रविवार, 8 मई 2016

512. माँ (मातृ दिवस पर 5 हाइकु) पुस्तक 79

माँ

*******   

1.  
छोटी-सी परी  
माँ का अँचरा थामे  
निडर खड़ी   

2.  
पराई कन्या  
किससे कहे व्यथा  
लाचार अम्मा   

3.  
पीड़ा भी पाता  
नेह ही बरसाता  
माँ का हृदय    

4.  
अम्मा की गोद  
छूमंतर हो जाता  
सारा ही सोग   

5.  
अम्मा लाचार  
प्यार बाँटे अपार  
देख संतान   

- जेन्नी शबनम (8. 5. 2016)
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रविवार, 1 मई 2016

511. कैसी ये तक़दीर (क्षणिका)

कैसी ये तक़दीर

*******  

बित्ते भर का जीवन कैसी ये तक़दीर
नन्ही-नन्ही हथेली पर भाग्य की लकीर
छोटी-छोटी ऊँगलियों में चुभती है हुनर की पीर
बेपरवाह दुनिया में सब ग़रीब सब अमीर
आख़िर हारी आज़ादी बँध गई मन में ज़ंजीर
कहाँ कौन देखे दुनिया मर गए सबके ज़मीर 

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2016)
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सोमवार, 4 अप्रैल 2016

510. दहक रही है ज़िन्दगी (तुकांत)

दहक रही है ज़िन्दगी  

*******  

ज़िन्दगी के दायरे से भाग रही है ज़िन्दगी  
ज़िन्दगी के हाशिये पर रुकी रही है ज़िन्दगी    

बेवज़ह वक़्त से हाथापाई होती रही ताउम्र  
झंझावतों में उलझकर गुज़र रही है ज़िन्दगी   

गुलमोहर की चाह में पतझड़ से हो गई यारी  
रफ़्ता-रफ़्ता उम्र गिरी ठूँठ हो रही है ज़िन्दगी   

ख़्वाब और फ़र्ज़ का भला मिलन यूँ होता कैसे  
ज़मीं मयस्सर नहीं आस्माँ माँग रही है ज़िन्दगी   

सब कहते उजाले ओढ़के रह अपनी माँद में  
अपनी ही आग से लिपट दहक रही है ज़िन्दगी   

- जेन्नी शबनम (4. 4. 2016)
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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

509. अप्रैल फ़ूल (क्षणिका)

अप्रैल फ़ूल   

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आईने के सामने रह गई मैं भौचक खड़ी  
उस पार खड़ा वक़्त ठठाकर हँस पड़ा  
बेहयाई से बोला-  
तू आज ही नहीं बनी फ़ूल   
उम्र के गुज़रे तमाम पलों में  
तुम्हें बनाया है अप्रैल फ़ूल    

- जेन्नी शबनम (1. 4. 2016)  
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गुरुवार, 24 मार्च 2016

508. फगुआ (होली के 10 हाइकु) पुस्तक 78

फगुआ  

*******  

1.  
टेसू चन्दन  
मंद-मंद मुस्काते  
फगुआ गाते   

2.  
होली त्योहार  
बचपना लौटाए  
शर्त लगाए   

3.  
रंगों का मेला  
खोया दर्द-झमेला,  
नया सवेरा   

4.  
याद दिलाते  
मन के मौसम को  
रंग-अबीर   

5.  
फगुआ बुझा,  
रास्ता अगोरे बैठा  
रंग ठिठका   

6.  
शूल चुभाता  
बेपरवाह रंग,  
बैरागी मन   

7.  
रंज औ ग़म  
रंग में नहाकर  
भूले धरम    

8.    
जाने क्या सोचा 
मेरा हाल न पूछे  
पावन रंग     

9.  
रंग बिखरा  
सिमटा न मुट्ठी में  
मन बिखरा   

10.  
रंग न सका  
होली का सुर्ख़ रंग  
फीका ये मन    

- जेन्नी शबनम (23. 3. 2016) 
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शुक्रवार, 18 मार्च 2016

507. पगडंडी और आकाश (पुस्तक - 22)

पगडंडी और आकाश 

******  

एक सपना बुन कर  
उड़ेल देना मुझ पर मेरे मीत  
ताकि सफ़र की कठिन घड़ी में  
कोई तराना गुनगुनाऊँ,  
साथ चलने को न कहूँगी  
पगडंडी पर तुम चल न सकोगे  
उस पर पाँव-पाँव चलना होता है  
और तुमने सिर्फ़ उड़ना जाना है   

क्या तुमने कभी बटोरे हैं  
बग़ीचे से महुआ के फूल  
और अंजुरी भर-भर  
ख़ुद पर उड़ेले हैं वही फूल  
क्या तुमने चखा है  
इसके मीठे-मीठे फल  
और इसकी मादक ख़ुशबू से  
बौराया है तुम्हारा मन?  
क्या तुमने निकाले हैं  
कपास से बिनौले  
और इसकी नर्म-नर्म रूई से  
बनाए हैं गुड्डे गुड्डी के खिलौने  
क्या तुमने बनाई है  
रूई की छोटी-छोटी पूनियाँ  
और काते हैं, तकली से महीन-महीन सूत? 
 
अबके जो मिलो तो सीख लेना मुझसे  
वह सब, जो तुमने खोया है  
आसमान में रहकर 
  
इस बार के मौसम ने बड़ा सताया है मुझको  
लकड़ी गीली हो गई, सुलगती नहीं  
चूल्हे पर आँच नहीं, जीवन में ताप नहीं  
अबकी जो आओ, तो मैं तुमसे सीख लूँगी  
ख़ुद को जलाकर भाप बनना  
और बिना पंख आसमान में उड़ना 
  
अबकी जो आओ  
एक दूसरे का हुनर सीख लेंगे  
मेरी पगडंडी और तुम्हारा आसमान  
दोनों को मुट्ठी में भर लेंगे  
तुम मुझसे सीख लेना  
मिट्टी और महुए की सुगंध पहचानना  
मैं सीख लूँगी  
हथेली पर आसमान को उतारना  
तुम अपनी माटी को जान लेना  
और मैं उस माटी से  
बसा लूँगी एक नयी दुनिया  
जहाँ पगडंडी और आकाश  
कहीं दूर जाकर मिल जाते हों   

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2016)  
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मंगलवार, 8 मार्च 2016

506. तू भी न कमाल करती है

तू भी न कमाल करती है  

*******  

ज़िन्दगी तू भी न कमाल करती है!  
जहाँ-तहाँ भटकती फिरती  
ग़ैरों को नींद के सपने बाँटती  
पर मेरी फ़िक्र ज़रा भी नहीं  
सारी रात जागती-जागती  
तेरी बाट जोहती रहती हूँ  

तू कहती-  
फ़िक्र क्यों करती हो  
ज़िन्दगी हूँ तो जश्न मनाऊँगी ही  
मैं तेरी तरह बदन नहीं  
जिसका सारा वक़्त   
अपनों की तीमारदारी में बीतता है  
तूझे सपने देखने और पालने की मोहलत नहीं  
चाहत भले हो मगर साहस नहीं  
तू बस यूँ ही बेमक़सद बेमतलब जिए जा  
मैं तो जश्न मनाऊँगी ही  

मैं ज़िन्दगी हूँ  
अपने मनमाफ़िक जीती हूँ  
जहाँ प्यार मिले वहाँ उड़के चली जाती हूँ  
तू और तेरा दर्द मुझे बेचैन करता है  
तूझे कोई सपने जो दूँ  
तू उससे भी डर जाती है   
''ये सपने कोई साज़िश तो नहीं''  
इसलिए तुझसे दूर बहुत दूर रहती हूँ  
कभी-कभी जो घर याद आए  
तेरे पास चली आती हूँ  

ज़िन्दगी हूँ  
मिट तो जाऊँगी ही एक दिन  
उससे पहले पूरी दुनिया में उड़-उड़कर  
सपने बाँटती हूँ  
बदले में कोई मोल नहीं लेती  
सपनों को जिलाए रखने का वचन लेती हूँ  
सुकून है मैं अकारथ नहीं हूँ  

उन्मुक्त उड़ना ही ज़िन्दगी है  
मैं भी उड़ना चाहती हूँ बेफ़िक्र अपनी ज़िन्दगी की तरह 
हर रात तमाम रात सर पर सपनों की पोटली लिए  
मन चाहता है आसमान से एक बार में पूरी पोटली  
खेतों में उड़ेल दूँ  
सपनों के फल  
सपनों के फूल  
सपनों का घर  
सपनों का संसार  
खेतों में उग जाए  
और... मैं...!  

चल तन और सपन मिल जाए  
चल ज़िन्दगी तेरे साथ हम जी आएँ  
बहुत हुई उनकी बेगारी जिनको मेरी परवाह नहीं  
बस अब तेरी सुनूँगी गीत ज़िन्दगी के गाऊँगी  

तू दुनिया सुन्दर बनाती है  
सपनों को उसमें सजाती है  
जीने का हौसला बढ़ाती है  
ज़िन्दगी तू भी न कमाल करती है!  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2016)  
(महिला दिवस)
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सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

505. मुक्ति का मार्ग (20 हाइकु)

मुक्ति का मार्ग 

***  

1.  
मुक्ति का मार्ग  
जाने कहाँ है गुम  
पसरा तम   

2.  
कैसी तलाश  
भटके मारा-मारा  
मन-बंजारा  

3.  
बहुत देखा-  
अपनों का फ़रेब  
मन कसैला

4.  
मन यूँ थका,  
ज्यों वक़्त के सीने पे  
दर्द हो रुका  

5.  
सफ़र लम्बा  
न साया, न सहारा  
जीवन तन्हा  

6.  
उम्र यूँ बीती,  
जैसे जेठ की धूप  
तन जलाती

7.  
उम्र यूँ ढली  
पूरब से पश्चिम  
किरणें चलीं  

8.  
उम्मीदें लौटीं  
चौखट है उदास  
बची न आस  

9.  
मेरा आकाश
मुझसे बड़ी दूर
है मग़रूर।

10.  
चुकता किए  
उधार के सपने  
उऋण हुए  

11.  
जीवन-भ्रम  
अनवरत क्रम  
न होता पूर्ण  

12.  
बचा है शेष-  
दर्द का अवशेष,  
यही जीवन   

13.  
मन की आँखें  
ज़िन्दगी की तासीर  
ये पहचाने  

14.  
नही ख़बर  
होगी कैसे बसर  
क्रूर ज़िन्दगी   

15.  
ये कैसा जीना  
ख़ामोश दर्द पीना  
ज़हर जैसा  

16.  
जीवन-मर्म  
दर्द पीकर जीना  
मानव जन्म   

17.  
मन-तीरथ  
अकारथ ये पथ  
मगर जाना   

18.  
ताक पे पड़ी  
चिन्दी-चिन्दी ज़िन्दगी  
दीमक लगी  

19.  
स्वाँग रचता  
यह कैसा संसार  
दर्द अपार  

20.  
मिलता वर  
मुट्ठी में हो अम्बर  
मन की चाह   

-जेन्नी शबनम (29.2.2016)  
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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

504. अर्थहीन नहीं

अर्थहीन नहीं...  

******  

जी चाहता है  
सारे उगते सवालों को  
ढेंकी में कूटकर  
सबकी नज़रें बचाकर  
पास के पोखर में फ़ेंक आएँ  
ताकि सवाल पूर्णतः नष्ट हो जाए  
और अपने अर्थहीन होने पर  
अपनी ही मुहर लगा दें  
या फिर हर एक को  
एक-एक गड्ढे में दफ़न कर  
उस पर एक-एक पौधा रोप दें  
जितने पौधे उतने ही सवाल  
और जब मुझे व्यर्थ माना जाए  
तब एक-एक पौधे की गिनती कर बता दें  
कि मेरे ज़ेहन की उर्वरा शक्ति कितनी थी  
मैं अर्थहीन नहीं थी!  

- जेन्नी शबनम (16. 2. 2016)  
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मंगलवार, 26 जनवरी 2016

503. आज का सच

आज का सच

***

थोप देते हो अपनी हर वह बात     
जो तुम चाहते हो कि मानी जाए   
बिना ना-नुकुर, बिना कोई बहस
चाहते हो कि तुम्हारी बात मानी जाए। 
   
तुम हमेशा सही हो, बिल्कुल परफ़ेक्ट   
तुम ग़लत हो ही नहीं सकते    
तुम्हारे सारे समीकरण सही हैं   
न भी हों, तो कर दिए जाते हैं। 
   
किसका मजाल, जो तुम्हें ग़लत कह सके   
आख़िर मिल्कियत तुम्हारी  
हुकूमत तुम्हारी  
हर शय ग़ुलाम 
पंचतत्व तुम्हारे अधीन   
हवा, पानी, मिट्टी, आग, आकाश   
सब तुम्हारी मुट्ठी में। 
  
इतना भ्रम, इतना अहंकार  
मन करता है, तुम्हें तुम्हारा सच बताऊँ     
जान न भी बख़्शो, तो भी कह ही दूँ-  
जो है सब झूठ  
बस एक सच, आज का सच  
''जिसकी लाठी उसकी भैंस!'' 

-जेन्नी शबनम (26.1.2016)
(गणतंत्र दिवस)
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रविवार, 17 जनवरी 2016

502. सब जानते हो तुम

सब जानते हो तुम

*******

तुम्हें याद है 
हर शाम क्षितिज पर   
जब एक गोल नारंगी फूल टँगे देखती  
रोज़ कहती-   
ला दो न   
एक दिन तुम वाटर कलर से बड़े से कागज पे  
मुस्कुराता सूरज बना हाथों में थमा दिए  
एक रोज़ तुमसे कहा- 
आसमान से चाँद-तारे तोड़के ला दो 
प्रेम करने वाले तो कुछ भी करने का दावा करते हैं  
तुम आसमानी साड़ी ख़रीद लाए   
जिसमें छोटे-छोटे चाँद-तारे टँके हुए थे 
मानो आसमान मेरे बदन पर उतर आया हो 
और उस दिन तो मैंने हद कर दी   
तुमसे कहा- 
अभी के अभी आओ 
छुट्टी लो भले तनख्वाह कटे   
तुम गाड़ी चलाओगे मुझे जाना है   
कहीं दूर  
बस यूँ ही  
बेमक़सद 
हम चल पड़े और एक छोटे से ढाबे पे रुककर  
मिट्टी की प्याली में दो-दो कप चाय  
एक-एक कर पाँच गुलाबजामुन चट कर डाली 
कैसे घूर रहा था ढाबे का मालिक 
तुम भी गज़ब हो 
क्यों मान लेते हो मेरी हर ज़िद? 
शायद पागल समझते हो न मुझे? 
हाँ, पागल ही तो हूँ  
उस रोज़ नाराज़ हो गई  
और तुम्हें बता भी दिया कि क्यों नाराज़ हूँ  
तुम्हारी बेरुखी  
या किसी और के साथ तुम्हारा होना मुझे सहन नहीं 
मुझे मनाना भी तो ख़ूब आता है तुम्हें 
नकली सूरज हो या असली रँग  
सब जानते हो तुम!   

- जेन्नी शबनम (16. 1. 2016)
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सोमवार, 16 नवंबर 2015

501. नन्हा बचपन रूठा बैठा है

नन्हा बचपन रूठा बैठा है 
  
***  

अलमारी के निचले ख़ाने में  
मेरा बचपन छुपा बैठा है  
मुझसे डरकर मुझसे रूठा बैठा है। 
  
पहली कॉपी पर पहली लकीर  
पहली कक्षा की पहली तस्वीर  
छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर  
सब हैं लिपटे, साथ यों दुबके  
ज्यों डिब्बे में बन्द ख़ज़ाना  
लूट न ले कोई पहचाना। 
  
जैसे कोई सपना टूटा, बिखरा है  
मेरा बचपन मुझसे हारा बैठा है  
अलमारी के निचले ख़ाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।     

ख़ुद को जान सकी न अब तक
ख़ुद को पहचान सकी न अब तक  
जब भी देखा ग़ैरों की नज़रों से
सब कुछ देखा और परखा भी
अपना आप कब गुम हुआ  
इसका न कभी गुमान हुआ। 
  
ख़ुद को खोकर, ख़ुद को भूलकर   
पल-पल मिटने का आभास हुआ  
पर मन के अन्दर मेरा बचपन  
मेरी राह अगोरे बैठा है 
अलमारी के निचले ख़ाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

देकर शुभकामनाएँ मुझको  
मेरा बचपन कहता है आज  
अरमानों के पंख लगा  
वह चाहे उड़ जाए आज  
जो-जो छूटा मुझसे अब तक  
जो-जो बिछुड़ा देकर ग़म  
सब बिसराकर, हर दर्द को धकेलकर  
जा पहुँचूँ उम्र के उस पल पर  
जब रह गया था वह नितान्त अकेला। 
  
सबसे डरकर सबसे छुपकर  
अलमारी के ख़ाने में मेरा बचपन  
मुझसे आस लगाए बैठा है  
आलमारी के निचले ख़ाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।  

बोला बचपन चुप-चुप मुझसे  
अब तो कर दो आज़ाद मुझको  
गुमसुम-गुमसुम जीवन बीता  
ठिठक-ठिठककर बचपन गुज़रा  
शेष बचा है अब कुछ भी क्या  
सोच-विचार अब करना क्या  
अन्त से पहले बचपन जी लो  
अब तो ज़रा मनमानी कर लो  
मेरा बचपन ज़िद किए बैठा है 
आलमारी के निचले ख़ाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

आज़ादी की चाह भले है  
फिर से जीने की माँग भले है  
पर कैसे मुमकिन आज़ादी मेरी  
जब तुझ पर है इतनी पहरेदारी  
तू ही तेरे बीते दिन है 
तू ही तो अलमारी है  
जिसके निचले ख़ाने में सदियों से मैं छुपा बैठा हूँ 
तुझसे दबकर तेरे ही अन्दर  
कैसे-कैसे टूटा हूँ, कैसे-कैसे बिखरा हूँ  
मैं ही तेरा बचपन हूँ और मैं ही तुझसे रूठा हूँ  
हर पल तेरे संग जिया, पर मैं ही तुझसे छूटा हूँ  
अलमारी के निचले ख़ाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।

-जेन्नी शबनम (16.11.2015)  
(अपने जन्मदिन पर)
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रविवार, 1 नवंबर 2015

500. उऋण

उऋण 

*******  

कुछ ऋण ऐसे हैं  
जिनसे उऋण होना नहीं चाहती  
वो कुछ लम्हे 
जिनमें साँसों पर क़र्ज़ बढ़ा  
वो कुछ एहसास  
जिनमें प्यार का वर्क चढ़ा  
वो कुछ रिश्ते  
जिनमें जीवन मिला  
वो कुछ नाते  
जिनमें जीवन खिला  
वो कुछ अपने  
जिन्होंने बेगानापन दिखाया  
वो पराए  
जिन्होने अपनापन सिखाया  
ये सारे ऋण  
सर माथे पर  
ये सब खोना नहीं चाहती  
इन ऋणों के बिना  
मरना नहीं चाहती  
ऋणों की पूर्णिमा रहे  
अमावस नहीं चाहती  
ये ऋण बढ़ते रहें  
मैं उऋण होना नहीं चाहती।  

- जेन्नी शबनम (1. 11. 2015)
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रविवार, 25 अक्टूबर 2015

499. नियति-चक्र (10 हाइकु) पुस्तक 75

नियति-चक्र 

*******
 
1. 
अपनी सुने    
नियति मग़रूर,  
मैं मज़बूर    

2. 
बदनीयत   
नियति की नीयत,    
जाल बिछाती   

3. 
स्वाँग करती    
साथी बन खेलती,    
धूर्त नियति    

4. 
नही सुनती  
करबद्ध विनती,  
ज़िद्दी नियति  

5. 
कैसे परखें,     
नियति का जो लेखा     
है अनदेखा  

6. 
खेल दिखाती    
मनमर्ज़ी करती     
दम्भी नियति  

7.   
दुःख देकर    
अट्टहास करती  
क्रोधी नियती   

8.   
नियती-चक्र   
सुख दुःख का वक्र,               
हम हैं मौन  

9. 
कैसी नियती?    
चुप भाग्य विधाता,       
कौन अपना?  

10.  
जादू की छड़ी  
नियती ने घुमाई  
खुशियाँ आई!  

- जेन्नी शबनम (25. 10. 2015)
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बुधवार, 30 सितंबर 2015

498. तुम्हारा इंतज़ार है (क्षणिका) (पुस्तक - 39)

तुम्हारा इंतज़ार है

*******

मेरा शहर अब मुझे आवाज़ नहीं देता  
नहीं पूछता मेरा हाल
नहीं जानना चाहता मेरी अनुपस्थिति की वजह
वक़्त के साथ शहर भी संवेदनहीन हो गया है
या फिर नई जमात से फ़ुर्सत नहीं   
कि पुराने साथी को याद करे
कभी तो कहे- "आ जाओ, तुम्हारा इंतज़ार है!'' 

- जेन्नी शबनम (30. 9. 2015)  
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सोमवार, 21 सितंबर 2015

497. मग़ज़ का वह हिस्सा

मग़ज़ का वह हिस्सा

***

अपने मग़ज़ के उस हिस्से को 
काट देने का मन होता है
जहाँ पर विचार जन्म लेते हैं
और फिर होती है
व्यथा की अनवरत परिक्रमा। 

जाने मग़ज़ का कौन-सा हिस्सा जवाबदेह है
जहाँ सवाल-ही-सवाल उगते हैं, जवाब नहीं उगते
जो मुझे सिर्फ़ पीड़ा देते हैं। 

उस हिस्से के न होने से
न विचार जन्म लेंगे
न वेदना की गाथा लिखी जाएगी
न कोई अभिव्यक्ति होगी 
न कोई भाषा 
न कविता

-जेन्नी शबनम (21.9.2015)
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शनिवार, 18 जुलाई 2015

496. वो कोठरी

वो कोठरी

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वो कोठरी   
मेरे नाम की
जहाँ रहती थी मैं, सिर्फ़ मैं 
मेरे अपने पूरे संसार के साथ
इस संसार को छूने की छूट
या इस्तेमाल की इजाज़त किसी को नही थी,
ताखे पर क़रीने से रखा एक टेपरिकार्डर
अनगिनत पुस्तकें और सैकड़ों कैसेट
जिस पर अंकित मेरा नाम
ट्रिन-ट्रिन अलार्म वाली घड़ी
खादी के खोल वाली रज़ाई
सफ़ेद मच्छरदानी
सिरहाने में टॉर्च
लालटेन और दियासलाई 
जाने कब कौन मेरे काम आ जाए,
लकड़ी का एक पलंग और मेज़ 
जो पापा इस्तेमाल करते थे 
अब मेरे अधिकार में था 
ताखे में ज़ीरो पावर का लाल-हरा बल्ब
जिसकी रोशनी में कैमरे का रील साफ़ कर
पापा अपना शौक़ पूरा करते थे
वह लाल-हरी बत्ती सारी रात
मेरी निगहबानी करती थी
दिवार वाली एक आलमारी
जिसमें कभी पापा की किताबें आराम करती थीं
बाद में मेरी चीज़ों को सँभालकर रखती थी,
लोहे का दो रैक
जिसने दीवारों पर टँगे-टँगे  
पापा की किताबों को हटते
और मेरे सामानों को भरते हुए देखा था
लोहे का एक बक्सा
जो मेरी माँ के विवाह की निशानी है  
मेरे अनमोल ख़ज़ाने से भरा
टेबल बन बैठा रहता था,
वह छोटी-सी कोठरी धीरे-धीरे
पापा के नाम से मेरे नाम चढ़ गई
मैं पराई हुई मगर
वह कोठरी मेरे नाम से रह गई,  
अब भी वो कोठरी मुझे सपनों मे बुलाती है
जहाँ मेरी ज़िन्दगी की निशानी है
पापा की कोठरी जो बनी थी कभी मेरी    
अब मेरे नाम की भी न रही 
वो कोठरी
    

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2015)
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शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

495. दूब (घास पर 11 हाइकु) पुस्तक 73-74

दूब

*******

1.

बारहों मास
देती बेशर्त प्यार
दुलारी घास
   

2.
नर्म-नर्म-सी 
हरी-हरी ओढ़नी  
भूमि ने ओढ़ी    

3.
मोती बिखेरे    
शबनमी दूब पे,  
अरूणोदय
  

4.
दूब की गोद
यूँ सुखद प्रतीति  
ज्यों माँ की गोद
  

5.
पीली हो गई 
मेघ ने मुँह मोड़ा    
दूब बेचारी   

6.
धरा से टूटी
ईश के पाँव चढ़ी
पावन दूभी
  

7.
तमाम रात
रोती रही है दूब
अब भी गीली
  

8.
नर्म बिछौना
पथिक का सहारा
दूब बेसुध
  

9.
कभी आसन
कभी बनी भोजन,
कृपालु दूर्वा  

10.
ठंड व गर्म
मौसम को झेलती
अड़ी रहती !

11.
कर्म पे डटी
कर्तव्यपरायणा,
दूर्वा-जीवन
   

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2015)
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शुक्रवार, 29 मई 2015

494. दर्द (दर्द पर 20 हाइकु)

दर्द 

***

1.  
बहुत चाहा    
दर्द की टकसाल
नहीं घटती 

2.
दर्द है गंगा
यह मन गंगोत्री-
उद्गमस्थल। 
 

3.
मालूम होता
गर दर्द का स्रोत,
दफ़ना देते। 
  

4.
दर्द पिघला
बादल-सा बरसा
ज़माने बाद। 
 

5.
किस राह से
मन में दर्द घुसा,  
नहीं निकला। 
 

6.
टिका ही रहा
मन की देहरी पे,
दर्द अतिथि। 
 

7.
बहुत मारा
दर्द ने चाबुक से,  
मन छिलाया। 
 

8.
तू न जा कहीं,

दर्द के बिना जीना
आदत नहीं। 
 

9. 
यूँ तन्हा किया  
ज्यों चकमा दे दिया,  
निगोड़ा दर्द। 
  

10.
ये आसमान    
दर्द से रोता रहा,  
भीगी धरती।  

11.
सौग़ात मिली
प्रेम के साथ दर्द,  
ज्यों फूल-काँटे। 
  

12.
मन में खिले 
हर दर्द के फूल
रंग अनूठे। 
  

13.
तमाम रात
कल लटका रहा  
तारों-सा दर्द। 
  

14.
क़ैद कर दूँ
पिंजरे में दर्द को
जी चाहता है। 
  

15.
फुर्र से उड़ा
ज्यों ही तू घर आया
दर्द का पंछी। 
  

16. 
ज्यों ख़ाली हुई 
मन की पगडंडी,
दर्द समाया। 
  

17.
रोके न रुका, 
बेलगाम दौड़ता   
दर्द है आया।   

18. 
प्यार भी देता
मीठा-मीठा-सा दर्द,   
यही तो मज़ा। 
  

19. 
दर्द उफना,  
बदरा बन घिरा,    
आँखों से गिरा।   

20.
छुप न सका,
आँखो ने चुगली की  
दर्द है दिखा। 
   

-जेन्नी शबनम (22.5.2015) 
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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

493. सरल गाँव (गाँव पर 10 हाइकु)

सरल गाँव 

***

1.
जीवन त्वरा
बची है परम्परा,     
सरल गाँव  

2.
घूँघट खुला, 
मनिहार जो लाया
हरी चूड़ियाँ। 

3.
भोर की वेला 
बनिहारी को चला   
खेत का साथी। 

4.
पनिहारिन 
मन की बतियाती  
पोखर सुने। 

5.
दुआ-नमस्ते
गाँव अपने रस्ते
साँझ को मिले। 

6.
खेतों ने ओढ़ी
हरी-हरी ओढ़नी
वो इठलाए। 

7.
असोरा ताके
कब लौटे गृहस्थ
थक हारके। 

8.
महुआ झरे
चुपचाप से पड़े,
सब विदेश। 

9.
उगा शहर
खंड-खंड टूटता
ग़रीब गाँव। 

10.
बाछी रम्भाए
अम्मा गई जो खेत
चारा चुगने। 
____________________
बनिहारी- खेतों में काम करना 
असोरा- ओसारा, दालान 
चुगने- एकत्र करना
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-जेन्नी शबनम (19.3.2015) 
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बुधवार, 1 अप्रैल 2015

492. दुःखहारणी

दुःखहारिणी

***

जीवन के तार को साधते-साधते   
मन-रूपी उँगलियाँ छिल गई हैं   
जहाँ से रिसता हुआ रक्त   
बूँद-बूँद धरती में समा रहा है 
मेरी सारी वेदनाएँ सोखकर 
धरती पुनर्जीवन का रहस्य बताती है  
हारकर जीतने का मन्त्र सुनाती है।    

जानती हूँ  
सम्भावनाएँ मिट चुकी हैं   
सारे तर्क व्यर्थ ठहराए जा चुके हैं  
पर कहीं-न-कहीं जीवन का कोई सिरा  
जो धरती के गर्भ में समाया हुआ है  
मेरी उँगलियों को थाम रखा है 
हर बार अन्तिम परिणाम आने से ठीक पहले  
यह धरती मुझे झकझोर देती है    
मेरी चेतना जागृत कर देती है
और मुझमें प्राण भर देती है। 
    
यथासम्भव चेष्टा करती हूँ 
जीवन प्रवाहमय रहे
भले पीड़ा से मन टूट जाए
पर कोई जान न पाए  
क्योंकि धरती जो मेरी दुःखहारणी है
मेरे साथ है।  

-जेन्नी शबनम (1.5.2015)
(मज़दूर दिवस)
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रविवार, 15 मार्च 2015

491. युद्ध (क्षणिका)

युद्ध

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अबोले शब्द पीड़ा देते हैं
छाती में बहता ख़ून धक्के मारने लगा है
नियति का बहाना अब पुराना-सा लगता है,
जिस्म के भीतर मानो अँगारे भर दिए गए हैं  
जलते लोहे से दिल में सुराख़ कर दिए गए हैं
फिर भी बिना लड़े बाज़ी जीतने तो न देंगे
हाथ में क़लम ले जिगर चीर देने को मन उतावला है
बिगुल बज चूका है, युद्ध का प्रारंभ है।

- जेन्नी शबनम (15. 3. 2015)
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रविवार, 8 मार्च 2015

490. क्या हुक्म है मेरे आका

क्या हुक्म है मेरे आका

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अकसर सोचती हूँ 
किस ग्रह से मैं आई हूँ 
जिसका ठिकाना 
न कोख में, न घर में, न गाँव में, न शहर में  
मुमकिन है, उस ख़ुदा के घर में भी नहीं, 
अन्यथा क्रूरता के इस जंगल में 
बार-बार मुझे भेजा न गया होता 
चाहे जन्मूँ चाहे क़त्ल होऊँ 
चाहे जियूँ चाहे मरूँ 
चाहे तमाम दर्द के साथ हँसूँ, 
पग-पग पर एक कटार है 
परम्परा का, नातों का, नियति का 
जो कभी कोख में झटके से घुसता है 
कभी बदन में ज़बरन ठेला जाता है 
कभी कच्ची उम्र के मन को हल्के-हल्के चीरता है 
जरा-ज़रा सीने में घुसता है 
घाव हर वक़्त ताज़ा 
तन से मन तक रिसता रहता है,  
जाने ये कौन सा वक़्त है 
कभी बढ़ता नहीं 
दिन महीना साल सदी, कुछ बदलता नहीं 
हर रोज़ उगना-डूबना 
शायद सूरज ने अपना शाप मुझे दे दिया है, 
मेरी पीर 
तन से ज़्यादा, मन की पीर है 
मैं बुझना चाहती हूँ, मैं मिटना चाहती हूँ 
बेघरबार हूँ 
चाहे उस स्वर्ग में जाऊँ, चाहे इस नरक में टिकूँ, 
बहुत हुआ 
अब उस ग्रह पर लौटना चाहती हूँ 
जहाँ से इस जंगल में शिकार होने के लिए 
मुझे निहत्था भेजा गया है, 
जाकर शीघ्र लौटूँगी अपने ग्रह से 
अपने हथियार के साथ 
फिर करूँगी 
उन जंगली जानवरों पर वार
जिन्होंने अपने शौक के लिए मुझे अधमरा कर दिया है
मेरी साँसों को बंधक बना कर रखा है
बोतल के जिन की तरह, जो कहे-
''क्या हुक्म है मेरे आका!''

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2015)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) 
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शुक्रवार, 6 मार्च 2015

489. इन्द्रधनुषी रंग (होली पर 10 हाइकु) पुस्तक 69,70

इन्द्रधनुषी रंग

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1.
तन पे चढ़ा
इन्द्रधनुषी रंग
फगुआ मन।    

2.
नाचे बहार
इठलाती है मस्ती
रंग हज़ार।  

3.
गिले-शिकवे  
कपूर से हैं उड़े   
होली मिलन। 

4.
रंग में भीगी
पर नहीं रंगीली  
बेरंग होली।  

5.
खेलूँगी होली
तेरी यादों के साथ
तू नहीं पास।  

6.
होली लजाई
वसंत ने जो छेड़े
फगुआ-तान।  

7.
कच्ची अमिया
फगुआ में नहाई
मुरब्बा बनी। 

8.
है हुड़दंग
हवा ने छानी भंग  
झूमे मलंग।   

9.
आम्र-मंजरी 
डाल पे हैं झूलती 
गाए फगुआ।   

10.
काहे न टिके
रंगों का ये मौसम
बारहों मास।  

- जेन्नी शबनम (5. 3. 2015)
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मंगलवार, 3 मार्च 2015

488. स्त्री की डायरी (क्षणिका)

स्त्री की डायरी

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स्त्री की डायरी उसका सच नहीं बाँचती    
स्त्री की डायरी में उसका सच अलिखित छपा होता है  
इसे वही पढ़ सकता है, जिसे वो चाहेगी   
भले दुनिया अपने मनमाफ़िक  
उसकी डायरी में हर्फ़ अंकित कर ले।    

- जेन्नी शबनम (3. 3. 2015)
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रविवार, 1 मार्च 2015

487. वासन्ती प्यार (वसंत ऋतु पर 5 हाइकु) पुस्तक 69

वासन्ती प्यार  

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1.  
वासन्ती प्यार    
नस-नस में घुली,   
हँसी, बहार।   

2.
वासन्ती धुन  
आसमान में गूँजे  
मनवा झूमे।   

3.
प्रणय पुष्प
चहुँ ओर है खिला  
रीझती फ़िज़ा।  

4.
मन में ज्वाला 
मरहम लगाती    
वसन्ती हवा।   

5.
बसन्ती रंग 
छितराई सुगंध  
फूलों के संग।   

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2015)
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

486. धृष्टता

धृष्टता

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जितनी बार तुमसे मिली 
ख़्वाहिशों ने जन्म लिया मुझमें  
जिन्हें यकीनन पूरा नहीं होना था  
मगर दिल कब मानता है?  
यह समझती थी
तुम अपने दायरे से बाहर न आओगे
फिर भी एक नज़र देखने की आरज़ू
और चुपके से तुम्हें देख लेती
नज़रें मिलाने से डरती
जाने क्यों खींचती हैं तुम्हारी नज़रें?
अब भी याद है
मेरी कविता पढ़ते हुए
उसमें ख़ुद को खोजने लगे थे तुम  
अपनी चोरी पकड़े जाने के डर से
तपाक से कह उठी मैं-
''पात्र को न खोजना''
फिर भी तुमने ख़ुद को खोज ही लिया उसमें
मेरी इस धृष्टता पर मुस्कुरा उठे तुम
और चुपके से बोले-
''प्रेम को बचा कर नहीं रखो''   
मैं कहना चाहती थी-
बचाना ही कब चाहती हूँ
तुम मिले जो न थे तो ख़र्च कैसे करती  
पर, कह पाना कठिन था  
शायद जीने से भी ज़्यादा
अब भी जानती हूँ 
महज़ शब्दों से गढ़े पात्र में तुम ख़ुद को देखते हो 
और बस इतना ही चाहते भी हो
उन शब्दों में जीती मैं को 
तुमने कभी नहीं देखा या देखना ही नहीं चाहा 
बस कहने को कह दिया था
फिर भी एक सुकून है
मेरी कविता का पात्र
एक बार अपने दायरे से बाहर आ
मुझे कुछ लम्हे दे गया था
।    

- जेन्नी शबनम (26. 2. 2015)
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शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

485. लम्हों का सफ़र (पुस्तक 89)

लम्हों का सफ़र 

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आसमान की विशालता  
जब अधीरता से खींचती है  
धरती की गूढ़ शिथिलता  
जब कठोरता से रोकती है  
सागर का हठीला मन
जब पर्वत से टकराता है  
तब एक आँधी
मानो अट्टहास करते हुए गुज़रती है  
कलेजे में नश्तर चुभता है   
नस-नस में लहू उत्पात मचाता है  
वक़्त का हर लम्हा, काँपता थरथराता   
ख़ुद को अपने बदन में नज़रबंद कर लेता है।    

मन हैरान है, मन परेशान है   
जीवन का अनवरत सफ़र
लम्हों का सफ़र
जाने कहाँ रुके, कब रुके  
जीवन के झंझावत, अब मेरा बलिदान माँगते हैं
मन न आह कहता है, न वाह कहता
कहीं कुछ है, जो मन में घुटता है
पल-पल मन में टूटता है
मन को क्रूरता से चीरता है।    

ठहरने की बेताबी, कहने की बेक़रारी
अपनाए न जाने की लाचारी
एक-एक कर, रास्ता बदलते हैं
हाथ की लकीर और माथे की लकीर
अपनी नाकामी पर
गलबहिया डाले, सिसकते हैं।    

आकाश और धरती
अब भावविहीन हैं
सागर और पर्वत चेतनाशून्य हैं
हम सब हारे हुए मुसाफ़िर
न एक दूसरे को ढाढ़स देते हैं
न किसी की राह के काँटे बीनते हैं
सब के पाँव के छाले
आपस में मूक संवाद करते हैं।    

अपने-अपने, लम्हों के सफ़र पर निकले हम
वक़्त को हाज़िर नाज़िर मानकर
अपने हर लम्हे को यहाँ दफ़न करते हैं   
चलो अब अपना सफ़र शुरू करते हैं।  

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2015)
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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

484. मन! तुम आज़ाद हो जाओगे

मन! तुम आज़ाद हो जाओगे  

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अक्स मेरा मन मुझसे उलझता है  
कहता है- 
वो सारे सच जिसे मन की तलहटी में  
जाने कब से छुपाया है मैंने  
जगज़ाहिर कर दूँ।  
चैन से सो नहीं पाता है वो
सारी चीख़ें, हर रात उसे रुलाती हैं
सारी पीड़ा भरभराकर  
हर रात उसके सीने पर गिर जाती हैं  
सारे रहस्य हर रात कुलबुलाते हैं
और बाहर आने को धक्का मारतें हैं    
इस जद्दोज़हद में गुज़रती हर रात  
यूँ लगता है 
मानो आज आख़िरी है।  
लेकिन सहर की धुन जब बजती है  
मेरा मन ख़ुद को ढाढ़स देता है
बस ज़रा-सा सब्र और कर लो
मुमकिन है एक रोज़ 
जीवन से शब बिदा हो जाएगी  
उस आख़िरी सहर में  
मन! तुम आज़ाद हो जाओगे।  

- जेन्नी शबनम (10. 2. 2015)
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