मंगलवार, 20 अगस्त 2019

623. क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)

क्षणिकाएँ (10 क्षणिका)   

1.
चुटकी   

*******   

एक चुटकी नमक   
एक चुटकी सिन्दुर   
एक चुटकी ज़हर   
मुझे औरत करते रहे   
ज़िन्दगी भर।   


2. 
विद्रोही औरतें   

*******   

यूँ मुस्कुराना   
ख़ुद से विद्रोह सा लगता है   
पर समय के साथ चुपचाप   
विद्रोही बन जाती हैं औरतें   
अपने उन सवालों से घिरी हुई   
जिनके जवाब वे जानती हैं   
और वक्त पर देती हैं   
विद्रोही औरतें।   


3. 
समीकरण   

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जीवन का समीकरण   
अनुभवों का जोड़   
उम्र का घटाव   
भावनाओं का गुना भाग   
अंतत: जीवन शून्य।   


4.
ताना-बाना   

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जीवन का ताना-बाना   
उल्टा पुल्टा चलता रहा 
समय यूँ ही सधता रहा   
कभी कुछ उलझा 
कभी कुछ सुलझा 
कभी कुछ टूट कर गिरता रहा   
समय सब समझता रहा।   


5. 
मैना   

*******   

महल का एक अदना खिलौना   
सोने का एक पिंजरा   
पिंजरे में रहती थी एक मैना   
वो रूठे या हँसे परवाह किसे   
दाना पानी मिलता था जीभर   
फुर्र फुर्र उड़कर करतब दिखाती   
इतनी ही है बस उसकी कहानी   
सब कहते वह बड़ी तकदीरवाली।   


6.
बेशऊर   

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छोटी छोटी डिब्बियों में भर कर   
सीलबंद कर दिए सारे हुनर   
यूँ इसके पहले भी बेशऊर कहलाती थी   
पर अब संतोष है   
सारा हुनर ओझल है सबसे   
अब उसका अपमान नहीं होता।   


7.
दिठौना   

*******   

दिठौना तो हर रोज लगाई   
भूले से भी कभी न चूकी   
नजरें तो झुकी ही रही   
औरतपना कभी न बिसरी   
फिर ये काली परछाईं कैसी   
काला जादू हुआ ये कैसे   
ओह! मर्द औरत में   
दिठौने ने फर्क किया।  


8.
शाइस्ता   

*******   

कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ वो शाइस्ता   
जो खिदमत करे मगर शिकवा नहीं   
बेशअउरी, बेअदबी तुम्हे पसंद नहीं   
और अदब में रह कर जुल्म सहना   
इस जमाने की फितरत नहीं।   

(शाइस्ता - सभ्य / सुसंकृत)   


9.
पिछली रोटी   

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पहली रोटी भैया की   
अंतिम रोटी अम्मा की   
यही हमारी रीत है भैया   
यही मिली इक सीख है भैया   
बहुत पुराना वादा है   
कूल की ये मर्यादा है   
ये बेटी का सत है भैया   
ये औरतों का पथ है भैया।   


10.
वापसी   

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खुदा जाने क्या हो   
चीजो को भूलते भूलते   
कहीं खुद को न भूला बैठूँ   
यूँ किसी ने मुझे याद रखा भी नहीं   
अपनी याद तो खुद ही रखी अबतक   
अब जो खुद को भुला दिया   
फिर वापसी कैसे?   


- जेन्नी शबनम (20. 8. 2019)

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7 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार झा ने कहा…

सब की सब कमाल हैं और अद्भुत तेवर लिए हुए | बेहतरीन शब्द चयन और संयोजन है आपका

sudha devrani ने कहा…

जीवन का समीकरण
अनुभवों का जोड़
उम्र का घटाव
भावनाओं का गुना भाग
अंतत: जीवन शून्य।
वाह!!!
लाजवाब समीकरण है ये....
सभी क्षणिकाएं एक से बढ़कर एक है...
बहुत ही लाजवाब
वाह!!!

Neeraj Kumar ने कहा…

वाह! जीवन को शब्दों में परिभाषित करती मोहक रचनाएँ !

Nitish Tiwary ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण और सार्थक क्षणिकाएँ।

गोपेश मोहन जैसवाल ने कहा…

जेन्नी शबनम जी, आपकी दसों क्षणिकाएं नारी-शोषण को अपना पुश्तैनी हक़ समझने वाले पुरुष-प्रधान समाज पर करारे तमाचों की तरह हैं. ऐसे तमाचे खाकर हम सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि हमने क्या इंसाफ़ की देवी की आँखों पर क्या काली पट्टी इसीलिए चढ़ा रक्खी है कि वह हव्वा की बेटियों पर ढाया जाता हुआ ज़ुल्म देखकर गुनाहगार मर्द को सज़ा न दे दे?

प्रियंक वर्मा ने कहा…

सारी पंक्तिया सीधे दिल को छू जाती है |

Onkar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति