह  
ख़ुद को अपने साथ रखने में नाकाम होती हूँ  
मुझे नहीं पता कि मैं कहाँ होती हूँ।
________________________________

2.
परत
***  
मेरे मौसम में अब कोई नहीं  
न मेरे मिज़ाज में कोई शामिल है  
मेरे मन पर जो एक नरम परत लिपटा था  
समय की ताप से पककर  
वह अब लोहे का हो गया है।  
____________________  

3..
यारी
***  
फूल तो सबको प्रिय, मैंने काँटों से यारी की  
इस यारी में लाचारी थी, मेरी नहीं मनमानी थी  
नसीब का लेखा-जोखा है, सब कुदरत का धोखा है  
यह क़िस्मत की साज़िश है, नहीं कोई गुंजाइश है  
काँटों की कलम से चाक-चाक, सीना मेरा छलनी है  
दर्द भले पुराना है, लेकिन नयी-नयी मेरी कहानी है।  
____________________________________  

4.  
ज़ख़्म   
***  
काँटों ने चुभाकर, जब भी ज़ख़्म दिए  
एक संतोष-सा मन में ठहर गया  
काँटों ने ज़ख़्म दिए हैं, तन छलनी हुआ तो क्या हुआ  
गर फूलों ने ज़ख़्म दिया होता, तो मन छलनी होता  
घाव तो भर जाएँगे  
मन तो साबुत रहेगा।
__________________________

5.  
पुल  
***  
ढेरों इल्ज़ामों की तरह एक और  
ढेरों कटु वचनों की तरह एक और  
फ़र्क नहीं पड़ता अब दुर्भावनाओं से  
न ही असर होता है, इल्ज़ामों की इन गिनतियों से  
वह जो एक पुल था, हमारे दरम्यान  
उसे वक़्त ने ढहा दिया है।  
___________________________  

6.  
चेहरा  
***  
चेहरे तो कई ओढ़े कई उतारे  
कब कौन पहना अब याद नहीं  
सबसे सच्चा वाला चेहरा  
जो गुम हो चुका है, इन चेहरों की भीड़ में  
अब कभी नहीं पहन पाऊँगी  
पर एक टीस तो उठेगी  
जब-जब आईना निहारूँगी।  
_____________________

7.  
बेजान सड़क  
***  
बेजान सड़क में जैसे जान आ जाती है
मेरे पाँव में पहिया पहना देती है
फिर मुझे पहुँचा आती है वहाँ-वहाँ
जहाँ भीड़ में मैं अक्सर गुम हो जाती हूँ
फिर कोई अनजाना हाथ मुझे थाम लेता है
मगर कुछ क़दम के फ़ासले पर चलता है
सड़क को सब पता है
कहाँ मेरा सुकून है, कहाँ मेरी मंज़िल
और कहाँ थामने वाले हाथ।  
___________________________

8.  
तस्वीर  
***  
काश कि अतीत विस्मृत हो जाए  
ज़ेहन में तस्वीर कुछ ताज़ी आ जाए  
दर्द की ढेरों तहरीर और रिसते ज़ख़्मों के धब्बे हैं  
रिश्तों की ग़ुलामी और अनजीए पहलू की सरगोशी है  
सब बिसराकर नई तस्वीर बसाना चाहती हूँ  
कुछ नए फूल खिलाना चाहती हूँ  
एक नई ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ।  
_________________________________  

9.  
जुर्रत  
***  
लुंज-पुंज से वक़्त में, ज़िन्दगी की अफरा-तफरी में
इश्क़ करने की मोहलत मिल गई
समय संजीदा हुआ 
पूछा- ऐसी जुर्रत क्यों की?
अब इसका क्या जवाब
जुर्रत तो हो गई
अब हो गई तो हो गई।  
_________________________  

10.
दवा-दुआ  
***  
उम्र के इस दौर में, तन्हाइयों के इस ठौर में  
न दवा काम आती है न दुआ काम आती है  
बस किसी अपने की यादें साथ रह जाती हैं  
यूँ सच है खोखले रिश्तों के बेजान शहर में  
कौन किसके वास्ते दुआ करे, करे तो क्यों करे  
कोई किसी को अपना मान ले  
आख़िरी पलों में बस इतना ही काफ़ी है।  
____________________________  

- जेन्नी शबनम (8. 4. 2020)  
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