रविवार, 8 नवंबर 2009

94. तुम कहाँ गए / tum kahaan gaye

तुम कहाँ गए

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एक साँझ घिर आयी है मन पर
मेरी सुबह लेकर तुम कहाँ गए !

एक फूल खिला एक दीप जला
सब बुझा कर तुम कहाँ गए !

बीता रात का पहर भोर न हुई
सूरज छुपा कर तुम कहाँ गए !

चुभती है अब अपनी ही परछाईं
रौशनी दिखा कर तुम कहाँ गए !

तुम्हारी ज़िद न छूटेगा दामन
तन्हा छोड़ कर तुम कहाँ गए !

वक़्त-ए-रुखसत आकर मिल लो
सफ़र अधूरा कर तुम कहाँ गए !

'शब' की बस एक रात अपनी
वो रात लेकर तुम कहाँ गए !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 7, 2009)

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tum kahaan gaye

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ek saanjh ghir aayee hai mann par
meri subah lekar tum kahaan gaye !

ek phool khilaa ek deep jalaa
sab bujhaa kar tum kahaan gaye !

beetaa raat ka pahar bhor na huee
sooraj chhupaa kar tum kahaan gaye !

chubhtee hai ab apnee hin parchhayeen
raushanee dikhaa kar tum kahaan gaye !

tumhaari zidd na chhutegaa daaman
tanhaa chhod kar tum kahaan gaye !

waqt-ae-rukhsat aakar mil lo
safar adhuraa kar tum kahaan gaye !

'shab' kee bas ek raat apnee
wo raat lekar tum kahaan gaye !

- jenny shabnam (november 7, 2009)

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2 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

घिरी शाम दिल के बीच
सूर्य अस्त हुआ जाता है,
पर उम्मीद के दिए भी हैं जलते
चाँद को हर हाल में आना है

Priya ने कहा…

वक़्त-ए-रुखसत आकर मिल लो
मेरा अधूरा सफ़र तुम कहाँ गये !

best one