Tuesday, August 2, 2016

521. खिड़की मर गई है...

खिड़की मर गई है...  

*******  

खिड़की सदा के लिए बंद हो गई है  
वह अब बाहर नहीं झाँकती  
ताज़े हवा से नाता टूट गया  
सूरज अब दिखता नही  
पेड़ पौधे ओट में चले गए  
बिचारी खिड़की  
उमस से लथपथ  
घुट रही है  
मानव को कोस रही है  
जिसने  
उसके आसमान को ढँक दिया है  
खिड़की उजाले से ही नहीं  
अंधेरों से भी नाता तोड़ चुकी है  
खिड़की सदा के लिए बंद हो गई है  
गोया खिड़की मर गई है ।  

- जेन्नी शबनम (2. 8. 2016)

___________________________

5 comments:

Amitabh Satyam said...

बहुत सुन्दर।

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 04 अगस्त 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

महानगर की व्यथा... मुझे तो लगता है कि खिडकी मारी नहीं, उसने खुदकुशी कर ली है!!

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर ।

Asha Joglekar said...

खिड़की के माध्यम से उस कमरे में बंद नारी की घुटन बख़ूबीबयॉंहुई है। बहुत सुंदर।