मंगलवार, 2 जून 2020

670. रंग

रंग

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बेरंग जीवन बेनूर न हो   
कर्ज में माँग लायी मौसम से ढ़ेरों रंग   
लाल पीले हरे नीले नारंगी बैगनी जामुनी   
छोटी-छोटी पोटली में बड़े सलीके से लेकर आई   
और खुद पर उड़ेल कर ओढ़ लिया मैंने इंद्रधनुषी रंग   
अब चाहती हूँ   
रंगों का कर्ज चुकाने, मैं मौसम बन जाऊँ   
मैं रंगों की खेती करूँ और खूब सारे रंग मुफ़्त में बाँटूँ   
उन सभी को जिनके जीवन में मेरी ही तरह रंग नहीं है   
जिन्होंने न रोटी का रंग देखा न प्रेम का   
न जमीन का न आसमान का   
चाहती हूँ   
अपने-अपने शाख से बिछुड़े पेट की आग का रंग ढूँढते-ढूँढते   
बेरंग सपनों में जीने वाले   
अब रंगों से होली खेलें रंगों से ही दिवाली भी   
रंगों के सपने हों रंगों की ही हकीकत हो   
रंग रंग रंग !   
क़र्ज़ क़र्ज़ क़र्ज़ !   
ओह ! मौसम ! नहीं चुकाऊँगी उधारी   
कितना भी तगादा करो चाहे न निभाओ यारी   
तुम्हारी उधारी तब तक   
जब तक मैं मौसम न बन जाऊँ।   

- जेन्नी शबनम (2. 6. 2020) 
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8 टिप्‍पणियां:

राजीव तनेजा ने कहा…

सार्थकता की ओर ले जाती सुंदर रचना

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

मौसम बनकर मौसम के रंग चुकाना है

संगीता पुरी ने कहा…

तुम्हारी उधारी तब तक
जब तक मैं मौसम न बन जाऊँ।
अच्छी अभिव्यक्ति !

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति।

Jyoti Singh ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना ,सुंदर विचार

ओढ़ लिया मैंने इंद्रधनुषी रंग
अब चाहती हूँ
रंगों का कर्ज चुकाने, मैं मौसम बन जाऊँ
मैं रंगों की खेती करूँ और खूब सारे रंग मुफ़्त में बाँटूँ
उन सभी को जिनके जीवन में मेरी ही तरह रंग नहीं है
जिन्होंने न रोटी का रंग देखा न प्रेम का
न जमीन का न आसमान का
चाहती हूँ ,बधाई हो

पवन शर्मा ने कहा…

"रोटी का रंग" नया प्रयोग....बेहतरीन।

दिगंबर नासवा ने कहा…

रंग बाँटने की सौग़ात मिले या ख़ुद के मौसम हो जाने की चाह ... मिल सकें रंग सभी को ... बहुत गहरी बात ...