Monday, November 14, 2016

531. बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...

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बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,   
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

देस परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

जाने कितने ख्वाब संजोता   
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से खुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2016)   

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4 comments:

सहज साहित्य said...

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
बहुत अच्छी कविता।

GathaEditor Onlinegatha said...

You have to share such a wonderful post,, you can convert your text in book format
publish online book with Online Gatha

सदा said...

Behatreeeeen likha aapne ....

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17.11.2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2529 में दिया जाएगा
धन्यवाद