Wednesday, February 11, 2009

15. ज़िन्दगी रेत का महल...

ज़िन्दगी रेत का महल...

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ज़िन्दगी रेत का महल है
हर लहर आकर बिखेर जाती है,
सपनों से रेत का महल हम फ़िर बनाते हैं
जानते हैं बिखर जाना है फ़िर भी !

हमारी मौज़ूदगी के निशान तो रेत पे न मिलेंगे कभी
किसी के दिल में चुपके से इक हूक-सी उठेगी कभी,
ज़ख्म तो पाया हर पग पर हमने
पर टीस उठेगी ज़रूर सीने में किसी के !

रेत के महल-सा स्वप्न हमारा
क्या मुमकिन कि समंदर बख्श दे कभी ?
जीवन हो या रिश्ता, वक्त की लहरों से बह तो जाना है ही
फ़िर भी सहेजते हैं रिश्ते, बनाते हैं रेत से महल !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 19, 2008)

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