सोमवार, 10 सितंबर 2018

586. चाँद रोज़ जलता है

चाँद रोज़ जलता है   

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तूने ज़ख़्म दिया तूने कूरेदा है   
अब मत कहना क़हर कैसा दिखता है।   

राख में चिंगारी तूने ही दबाई   
अब देख तेरा घर खुद कैसे जलता है।   

तू हँसता है करके बरबादी गैरों की   
गुनाह का हिसाब खुदा रखता है।   

पैसे के परों से तू कब तक उड़ेगा   
तेज़ बारिशों में काग़ज़ कब टिकता है।   

तू न माने 'शब' के दिल को सूरज जाने   
उसके कहे से चाँद रोज़ जलता है।   

- जेन्नी शबनम (10. 9. 2018)   

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5 टिप्‍पणियां:

Sudha Devrani ने कहा…

राख में चिंगारी तूने ही दबाई
अब देख तेरा घर खुद कैसे जलता है।
वाह!!!
बहुत लाजवाब....

akhileshforyou ने कहा…

very nice

RADHA TIWARI ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (12-09-2018) को "क्या हो गया है" (चर्चा अंक-3092 ) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 11/09/2018 की बुलेटिन, स्वामी विवेकानंद के एतिहासिक संबोधन की १२५ वीं वर्षगांठ “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

anuradha chauhan ने कहा…

पैसे के परों से तू कब तक उड़ेगा
तेज़ बारिशों में काग़ज़ कब टिकता है। वाह बहुत खूब 👌👌👌