Friday, March 5, 2010

125. क्या तुम दे सकोगे जवाब... / kya tum de sakoge jawaab...

क्या तुम दे सकोगे जवाब...

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किससे माँगूँ मेरे रिसते आँसुओं का हिसाब
मेरी काली रातों और धुँधले दिन का हिसाब
कौन देगा मेरी अकथ्य अंतःव्यथा का जवाब
क्या तुम दे सकोगे मेरे असंख्य सवालों का जवाब ?

जब जीवन के जद्दोज़हद के साथ
हमारे रिश्तों की लम्बी बहस होती रही,
प्रेम-विश्वास की कुम्हलाई छाया के साथ
शब्द-युद्ध का दंश अनवरत झेलती रही,
जीवन एक समझौता मात्र है मान
हर निराधार आरोप निःशब्द ओढ़ती रही,
तुम्हारे हर एक शब्द-वाण से पाकर घात
अपने मन और अस्तित्व को लताड़ती रही । 

मेरे डर को मेरी बेवफाई कहते हो
मेरी मज़बूरी को मेरी संग-दिली कहते हो,
जब तुम ही नहीं समझते मुझे
बताओ कैसे कोई समझेगा मुझे ?
अगर मैं हूँ निर्मम-नासमझ-निःसंवेदी
फिर कैसे समझती हूँ तुम्हारी हर रचना ?
कैसे डूब कर खो जाती हूँ हर एक शब्द में ?
कैसे आत्मसात करती हूँ तुम्हारी भावना ?

- जेन्नी शबनम (मार्च 5, 2010)

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kya tum de sakoge jawaab...

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kisase maangoon mere riste aansuon ka hisaab
meri kaali raaton aur dhundhle din ka hisaab
kaun dega meri akathya antahvyatha ka jawaab
kya tum de sakoge mere asankhya sawaalon ka jawaab ?

jab jiwan ke jaddozehad ke saath
hamaare rishton ki lambi bahas hoti rahi,
prem-vishwaas ki kumhlaai chhaaya ke sath
shabd-yuddh ka dansh anwarat jhelti rahi,
jiwan ek samjhauta maatra hai maan
har niraadhar aarop nihshabd odhti rahi,
tumhare har ek shabd-waan se paakar ghaat
apne mann aur astitva ko lataadti rahi.

mere dar ko meri bewafai kahte ho
meri mazboori ko meri sang-dili kahte ho,
jab tum nahin samajhte mujhe
bataao kaise koi samjhega mujhe ?
agar main hun nirmam-naasamajh-nihsamvedi
fir kaise samajhti hun tumhaari har rachna ?
kaise doob kar kho jaati hun har ek shabd mein ?
kaise aatmsaat karti hun tumhari bhaawna ?

- Jenny Shabnam (March 5, 2010)

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7 comments:

रश्मि प्रभा... said...

दर्द को प्यार की जिल्द में लिखा है.......बहुत ही अच्छी रचना जेनी जी, दिल को झकझोर दिया

Priya said...

मेरे डर को मेरी बेवफाई कहते हो
मेरी मज़बूरी को मेरी संग-दिली कहते हो,
जब तुम हीं नहीं समझते मुझे
बताओ कैसे कोई समझेगा मुझे,
अगर मैं हूँ निर्मम-नासमझ-निःसंवेदी
फिर कैसे समझती हूँ तुम्हारी हर रचना,
कैसे डूब कर खो जाती हूँ हर एक शब्द में
कैसे आत्मसात करती हूँ तुम्हारी भावना ! ......very touching.....kahin padha aapke baare mein ke aap supreme court lawyer hai....aur saath mein ek poetess bhi ......jam koi ye sawal hamse poochta ki aap poetry kaise likhti hai ......tab ek muskaan ke saath chup ho jaati ...ye sab likh gai kyonki we share same qualification.....Waqalat ki degree rakhne waale bhi kanoon ki kitabon ke saath dil aur samvednao ko bhi samajhte hai .....Mahila diwas ki badhai

jenny shabnam said...

रश्मि प्रभा... ने कहा…
दर्द को प्यार की जिल्द में लिखा है.......बहुत ही अच्छी रचना जेनी जी, दिल को झकझोर दिया
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rashmi ji,
meri rachna jane kis kis dil ki baat kah jati hai, mera dil bhi jhakjhor deti. shukriya aapne pasand kiya.

jenny shabnam said...

Priya ने कहा…
मेरे डर को मेरी बेवफाई कहते हो
मेरी मज़बूरी को मेरी संग-दिली कहते हो,
जब तुम हीं नहीं समझते मुझे
बताओ कैसे कोई समझेगा मुझे,
अगर मैं हूँ निर्मम-नासमझ-निःसंवेदी
फिर कैसे समझती हूँ तुम्हारी हर रचना,
कैसे डूब कर खो जाती हूँ हर एक शब्द में
कैसे आत्मसात करती हूँ तुम्हारी भावना ! ......very touching.....kahin padha aapke baare mein ke aap supreme court lawyer hai....aur saath mein ek poetess bhi ......jam koi ye sawal hamse poochta ki aap poetry kaise likhti hai ......tab ek muskaan ke saath chup ho jaati ...ye sab likh gai kyonki we share same qualification.....Waqalat ki degree rakhne waale bhi kanoon ki kitabon ke saath dil aur samvednao ko bhi samajhte hai .....Mahila diwas ki badhai
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priya ji,
bahut khushi hui ki aap bhi lawyer hain, kahan practice karti?
haan, main lawyer bhi hun, aur bhi bahut kuchh karti kyuki jiwan to ek hi mila kaam bahut jyada hai. kavita likhna shauk hai, aur bina paatra-parichay diye apni aur dusron ki samvednaayen sahajta se likh pati hun, kyunki agar na likhun to shayad main khud ke sath anyaay kar baithu. isliye meri rachna mein na ek bhaaw hota na koi niyam. bas man ki baat likh deti.
meri rachna aapko pasand aati bahut bahut shukriya. yun hin aapse sahyog ki apeksha rahegi.

Priya said...

Jenni ji...Kuch din practice ki fir jhod di....kanooni rawaiya aur prakriya mein dil nahi rama to filhaal adalat se vida le li....Ham lucknow se hai....aur ek MNC mein job karte hai....sahitya se lagaav hai to qalam chal jaati hai

jenny shabnam said...

priya ji,
adalat ka kaam sach mein man ke layak nahin, mera bhi ji nahin laga usmein. lekhan kaarya achha lagta, aur ye man ko sukoon bhi deta hai...thanx.

jenny shabnam said...

adarniye kishor ji ki pratikriya aur sameeksha...

kishor kumar:
किससे मांगू मेरे रिसते आंसुओं का हिसाब
आपकी यह कविता मैंने पढ़ ली
कितना अच्छा लिखा हाँ आपने
जीवन का दर्शन हाँ इसमे
१-अगर मैं हूँ निर्मम-नासमझ-निःसंवेदी
फिर कैसे समझती हूँ तुम्हारी हर रचना,
कैसे डूब कर खो जाती हूँ हर एक शब्द में
कैसे आत्मसात करती हूँ तुम्हारी भावना !
वाह ...कविता मन की भाषा हैं आत्मा की बोली हैं .....यह तो हम समझ जाते हैं परन्तु व्यवहार में उस ...भाव की मिठास कों ...चासनी की भांती ....मिश्रित कर पाना कितना कठिन हो जाता हैं
२-मेरे डर को मेरी बेवफाई कहते हो
मेरी मज़बूरी को मेरी संग-दिली कहते हो,
जब तुम हीं नहीं समझते मुझे
बताओ कैसे कोई समझेगा मुझे,
आप ठीक कहती हैं ..कल्पना के इस सच का सामना मैंने भी किया हैं ..
लेकिन ....आपने उसे साफ़ साफ़ कह दिया हैं ...
डर के पुल कों पार नहीं किया जा सकता ....और इसलीये मनुष्य संगदिल नजर आता हैं
हालां कि-
वह ऐसा होता नहीं हैं

३-जीवन एक समझौता मात्र है मान
हर निराधार आरोप निःशब्द ओढ़ती रही,
तुम्हारे हर एक शब्द-वाण से पाकर घात
अपने मन और अस्तित्व को लताड़ती रही !

परिवेश से प्राप्त अनुभवों कों निज कि वेदना की तरह आपने प्रस्तुत किया हैं .....
अपनी अपनी समझ कों हम समझाने में असमर्थ होते हैं ....
सामने उपस्थित व्यक्ति ...अपनी हैसियत ...अपने पद ..समाज से प्राप्त पारंपरिक अधिकार का प्रयोगकर एक ......
कोमल भावनाओं के सशक्त प्रभाव कों धूमिल कर देते हैं

किससे मांगू मेरे रिसते आंसुओं का हिसाब
४-मेरी काली रातों और धुंधले दिन का हिसाब ?
कौन देगा मेरी अकथ्य अंतःव्यथा का जवाब
तुम दे सकोगे मेरे असंख्य सवालों का जवाब ?
और आपने यह लिख भी दिया हैं आरम्भ में ही कि -
की हमारी आत्मा की बोली कों कौन समझेगा .....हर रिश्ता अंतत;
खीझ ...या बनी बनायी लीक पर ही क्यों पहुचना चाहता हैं

हर रिश्ता बंधन मुक्त होता ....
बिना शर्तो के ....तो कितना अच्छा होता
हम जितना ही ...मन से स्वतंत्र होंगे उठाने ही हमारे विचार भी अच्छे होंगे ....

५-मुख्य बात तो यह हैं की उसी विषय पर मैंने भी एक कविता लिखी ...
भाव अलग हैं
लेकिन ....गहराई में अर्थ वहीं हैं

६-हैं न ताज्जुब ..सिस

किशोर