Tuesday, June 28, 2011

नन्ही भिखारिन...

नन्ही भिखारिन...

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यह उसका दर्द है,
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?
या खुदा!
नन्ही सी जान
कौन सा गुनाह था उसका?

शब्दों में खामोशी ,
आँखों में याचना
पर शर्म नही,
हर एक के सामने
हाथ पसारती
सौ में से कोई एक कुछ दे जाता,
उतने में हीं संतुष्ट|
थोड़ा थम कर
गिन कर,
फ़िर अगली गाड़ी के पास
बढ़ जाती|

उफ़!
उसे पीड़ा नही होती?
पर क्यों नही होती?

कहते हैं पिछले जन्म का इस जन्म में
भुगतता है जीवन,
फ़िर इस जन्म का भुगतना
कब सुख पायेगा जीवन?
मन का धोखा
या सब्र की एक ओट,
जीने की विवशता
पर मुनासिब भी तो नही अंत|
कुछ सिक्कों की खनक में
खोया बचपन
फ़िर भी शांत
जैसे यही नसीब|
जीवित हैं
जीना है
नियति है
ख़ुदा का रहम है|

उफ़!
उसे खुदा पर रोष नही होता?
पर क्यों नही होता?

उसका दर्द उसका संताप
उसकी नियति है,
उसका भविष्य उसका वर्तमान
एक ज़ख्म है|
यह उसका दर्द है
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?

- जेन्नी शबनम (जनवरी 10, 2009)

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9 comments:

akhtar khan akela said...

bhtrin drd bhre andaz me likhi gayi rachna bdhai ho .akhtar khan akela kota rajsthan

Rajey Sha राजे_शा said...

मेरे ख्‍याल से दर्द का असली अनुभव दर्द के वि‍षय में क्रांति‍कारी बदलाव ला सकता है, हो सकता है आप भि‍खारि‍यों से संबंधि‍त कि‍सी मौलि‍क कार्य में अतुलनीय योगदान दें।

कुश्वंश said...

अच्छे भाव बिखेरते और अहसास करते शब्द बधाई

सहज साहित्य said...

नन्हीं भिखारिन का यह करुण चित्रण मन को झकझोर देता है । इन पंक्तियों में रचनाकार की पीड़ा भी एकाकार हो जाती है-"उसका दर्द उसका संताप
उसकी नियति है,
उसका भविष्य उसका वर्तमान
एक ज़ख्म है|
यह उसका दर्द है
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?" आपकी इन पंक्तियों ने तो अभिभूत कर दिया , जेन्नी शबनम जी

मनोज कुमार said...

हृदयस्पर्शी रचना।

रश्मि प्रभा... said...

यह उसका दर्द है,
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?
yahi to dard ka rishta hai...

वीना said...

सुंदर भाव....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मार्मिक रचना

nilesh mathur said...

बहुत ही सुन्दर और मार्मिक अभिव्यक्ति!