Sunday, September 26, 2010

177. दंभ हर बार टूटा... / dambh har baar toota...

दंभ हर बार टूटा...

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रिश्ते बँध नहीं सकते
जैसे वक़्त नहीं बँधता,
पर रिश्ते रुक सकते हैं
वक़्त नहीं रुकता !
फिर भी कुछ तो
है समानता,
न दिखे पर दोनों
साथ है चलता !
नहीं मालूम
दूरी बढ़ी
या कि
फासला न मिटा,
पर कुछ तो है कि
साथ होने का दंभ
हर बार टूटा !

- जेन्नी शबनम (8. 9. 2010)

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dambh har baar toota...

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rishte bandh nahin sakte
jaise waqt nahin bandhta,
par rishte ruk sakte hain
waqt nahin rukta !
fir bhi kuchh to
hai samaanta,
na dikhe par donon
saath hai chalta !
nahin maloom
doori badhi
yaa ki
faasla na mita,
par kuchh to hai ki
saath hone ka dambh
har baar toota !

- jenny shabnam (8. 9. 2010)

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7 comments:

M VERMA said...

दम्भ अगर है तो टूट जाये तो अच्छा

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (27/9/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

अनामिका की सदायें ...... said...

नयी सोच पढ़ने को मिली ऐसा तो कभी सोचा नहीं था. सुंदर अभिव्यक्ति.

रश्मि प्रभा... said...

kai baar waqt hi ruka hota hai....

मेरे भाव said...

रिश्ते बँध नहीं सकते
जैसे वक़्त नहीं बंधता,
पर रिश्ते रुक सकते हैं
वक़्त नहीं रुकता !
par waqt ki lahron par sawar hokar rishte khoobsoorat ho sakte hain.

सहज साहित्य said...

रिश्ते बँध नहीं सकते
जैसे वक़्त नहीं बंधता,
पर रिश्ते रुक सकते हैं
वक़्त नहीं रुकता !
-ये पंक्तियाँ गागर में सागर हैं शबनम जी ।

shabd nirantar said...

rishton ki burai hai ki we hamen janam ke saath mil jaate hain aur chaho na chaho nibhana hai.yehi hain bandhe ,ruke,thahre,rishte...jo ham banate hain benaam rishte we tamam umar shukun dete hain jaise bloggia rishte