गुरुवार, 12 नवंबर 2009

97. इन्सानियत मरती है (अनुबन्ध/तुकान्त) / Insaaniyat martee hai (Anubandh/Tukaant) (पुस्तक- नवधा)

इन्सानियत मरती है

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गुनहगारों को आजकल राहत मिलती है
बेगुनाही सज़ा और ज़िल्लत से घिरती है 

किसी की मासूमियत का कैसे हो फ़ैसला 
आजकल मासूमियत सरे-आम बिकती है 

इन्सानी मनसूबे की परख कुछ मुमकिन नहीं
हर चेहरे पे हज़ार पर्द-पोशी दिखती है 

दुनिया के दश्त में हर शख़्स है भटकता
सबकी तक़दीर में ज़मीन कहाँ टिकती है 

मतलब-परस्ती भर है सियासी बाज़ीगरी
टुकड़ों में बँटती मादरे-वतन सिसकती है 

अजब इत्तेफ़ाक एक राष्ट्र में महाराष्ट्र बसा
तंगदिल इतना जहाँ राष्ट्रभाषा पिटती है 

दहशतगर्दों ने ख़ुदा को न बख़्शा 'शब'
बज़्मे-ऐश देखो जब इन्सानियत मिटती है 
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बज़्मे-ऐश- ख़ुशी का जलसा
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-जेन्नी शबनम (15. 8. 2009)
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Insaaniyat martee hai

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gunahgaaron ko aajkal raahat miltee hai
begunaahi saza aur zillat se ghirtee hai.

kisi ki maasoomiyat ka kaise ho faisla 
aajkal maasoomiyat sare-aam biktee hai.

insaani mansoobe kee parakh kuchh mumkin nahin
har chehre pe hazaar pard-poshi dikhtee hai.

duniya ke dasht mein har shakhs hai bhataktaa
sabkee taqdeer mein zameen kahaan tikatee hai.

matlab-parasti bhar hai siyaasi baazigari
tukadon mein bantatee maadare-watan sisakatee hai.

ajab ittefaaq ek raashtra mein maharashtra basaa
tang dil itnaa jahaan rashtrabhasha pitatee hai.

dahshatgardon ne khuda ko na bakhsha 'shab'
bazme-aish dekho jab insaaniyat mitatee hai.
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bazme-aish- khushi ka jalsaa
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-Jenny Shabnam (15. 8. 2009)
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4 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

अजब इत्तेफाक एक राष्ट्र में महाराष्ट्र बसा
तंग दिल इतना जहाँ राष्ट्र-भाषा घुटती है !
विचारोत्तेजक!

Randhir Singh Suman ने कहा…

दहशतगर्दों ने ख़ुदा को न बख्शा ''शब''
बज़्मे-ऐश देखो जब इंसानियत मरती है ! .nice

रश्मि प्रभा... ने कहा…

इंसानी मंसूबों की खबर तो अंत-अंत तक नहीं होती....
बहुत ही सही ख्याल

Unknown ने कहा…

दुनिया के दश्त में हर शख्स भटकता
सबकी तकदीर में ज़मीन कहाँ रहती है !
sahi kaha hai aur sahaj v sunder sabdo v lay mein kaha hai...acha laga blog dekhker..jenniji badhai.....