Wednesday, September 22, 2010

176. पलाश के बीज / गुलमोहर के फूल... / palaash ke beej / gulmohar ke phool...

पलाश के बीज / गुलमोहर के फूल...

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याद है तुम्हें
उस रोज़ चलते-चलते
राह के अंतिम छोर तक
पहुँच गए थे हम,
सामने एक पुराना सा मकान
जहाँ पलाश के पेड़
और उसके खूब सारे
लाल-लाल बीज,
मुट्ठी में बटोर कर
हम ले आए थे
धागे में पिरो कर
मैंने गले का हार बनाया,
बीज के ज़ेवर को पहन
दमक उठी थी मैं
और तुम
बस मुझे देखते रहे
मेरे चेहरे की खिलावट में
कोई स्वप्न देखने लगे
कितने खिल उठे थे न हम !

अब क्यों नहीं चलते
फिर से किसी राह पर,
बस यूँ ही
साथ चलते हुए
उस राह के अंत तक
जहाँ गुलमोहर के पेड़ों की
कतारें हैं,
लाल-गुलाबी फूलों से सजी
राह पर
यूँ ही बस...
फिर वापस लौट आऊँगी
यूँ ही खाली हाथ
एक पत्ता भी नहीं
लाऊँगी अपने साथ !

- जेन्नी शबनम (20. 9. 2010)

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palaash ke beej / gulmohar ke phool...

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yaad hai tumhen
us roz chalte-chalte
raah ke antim chhor tak
pahunch gaye they hum,
saamne ek puraana sa makaan
jahaan palaash ke ped
aur uske khoob saare
laal-laal beej,
mutthi mein bator kar
hum le aaye they
dhaage mein piro kar
maine gale ka haar banaaya,
beej ke jevar ko pahan
damak uthi thi main
aur tum
bas mujhe dekhte rahe
mere chehre ki khilaavat mein
koi swapn dekhne lage
kitne khil uthe they na hum !

ab kyon nahin chalte
fir se kisi raah par,
bas yun hi
saath chalte huye
us raah ke ant tak
jahaan gulmohar ke pedon ki
kataaren hain,
laal-gulaabi fulon se saji
raah par
yun hi bas...
fir waapas lout aaoongi
yun hi khaali haath
ek patta bhi nahin
laaungi apne sath !

- jenny shabnam (20. 9. 2010)

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9 comments:

दीपक 'मशाल' said...

हाथ पकड़ कर वापस कहीं यादों की छाँव में खींच ले जाने वाली कविता लगी.. आभार..

मनोज कुमार said...

आपकी इस कविता में से भावनाऒं का ऐसा सैलाव उठा कि कई पल रुक कर उन गुलमोहर के फूलों को निहारने पर विवश कर गया। शिल्प के वैशिष्ट से साधारण सी दिखने वाली घटना वाली कविता असाधारण हो गई है। घटना की मार्मिकता, सूक्ष्म, सघन दृष्टि और आपके काव्यात्मक विवरण से इसका वर्णन जीवंत हो उठा है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

देसिल बयना-गयी बात बहू के हाथ, करण समस्तीपुरी की लेखनी से, “मनोज” पर, पढिए!

Mukesh Kumar Sinha said...

uff premika ki thassak aapne sajo di..........shabdo me...:)

bahut bhawnapurn kavita..:)

kishor kumar khorendra said...

अब क्यों नहीं चलते
फिर से किसी राह पर,
बस यूँ हीं
साथ चलते हुए
उस राह के अंत तक
जहां गुलमोहर के पेड़ों की
कतारें हैं,
लाल-गुलाबी फूलों से सजी
राह पर
यूँ हीं बस...
फिर वापस लौट आऊँगी
यूँ हीं खाली हाथ
एक पत्ता भी नहीं
bahut sundar abhivykti
kuchh lekar nahi aanaa chati

kyonki dene ke baad
kuchh shesh hoga hi nahi

vah .......

kishor

AlbelaKhatri.com said...

बढ़िया कविता ............

Kailash C Sharma said...

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

रश्मि प्रभा... said...

यूँ हीं खाली हाथ
एक पत्ता भी नहीं
लाऊँगी अपने साथ !
bahut kuch hai is na lane me

Akanksha~आकांक्षा said...

बहुत सुन्दर...मन को छू गई यह रचना...बधाई.
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'शब्द-शिखर'- 21 वीं सदी की बेटी.

arun c roy said...

.. बहुत बढ़िया कविता