Wednesday, February 29, 2012

326. जा तुझे इश्क हो...

जा तुझे इश्क हो...

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तुम्हें आँसू नहीं पसंद
चाहे मेरी आँखों के हों 
या किसी और के
चाहते हो
हँसती ही रहूँ
भले ही
वेदना से मन भरा हो,
जानती हूँ
और चाहती भी हूँ
तुम्हारे सामने तठस्थ रहूँ
अपनी मनोदशा व्यक्त न करूँ
लेकिन तुमसे बातें करते-करते
आँखों में आँसू भर आते हैं
हर दर्द रिसने लगता है,
मालूम है मुझे
तुम्हारी सीमाएँ 
तुम्हारा स्वभाव
और तुम्हारी आदतें
अक्सर सोचती हूँ
कैसे इतने सहज होते हो
फिक्रमंद भी हो और
बिंदास हँसते भी रहते हो,
कई बार महसूस किया है
मेरे दर्द से तुम्हें आहत होते हुए
देखा है तुम्हें 
मुझे राहत देने के लिए
कई उपक्रम करते हुए,
समझाते हो मुझे अक्सर
इश्क से बेहतर है दुनियादारी
और हर बार मैं इश्क के पक्ष में होती हूँ
और तुम
हर बार अपने तर्क पर कायम,
ज़िन्दगी को तुम अपनी शर्तों से जीते हो
इश्क से बहुत दूर रहते हो
या फिर इश्क हो न जाये
शायद इस बात से डरे रहते हो,
मुमकिन है तुम्हें इश्क
वैसे ही नापसंद हो जैसे आँसू
ग़ैरों के दर्द को महसूस करना और बात है
दर्द को ख़ुद जीना और बात,
एक बार तुम भी जी लो
मेरी ज़िन्दगी
जी चाहता है
तुम्हे श्राप दे ही दूँ
''जा तुझे इश्क हो''!

- जेन्नी शबनम (फरवरी 29, 2012)

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24 comments:

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... क्या दुआ है ...
इश्क होने पे सब संवेदनाएं अपने आप ही आ जाती हैं ...

दीपिका रानी said...

एक औरत और एक पुरुष की संवेदनाएं इतनी ही भिन्न होती हैं... सटीक चित्रण

Rajesh Kumari said...

vaah vaah jenni ji bhaavon ko kitni sundarta se sootr me piroya hai ant to bemisaal hai jaa tujhe ishq ho ...bada jabardast shraap hai.

ASHA BISHT said...

sundar rachna..

kshama said...

एक बार तुम भी जी लो
मेरी ज़िन्दगी
जी चाहता है
तुम्हे श्राप दे ही दूँ
''जा तुझे इश्क हो''!
Kya baat hai!

रविकर said...

इश्क शाप है अगर तो, कर दे बन्दा माफ़ ।
दुनियादारी में पड़ा, क्या करना इन्साफ ।

क्या करना इन्साफ, दर्द की लम्बी रेखा ।
हर चेहरे पर साफ़, सिसकती पल पल देखा ।

रविकर बदला भूल, निछावर होते जाओ ।।
घूमे मौला मस्त, शिकायत नहीं सुनाओ ।।


दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

http://dineshkidillagi.blogspot.in

वन्दना said...

जी चाहता है
तुम्हे श्राप दे ही दूँ
''जा तुझे इश्क हो………………आह!

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

Anupama Tripathi said...

bahut sunder rachna ...

रश्मि प्रभा... said...

मन की गहरी अभिव्यक्ति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
बहुत उम्दा प्रस्तुति!

dheerendra said...

एक बार तुम भी जी लो
मेरी ज़िन्दगी
जी चाहता है
तुम्हे श्राप दे ही दूँ
''जा तुझे इश्क हो''!

वाह!!!जेन्नी शबनम जी
बहुत अच्छी प्रस्तुति,इस सुंदर रचना के लिए बधाई,...

MY NEW POST ...काव्यान्जलि ...होली में...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 01-03 -2012 को यहाँ भी है

..शहीद कब वतन से आदाब मांगता है .. नयी पुरानी हलचल में .

Dr.Nidhi Tandon said...

किसी को बदुआ देनी हो ...तो यही कहना चाहिए...कि जा तुझे इश्क हो जाए

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

शबनम जी, गजब का है आपका अंदाजे बयां। इतनी साफगोई, इतनी तरलता, सचमुच आनंद आ गया।

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..की-बोर्ड वाली औरतें।
मूस जी मुस्‍टंडा...

vidya said...

वाह!!!!

सच है तभी दर्द क्या होता है ये समझ आएगा..
सुन्दर रचना जेन्नी जी...और नया टेम्पलेट डिजाइन भी :-)

mridula pradhan said...

ekdam naya andaz....bahut achcha laga.

प्रतिभा सक्सेना said...

ऐसा शाप पहली बार सुना - अनुभव का आभास हो रहा है !

Aditya said...

//एक बार तुम भी जी लो
मेरी ज़िन्दगी
जी चाहता है
तुम्हे श्राप दे ही दूँ
''जा तुझे इश्क हो''!

gazab.. ye shraap hai ya vardaan ye to aaj tak unsuljhi gutthi hi hai.. :)

palchhin-aditya.blogspot.com

सहज साहित्य said...

बातें करते करते
आँखों में आँसू भर आते हैं
हर दर्द रिसने लगता है,
मालूम है मुझे
तुम्हारी सीमाएं
तुम्हारा स्वभाव
और तुम्हारी आदतें
अक्सर सोचती हूँ
कैसे इतने सहज होते हो
फिक्रमंद भी हो और
बिंदास हँसते भी रहते हो,
कई बार महसूस किया है
मेरे दर्द से तुम्हे आहत होते हुए
देखा है तुम्हें
मुझे राहत देने के लिए
कई उपक्रम करते हुए,
जेन्नी जी आपकी ये पंक्तियां तो बेजोड़ हैं ही , ऊपर से शाप देने की बात वह भी इश्क होने का !खूब चारुता है इस कथन में । हार्दिक बधाई!

Rakesh Kumar said...

अरे बाप रे बाप!
आपने तो बहुत बेहतरीन श्राप
दे दिया है.

यह इश्क भी क्या बला है,जेन्नी जी.

क्या पता उन्हें पहले से
ही इश्क हो .क्यूँ कि इश्क का
भी तो अंदाज अपना अपना है.
हाँ,आपके श्राप से
शायद उनका इश्क भी आपके
मन माफिक हो जाए.

शानदार प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार.

आपकी पिछली पोस्टें भी समय मिलने पर
धीरे धीरे देखूंगा.अभी टायफाइड से ग्रस्त हूँ.

हिमानी said...

कोई कहता है इश्क रब है कोई कहता है इश्क शैतान है
कोई उसे वरदान समझता है और कोई इश्क होने का श्राप देता है
कैसा ये इश्क है ...अजब सा रिस्क है

amrendra "amar" said...

खुबसूरत रचना

Saras said...

दूसरी बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ ...आपकी कवितायेँ सीधी सहज और दिल से निकली हुई लगीं ...अच्छा लगा पढ़कर ..