Monday, January 23, 2017

536. मुआ ये जाड़ा (ठंड के हाइकु 10)

मुआ ये जाड़ा  
(ठंड के हाइकु 10)

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1.  
रज़ाई बोली -  
जाता क्यों न जाड़ा,
अब मैं थकी!  

2.  
फिर क्यों आया  
सबको यूँ कँपाने,  
मुआ ये जाड़ा!  

3.  
नींद से भागे
रज़ाई मे दुबके  
ठंडे सपने!  

4.  
सूरज भागा  
थर-थर काँपता,  
माघ का दिन!  

5.  
मुँह तो दिखा -  
कोहरा ललकारे,  
सूरज छुपा!  

6.  
जाड़ा! तू जा न -  
करती है मिन्नतें,
काँपती हवा!  

7.  
रवि से डरा  
दुम दबा के भागा  
अबकी जाड़ा!  

8.  
धुंध की शाल  
धरती ओढ़े रही  
दिन व रात!  

9.  
सबको देती  
ले के मुट्ठी में धूप,  
ठंडी बयार!  

10.  
पछुआ हवा  
कुनमुनाती गाती  
सूर्य शर्माता!  

- जेन्नी शबनम (23. 1. 2017)  

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7 comments:

Udan Tashtari said...

उम्दा हाईकु!!

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 25 जनवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

सदा said...

Waaaah kya baat hai !!

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति की लिंक 26-01-2017को चर्चा मंच पर चर्चा - 2585 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Tejkumar Suman said...

अति सुन्दर रचना। बधाई

Onkar said...

सुन्दर और सामयिक हाइकु

Onkar said...

बहुत सुन्दर