Friday, April 26, 2013

402. जन्म का खेल (7 हाइकु)

जन्म का खेल (7 हाइकु)

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1.
हर जन्म में 
तलाशती ही रही 
ज़रा-सी नेह !

2.
प्रतीक्षारत 
एक नए युग की 
कई जन्मों से !

3.
परे ही रहा 
समझ से हमारे 
जन्म का खेल !

4.
जन्म के साथी 
हो ही जाते पराए
जग की रीत !

5.
रोज़ जन्मता 
पल-पल मर के 
है वो इंसान !

6.
शाश्वत खेल 
न चाहें पर खेलें 
जन्म-मरण !

7.
जितना सच 
है जन्म, मृत्यु भी है 
उतना सच !

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2013)

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10 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (27-04-2013) कभी जो रोटी साझा किया करते थे में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ranjana Verma said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति. जन्म का खेल.....

सदा said...

शाश्वत खेल
न चाहें पर खेलें
जन्म-मरण !
.... सभी हाइकु एक से बढ़कर एक
बेहतरीन प्रस्‍तुति

vandana gupta said...

सुन्दर हाइकू

expression said...

वाह...
जन्म से कितने सुन्दर हायकू जन्में.....

सादर
अनु

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत बढ़िया,उम्दा हाइकू !!!

Recent post: तुम्हारा चेहरा ,

Maheshwari kaneri said...

सच है जन्मो का खेल भी निराला ही होता है..बहुत सुन्दर..

mahendra verma said...

जितना सच
है जन्म, मृत्यु भी है
उतना सच !

जीवन का सबसे बड़ा सच !

राकेश कौशिक said...

शाश्वत सत्य का प्रभावशाली चित्रण

Dr. Sarika Mukesh said...

जन्म के साथी
हो ही जाते पराए
जग की रीत....

कितना दुखद होता है ये सच!
बहुत अच्छे लगे आपके हाइकू...
सादर/सप्रेम