Tuesday, February 23, 2010

124. दिन को सुला दिया.../ din ko sula diya...

दिन को सुला दिया...

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रात बोली -
दिन बीत रहा
क्यों मुझको जगा दिया ?
सकुचाया सा दिन बोला -
मुझको नींद ने बुला लिया,
उनींदी रात फिर बैठी उठकर
गुस्साई थोड़ा
फिर बोली हँसकर -
हर दिन सोती हूँ मैं भर दिन
तुम हो जागते सारा दिन
जाओ
आज सारा नियम भूला दिया
आज तुमको मैंने सुला दिया !

- जेन्नी शबनम (फरवरी 23, 2010)

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din ko sula diya...

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raat boli -
din beet raha
kyon mujhko jaga diya ?
sakuchaaya sa din bola -
mujhko neend ne bula liya,
uneendi raat fir baithi uthkar
gussai thoda
fir boli hanskar -
har din soti hun main bhar din
tum ho jaagte saara din
jaao
aaj saara niyam bhoola diya
aaj tumko maine sula diya.

- Jenny Shabnam (February 23, 2010)

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10 comments:

रश्मि प्रभा... said...

अच्छा किया जो सुला दिया....उठेगा तो नई ताजगी होगी.....
कलम में नया जादू होगा

anjana said...

आप की रचना अच्छी लगी पर इस को पढने पर जो भाव मेरे मन मे जाग्रत हुआ वो जरुर आप से कहना चाहूंगी ।
दिन ओर रात की इस
उलझन को मिटा
सोने ओर जागने की
इस प्रवत्ति को छोड
चलो चले उस शून्य
की ओर
जहाँ हर तरफ है
शान्ति की किरण

Priya said...

I agree with Rashmi ji....rest ke baad freshness feel hogi.....three cheers! for your thought

हृदय पुष्प said...

अलग और सही सोच - बधाई

MUFLIS said...

ajab sa ulat-palat hai..
lekin rat ka haq ban`taa hai
k wo din ko sulaa paane mei
kaamyaab rahe
pathneey rachnaa !!
abhivaadan .

singhsdm said...

जाओ...
आज सारा नियम भुला दिया
आज तुमको मैंने सुला दिया !
मैडम नए तरीके से दिन और रात की कशमकश का इमेजिनेसन किया है आपने........
सलीके से कही गयी रचना के लिए "बधाई" शब्द कहना निश्चित रूप से कंम रहेगा.

Kavi Kulwant said...

आज सारा नियम भूला दिया
आज तुमको मैंने सुला दिया !

bahut sundar...and many thanks for seeing my poetry..

Suryavansi said...

kya hai raat?
kya hai din ?

jaise phool koi khushaboo bin!
jaise bijali gire baadal bin !

kahan sota hai bechara thaka hara din!
raat ko bhi kaatta hai taare gingin!

chalo koi baat nahin
kisi ne kya khoob kahee
raat gayi baat gayi

lekin kya aisa hota hai ?

ki
har thaka hua din ek nayi raat ke aagosh mai sota hai?

ya
har nayi raat ke aagosg mai ek taazagi bhara din hota hai?

Suryavansi said...

क्या है रात ?
क्या है दिन ?

जैसे फूल कोई खुशबू बिन !
जैसे बिजली गिरे बादल बिन !

कहाँ सोता है बेचारा थका हारा दिन !
रात को भी काटता है तारे गिनगिन !

चलो कोई बात नहीं
किसी ने क्या खूब कही
रात गयी बात गयी

लेकिन क्या ऐसा होता है ?

क़ि
हर थका हुआ दिन एक नयी रात के आगोश मे सोता है ?

या
हर नयी रात के आगोश मै एक ताज़गी भरा दिन होता है ?

संजय भास्कर said...

हर दिन सोती हूँ मैं भर दिन
तुम हो जागते सारा दिन,
जाओ...
आज सारा नियम भूला दिया
आज तुमको मैंने सुला दिया


बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com