Friday, April 10, 2009

51. रिश्तों का लिबास सहेजना होगा...

रिश्तों का लिबास सहेजना होगा...

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रिश्तों के लिबास में, फिर एक खरोंच लगी
पैबंद लगा के, कुछ दिन और, ओढ़ना होगा । 

पहले तो छुप जाता था
जब सिर्फ सिलाई उघड़ती थी,
कुछ और नए टाँकें
फिर नया-सा दिखता था । 

तुरपई कर-कर हाथें थक गईं
कतरन और सब्र भी चूक रहा,
धागे उलझे और सूई टूटी
मन भी अब बेज़ार हुआ । 

डर लगता अब
कल फिर फट न जाए,
रफ़ू कहाँ और कैसे करुँगी
हर साधन अब शेष हुआ । 

इस लिबास से बदन नहीं ढँकता
अब नंगा तन और मन हुआ,
ये सब गुज़रा, उससे पहले
क्यों न जीवन का अंत हुआ ?

सोचती हूँ, जब तक जियूँ, आधा पहनूँ
आधा फाड़ कर सहेज दूँ,
विदा होऊँगी जब इस जहान से
इसका कफ़न भी तो ओढ़ना होगा । 

रिश्तों के इस लिबास को
आधा-आधा कर सहेजना होगा । 

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 10, 2009)

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1 comment:

अनिल कान्त : said...

बेहद खूबसूरत लिखती हैं आप ....मोहब्बत के रिश्ते और इंसानी रिश्ते को बखूबी सुई के धागे सा पिरोया है आपने

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