Wednesday, February 1, 2012

मछली या समंदर...

मछली या समंदर...

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बिना अपनी सहमति
अभिशप्त गलियों से
महज गुजरना
बदनामी का सबब बन जाता है
वैसे ही जैसे
किसी संक्रमित गली की
बहती हुई हवा
कोढ़ की तरह
मन में घाव बना देती है,
विवशता की कहानी
जाने कैसे समंदर में विलीन हो जाती है
और जब मछली
जाल में पकड़ कर आती है
तो समंदर निष्कलंक रह जाता है
सिर्फ मछली क्रूरता का दंश झेलती है !
एक सवाल
दुनिया से...
घात किसने लगाया
मछली या समंदर ने ?

- जेन्नी शबनम (फरवरी 1, 2012)

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24 comments:

वाणी गीत said...

गज़ब !

रश्मि प्रभा... said...

समंदर तो हमेशा गहरा , विशाल , निर्भीक होता है ... मछली हो या यादों के कुछ सिले ... उनकी क्या औकात ! समंदर निष्कलंक ही रहता है

anju(anu) choudhary said...

और जब मछली
जाल में पकड़ कर आती है
तो समंदर निष्कलंक रह जाता है
सिर्फ मछली क्रूरता का दंश झेलती है !.....


बेजोड लेखनी ...मछली का दंश समझ में आता हैं या ....शायद कोई समझना ही नहीं चाहता

मनोज कुमार said...

क्या जवाब दें इस प्रश्न का?
एक शे’र ही ...

अजब मयार था, सच बोलने वालों की महफिल का
जो देखा तो जमाने भर का झूठा आगे-आगे था

Rajesh Kumari said...

bahut kuch sochne par vivash karti rachna jaalim samaaj me machli hi sab kasht bhogti hai samaaj anjaan abodh ban jata hai.rachna ke madhyam se samajik kureetiyon par prahaar .padhkar bahut achcha laga.

आवेश said...

जब मछली/जाल में पकड़ कर आती है/तो समंदर निष्कलंक रह जाता है......मैं नहीं जानता आपके भीतर से ये कवितायेँ कैसे प्रस्फुटित होती हैं ,लेकिन इतना यकीं जरुर करने लगा हूँ कि आप सारी दुनिया की महिलाओं के दर्द ,दंश,उत्साह ,उल्लास और प्रेम को एक साथ जीती हैं |आपके एक एक शब्द को मेरा सलाम

vidya said...

गहन सोच में डालने वाली रचना..

बहुत खूब.

mridula pradhan said...

kya andaz hai......wah.

***Punam*** said...

kalank ka dansh keval kamjor ko hi jhelna padta hai...shaktishaali doshi hone par bhi apne aap ko bade aaram se nishkalankit nikaal le jaata hai....vahi aukaat vali baat saamne aa jati hai....bade ki badi aukaat aur chhota usi men pis jata hai....insaan ho ya paristhitiyan....kuchh niyam har jagah laagoo ho jaate hain...chahe sahi hon ya galat....!! aur apvaad kahan nahin hote...

dheerendra said...

गहरे भाव लिए बेहतरीन रचना,लाजबाब प्रस्तुतीकरण..

NEW POST...40,वीं वैवाहिक वर्षगाँठ-पर...

जयकृष्ण राय तुषार said...

आदरणीया जेन्नी शबनम जी कमाल की कविता है |आपकी कलम इसी तरह कोरे कागज पर शब्द सजाती रहे जिसे लोग कविता कहते हैं |बधाई |

kshama said...

एक सवाल
दुनिया से...
घात किसने लगाया
मछली या समंदर?
Kaisa gahan sawaal hai!

सदा said...

बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

Dr.Nidhi Tandon said...

विचारोत्तेजक रचना.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया।

ऋता शेखर मधु said...

विचारणीय सवाल...
समंदर तो निष्कलंक ही रहता है|

मिश्री की डली ज़िंदगी हो चली said...

vicharneey avam prabhavi rachna

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.in/2012/02/777.html
चर्चा मंच-777-:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Ratan Singh Shekhawat said...

शानदार

Gyan Darpan
..

Naveen Mani Tripathi said...

और जब मछली
जाल में पकड़ कर आती है
तो समंदर निष्कलंक रह जाता है
सिर्फ मछली क्रूरता का दंश झेलती है !.....

vah bahut khoob shabanam ji ....bolkul lajabab rachana

kase kahun?by kavita verma said...

gahan soch ke sath ek anjane dard ko bakhoobi uchhala hai aapne....

amrendra "amar" said...

waah bahut khoob, sochne pe majbur krti aapki ye behtreen prastuti

Pallavi said...

बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बात...सोचने पर मजबूर करती प्रभावशाली रचना..... http://mhare-anubhav.blogspot.com/ समय मिले कभी तो आयेगा मेरी इस पोस्ट पर आपका स्वागत है

Rakesh Kumar said...

आपकी अभिव्यक्ति कमाल की है.
गहन चिंतन और प्रश्न करती.

आभार.