Friday, May 29, 2009

61. दफ़ना दो यारों...

दफ़ना दो यारों...

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चंदा की चाँदनी से, रौशनी बिखरा गया कोई
हसीन हुई है रात, सिर्फ इतना देखो यारों,
कौन बिखरा गया रंगीनी, ये न पूछो कोई
रौशन हुई है रात, बस बहक जाओ यारों !

सूरज की तपिश से, अगन लगा गया कोई
दहक रही है रात, सिर्फ इतना देखो यारों,
कौन जला गया दामन, ये न पूछो कोई
जल रही है रात, बस जश्न मनाओ यारों !

आसमान की शून्यता से, तक़दीर भर गया कोई
ख़ामोश हुई है रात, सिर्फ इतना देखो यारों,
कौन दे गया मातम, ये न पूछो कोई
तन्हा हुई है रात, बस ज़रा रो लो यारों !

अमावास की कालिमा से, अँधियारा फैला गया कोई
डर गई है रात, सिर्फ इतना देखो यारों,
कौन कर गया अँधेरा, ये न पूछो कोई
मर गई है रात, बस उसे दफ़ना दो यारों !

- जेन्नी शबनम (मई 28, 2009)

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2 comments:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही प्रेरक और उम्दा रचना . आभार.

Pacifier Returns said...

Good one..

Smiles :)
Prashant