Saturday, July 4, 2009

68. आज़माया हमको

आज़माया हमको

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बेख़याली ने कहाँ-कहाँ न भटकाया हमको
होश आया तो तन्हाई ने तड़पाया हमको 

इस बाज़ार की रंगीनियाँ लुभाती नहीं अब  
नन्ही आँखों की उदासी ने रुलाया हमको 

उन अनजान-सी राहों पर यूँ चल तो पड़े हम  
असूफ़ों और फ़रिश्तों ने आज़माया हमको 

वजह-ए-निख्वत उनकी दूर जो गए हम
मिले कभी फिर तो गले भी लगाया हमको 

रुसवाइयों से उनकी तरसते ही रहे हम
इश्क की हर शय ने बड़ा सताया हमको 

दर्द दुनिया का देख के घबराई बहुत 'शब'
ऐ ख़ुदा ऐसा ज़माना क्यों दिखाया हमको 

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असूफ़ - दुष्ट / अनीति करने वाला
वजह-ए-निख्वत - अभिमान / अंहकार के कारण
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- जेन्नी शबनम (जुलाई 4, 2009)

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2 comments:

kishor kumar khorendra said...

दर्द दुनिया का देख घबड़ाई बहुत ''शब'',
ऐ ख़ुदा ऐसा ज़माना क्यूँ दिखाया हम को|

nice
good

Jitin said...

itna dard kahan se laati hain aap in rachnao mein...