Friday, August 17, 2012

368. संगतराश...

संगतराश...

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बोलो संगतराश 
आज कौन सा रूप तुम्हारे मन में है ?
कैसे सवाल उगे हैं तुममें ?
अपने जवाब के अनुरूप ही तो 
बुत तराशते हो तुम 
और बुत को   
एक दिल भी थमा देते हो 
ताकि जीवंत दिखे तुम्हें, 
पिंजड़े में कैद 
तड़फड़ाते पंछी की तरह  
जिसे सबूत देना है 
कि वो सांसें भर सकता है 
लेकिन उसे उड़ने की इजाज़त नहीं है 
और न सोचने की,
संगतराश, तुम
बुत में अपनी कल्पनाएँ गढते हो
चेहरे के भाव में अपने भाव मढते हो
अपनी पीड़ा उसमें उड़ेल देते हो 
न एक शिरा ज्यादा 
न एक बूँद आँसू कम
तुम बहुत हुनरमंद शिल्पकार हो,
कला की निशानी 
जो रोज़-रोज़ तुम रचते हो 
अपने तहखाने में सजा कर रख देते हो  
जिसके जिस्म की हरकतों में 
सवाल नहीं उपजते हैं 
क्योंकि सवाल दागने वाले बुत तुम्हें पसंद नहीं,
तमाम बुत   
तुम्हारी इच्छा से आकार लेते हैं 
और तुम्हारी सोच से भंगिमाएँ बदलते हैं  
और बस तुम्हारे इशारे को पहचानते हैं,
ओ संगतराश !
कुछ ऐसे बुत भी बनाओ 
जो आग उगल सके 
पानी को मुट्ठी में समेट ले 
हवा का रुख मोड़ दे
और ऐसे-ऐसे सवालों के जवाब ढूँढ लाये 
जिसे ऋषि मुनियों ने भी न सोचा हो
न किसी धर्म ग्रन्थ में चर्चा हो,
अपनी क्षमता दिखाओ संगतराश 
गढ़ दो 
आज की दुनिया के लिए 
कुछ इंसानी बुत !

- जेन्नी शबनम (अगस्त 15, 2012)

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25 comments:

expression said...

वाह....
बेहतरीन रचना......


अनु

PRAN SHARMA said...

BEHTREEN KAVITA HAI .AAPKO BADHAAEE.

Ramakant Singh said...

ओ संगतराश
कुछ ऐसे बुत भी बनाओ
जो आग उगल सके
पानी को मुट्ठी में समेट ले
हवा का रुख मोड़

गज़ब की कमाना कहूँ या चाह के साथ आपकी बातें दिलोदिमाग को झंझोड़ जाती है कि बस दिमाग कुंद सा हो जाता है

सदा said...

अपनी क्षमता दिखाओ संगतराश
गढ़ दो
आज की दुनिया के लिए
कुछ इंसानी बुत !
बेहतरीन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति

Vinay Prajapati said...

हृदयस्पर्शी नज़्म उत्कृष्ट

--- शायद आपको पसंद आये ---
1. Facebook Comment System को ब्लॉगर पर लगाना
2. चाँद पर मेला लगायें और देखें
3. गुलाबी कोंपलें

वन्दना said...

्वाह बेहतरीन

dheerendra said...

तमाम बुत तुम्हारी इच्छा से आकार लेते हैं और तुम्हारी सोच से भंगिमाएँ बदलते हैं और बस तुम्हारे इशारे को पहचानते हैं, ओ संगतराश कुछ ऐसे बुत भी बनाओ जो आग उगल सके ,,,,,,

बेहतरीन प्रस्तुति ,,,,,

RECENT POST...: शहीदों की याद में,,

Fani Raj Mani Chandan said...

Ek shabd tarashne waale ki zubaani sangtaraash ki kahaani achchhi lagi

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (19-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 19/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

vandana said...

बहुत खूबसूरत विचार

Sadhana Vaid said...

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक रचना जेनी जी ! आज सचमुच ऐसे बुतों की ज़रूरत है जो सिर्फ बुत न हों और...

जो आग उगल सके
पानी को मुट्ठी में समेट ले
हवा का रुख मोड़ दे
और ऐसे-ऐसे सवालों के जवाब ढूंढ लाये
जिसे ऋषि मुनियों ने भी न सोचा हो

बधाई इतनी सुन्दर प्रस्तुति के लिये !

वाणी गीत said...

गढ़ दो आज की दुनिया के कुछ इंसानी बुत !
बहुत आवश्यकता है !
सार्थक अपील !

उपासना सियाग said...

बहुत सुन्दर रचना .....

Reena Maurya said...

बहुत-बहुत बेहतरीन रचना...
:-)

Shanti Garg said...

very good thoughts.....
मेरे ब्लॉग

जीवन विचार
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Bharat Bhushan said...

संगतराश के आरोपित भावों से आगे के उस सृजन की तलाश इस कविता में है जो भावों को तहखाने से निकाल कर धरती की सच्चाई बना कर रख दे. बहुत खूब कविता है.

Maheshwari kaneri said...

बेहतरीन प्रस्तुति ,,,,,

Rajesh Kumari said...

सच में आज के समाज में ऐसे ही बुतों की जरूरत है जिसके दिल में आग हो जो आज के समाज से सवाल करने की हिम्मत रखता हो -----संगतराश के बिम्ब के माध्यम से बहुत सुदर सन्देश दिया है --बढ़िया प्रस्तुति जेन्नी जी

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ओ संगतराश कुछ ऐसे बुत भी बनाओ जो आग उगल सके पानी को मुट्ठी में समेट ले हवा का रुख मोड़ दे और ऐसे-ऐसे सवालों के जवाब ढूंढ लाये


बहुत गहन अभिव्यक्ति ...

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत ही अच्छी कविता |

Rakesh Kumar said...

वाह! रे संगतराश.
तेरी महिमा है न्यारी.

आप भी न जाने कितने भाव उंडेल
देती है संगतराशी में.

आभार,जेन्नी जी.

सहज साहित्य said...

संगतराश के बहाने जीवन की करवी सच्चाई का लेखा -जोखा पेश करती कविता । ये पंक्तियां बहुत अच्छी लगीं-पिंजड़े में कैद
तड़फड़ाते पंछी की तरह
जिसे सबूत देना है
कि वो सांसें भर सकता है
लेकिन उसे उड़ने की इजाज़त नहीं है
और न सोचने की, कविता का अन्तिम अंश में प्रतितोध का स्वर मुखरित हुआ है, जो कविता को और अधिक जीवन्त बन देता है

DrZakir Ali Rajnish said...

संगतराश से किया गया यह आह्वान मन को छू जाने वाला है। हार्दिक बधाई।

............
डायन का तिलिस्‍म!
हर अदा पर निसार हो जाएँ...

Madhuresh said...

जिसे सबूत देना है
कि वो सांसें भर सकता है
लेकिन उसे उड़ने की इजाज़त नहीं है
और न सोचने की...
Hridaysparshi rachna.
Aapko padhna waakayi bahut achha lagta hai..