Monday, October 10, 2011

तब हुआ अबेर...

तब हुआ अबेर...

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जब मिला बेर
तब हुआ अबेर,
मचा कोलाहल
चित्र दिया उकेर,
छटपटाया मन
शब्द दिया बिखेर,
बिछा सन्नाटा
अब जगा अंधेर,
'शब' सो गई
तब हुआ सबेर!
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बेर - बारी/ समय
अबेर - देर
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- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 1, 2011)

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8 comments:

Prem Prakash said...

छटपटाया मन शब्द दिया बिखेर... मन का कहने और मन का पढने में माहिर हैं आप! बधाई एक सुंदर रचना के लिए...!

रश्मि प्रभा... said...

kuch hat ke ...

Mukesh Kumar Sinha said...

bikhre shabd achchhe lage di:)

S.N SHUKLA said...

भावपूर्ण रचना ,
बहुत सार्थक प्रस्तुति , बधाई

Pallavi said...

छटपटाया मन शब्द दिये बिखेर वाह यही तो होता है हम ब्लोग्गेर्स के साथ :) है ना !!!
समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/

रविकर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
बधाई स्वीकार करें ||

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुन्दर रचना.....

Rakesh Kumar said...

आदरणीय जेन्नी शबनम जी,

आपकी 'शब' को सादर नमन.

नमन से जब 'न' को हटाया और

शब के साथ लगाया,फिर तो

'शबनम' को ही पाया.

वाह! क्या बात है.यह तो तुकबंदी हो गई.