Friday, March 26, 2010

129. हमसाया मिल गया / humsaaya mil gaya

हमसाया मिल गया

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ख़्यालों में एक अजनबी, ले मेरा दिल गया
सूरत तो न दिखी मगर, हमसाया मिल गया !

उसकी तलब में अज़ब सी मनहूसी छा गई
यों नूरानी चेहरे से, ज्यों चोरी में तिल गया !

उसकी हथेलियों के दायरे में सिमटा चेहरा
धरती थरथराई, और आसमान भी हिल गया !

मिली दर्द से राहत जब उसने थाम लिया
उम्र की हर राह कँटीली, पाँव था छिल गया !

हयात की तल्खियाँ मुमकिन तो नहीं भूलना
जब साथ चल पड़ा वो, हर ज़ख़्म सिल गया !

सेहरा की कड़ी दोपहरी में उससे मिली छाँव
अब कैसी थकन, उसका कंधा जो मिल गया !

ऐ हमकदम आओ आज साथ-साथ जलें हम
देखो 'शब' अँधियारा, चाँदनी सा खिल गया !

- जेन्नी शबनम (मार्च 25, 2010)

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humsaaya mil gaya

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khayaalon mein ek ajnabi, le mera dil gaya
soorat to na dikhi magar, hamsaaya mil gaya.

uski talab mein ajab si manhoosi chhaa gai
yun nooraani chehre se, jyon chori mein til gaya.

uski hatheliyon ke daayare mein simta cehra
dharti thartharaai, aur aasamaan bhi hil gaya.

mili dard se raahat jab usne thaam liya
umra ki har raah kantili, paaon tha chhil gaya.

hayaat ki talkhiyaan mumkin to nahin bhoolna
jab saath chal pada wo, har zakham sil gaya.

sehra ki kadi dopahari mein usase mili chhanw
ab kaisi thakan, uska kaandha jo mil gaya.

ae humkadam aao aaj saath saath jale hum
dekho 'shab' andhiyaara, chaandni sa khil gaya.

- Jenny Shabnam (March 25, 2010)

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9 comments:

संजय भास्कर said...

बढ़िया लगी आपकी यह खास प्रस्तुति....ढ़िया प्रस्तुति के लिए धन्यवाद जी

संजय भास्कर said...

बहुत खूब, लाजबाब !

रश्मि प्रभा... said...

हयात की तल्खियाँ मुमकिन तो नहीं भूलना
जब साथ चल पड़ा वो हर ज़ख़्म सिल गया !
zakhm sil jaye to isse badee baat aur kya........
bahut hi badhiyaa likha jenny ji

kishor kumar khorendra said...

ख़्यालों में एक अजनबी लेकर के दिल गया
सूरत तो न दिखी मगर हमसाया मिल गया !

बहुत ही खुबसूरत ख्याल

उसकी तलब में अज़ब सी मनहूसी छा गई
यों नूरानी चेहरे से ज्यों चोरी में तिल गया !

कितनी ब्याकुलता
बहुत खूब

उसकी हथेलियों के दायरे में सिमटा चेहरा
धरती थरथराई और आसमान भी हिल गया !

क्या बात हैं ..मिलन की सुखद कल्पना

मिली दर्द से राहत जब उसने थाम लिया
उम्र की हर राह कँटीली पाँव था छिल गया !

जीवन में दुःख हो या सुख़ सब सम हो गए
वो जब मिले उसी के बस हम हो गए
बहुत ही अच्छे भाव


हयात की तल्खियाँ मुमकिन तो नहीं भूलना
जब साथ चल पड़ा वो हर ज़ख़्म सिल गया !

एक निश्चिन्ता की अनुभूती
और क्या चाहिए ...

सेहरा की कड़ी दोपहरी में उससे मिली छाँव
अब कैसी थकन उसका कान्धा जो मिल गया !

बहुत सुन्दर सकारात्मक भाव

ऐ हमकदम आओ आज साथ साथ जले हम
देखो ''शब'' अँधियारा चाँदनी सा खिल गया !

चांदनी में वही तो साथ चले हैं मेरे
जो धूप में चलते चलते संग जले हैं मेरे

बहुत सुन्दर भाव ली हुवी हैं आपकी यह गजल

बधाई ..शुभ कामना

किशोर

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

मिली दर्द से राहत जब उसने थाम लिया
उम्र की हर राह कँटीली पाँव था छिल गया !

बेहद खूबसूरत शेर है ... आपका लहज़ा बहुत सहज और सरल है ... जैसे अनायास झरना बह रही हो !
मेरे ब्लॉग पैर आने के लिए और अपनी कीमती टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !

jenny shabnam said...

संजय भास्कर ने कहा…
बढ़िया लगी आपकी यह खास प्रस्तुति....ढ़िया प्रस्तुति के लिए धन्यवाद जी
बहुत खूब, लाजबाब !
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sanjay ji,
rachna ki sarahna keliye bahut shukriya aapka.

jenny shabnam said...

रश्मि प्रभा... ने कहा…
हयात की तल्खियाँ मुमकिन तो नहीं भूलना
जब साथ चल पड़ा वो हर ज़ख़्म सिल गया !
zakhm sil jaye to isse badee baat aur kya........
bahut hi badhiyaa likha jenny ji
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rashmi ji,
meri rachna ke bhaaw ko aapne samjha bahut bahut aabhar aapka.

jenny shabnam said...

kishor kumar khorendra ने कहा…
ख़्यालों में एक अजनबी लेकर के दिल गया
सूरत तो न दिखी मगर हमसाया मिल गया !

बहुत ही खुबसूरत ख्याल

उसकी तलब में अज़ब सी मनहूसी छा गई
यों नूरानी चेहरे से ज्यों चोरी में तिल गया !

कितनी ब्याकुलता
बहुत खूब

उसकी हथेलियों के दायरे में सिमटा चेहरा
धरती थरथराई और आसमान भी हिल गया !

क्या बात हैं ..मिलन की सुखद कल्पना

मिली दर्द से राहत जब उसने थाम लिया
उम्र की हर राह कँटीली पाँव था छिल गया !

जीवन में दुःख हो या सुख़ सब सम हो गए
वो जब मिले उसी के बस हम हो गए
बहुत ही अच्छे भाव


हयात की तल्खियाँ मुमकिन तो नहीं भूलना
जब साथ चल पड़ा वो हर ज़ख़्म सिल गया !

एक निश्चिन्ता की अनुभूती
और क्या चाहिए ...

सेहरा की कड़ी दोपहरी में उससे मिली छाँव
अब कैसी थकन उसका कान्धा जो मिल गया !

बहुत सुन्दर सकारात्मक भाव

ऐ हमकदम आओ आज साथ साथ जले हम
देखो ''शब'' अँधियारा चाँदनी सा खिल गया !

चांदनी में वही तो साथ चले हैं मेरे
जो धूप में चलते चलते संग जले हैं मेरे

बहुत सुन्दर भाव ली हुवी हैं आपकी यह गजल

बधाई ..शुभ कामना

किशोर
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kishor ji,
meri rachna aur mujhe aapne sada apna sneh aur maan diya hai. isi rachna par scrap mein aapne mujhe likh bheja...

kishor kumar:
जितना प्रेम एक मनुष्य के भीतर होता हैं
उसे लेने वाले इस दुनिया में बहुत कम लोग आते हैं
परिवार और मित्रो कों बांटने के पश्चात भी ..
व्यक्ति के भीतर ..प्रेम शेष रह जाता हैं .
इसलीये ..प्रेम ...?
मनुष्य के पास बच ही जाता हैं
जिसे हम अपनी कविता के द्वारा अभिव्यक्त करते हैं
इसे ही रचना का संसार कहते हैं
जिसे जेन्नी जीती हैं अपनी कल्पना में
बहुत खूब .....जेन्नी जी लिखती रहें ..

aapne mujhe itna samman diya isase jyada mere liye khushi ki aur kya baat ho sakti. aapko bhaitulya maanti hun, bas aashish aur sneh dete rahen. bahut shukriya aapka.

jenny shabnam said...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…
मिली दर्द से राहत जब उसने थाम लिया
उम्र की हर राह कँटीली पाँव था छिल गया !

बेहद खूबसूरत शेर है ... आपका लहज़ा बहुत सहज और सरल है ... जैसे अनायास झरना बह रही हो !
मेरे ब्लॉग पैर आने के लिए और अपनी कीमती टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !

April 06, 2010 8:59 PM
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indranil ji,
meri rachna aapko pasand aai bahut shukriya. yun hin mera hausla badhate rahenge ummid rahegi.