1.
मन गुल्लक
ख़ुशियों का ख़ज़ाना
ख़त्म न होता।
2.
मन है बना
ख़ुशियों का गुल्लक
कोई न लूटे।
3.
भर के रखो
ख़ुशियों का गुल्लक
भले ही टूटे।
4.
भरा गुल्लक
ख़ुशियों का रुपया
मेरा ख़ज़ाना।
5.
मेरा गुल्लक
ख़ुशियों से है भरा
कभी न टूटा।
जीकर देखना है
***
जीवन तो जी लिया
कभी अपने लिए जीकर देखा क्या?
सच ही है
जीते-जीते जीना कब कोई भूल जाता
कुछ पता नहीं चलता
तभी तो कोई पूछता है-
कभी अपने लिए जीकर देखा है?
यह तो यूँ है जैसे कोई नदी से पू
बादलों से पूछे- तुमने बारिश
आग से पूछे- तुमने जलकर देखा है
सूरज से पूछे- तुमने
सबकी फ़ितरत एक जैसी है
अनवरत नियमों के साथ रहना
पर मैं क्यों प्रकृति के विरुद्ध?
साँसें का चलना, दिल का धड़कना
यही तो नियम है
पर मैं प्रफुल्लित क्यों नहीं?
नदी-बादल-आग-सूरज
वे तल्लीन हैं अपने बहाव में
अकेले होकर भी ख़ुश
प्रकृति के नियमों से बँधे, सिर्फ़ अपने साथ
न कोई हड़बड़ी, न घबराहट
न कुछ छूटने का डर, न कुछ पाने की लालसा
शायद यही जीवन है
फ़लसफ़ा भले कुछ भी हो
पर सत्य तो यही है
ये प्रवाहमय होकर दूसरों को सुख
स्वयं भी आह्लादित रहते हैं।
प्रवाहमान तो मैं भी हूँ
पर न मैं ख़ुश हूँ, न कोई मु
यह कैसा जीवन?
न अपने लिए है, न किसी के लिए
मैंने कभी जीकर क्यों न देखा?
शायद जीकर देखा होता
सिर्फ़ अपने लिए जीकर देखा होता
तो बात ही कुछ और होती
प्रकृति ने हँसने को कहा
मैंने जबरन हँसी ओढ़ी
मुझसे कहा गया कि नाचूँ-गाऊँ
मैंने सिनेमा का कोई दृश्य चला
सबने कहा फ़र्ज़ निभाओ
ख़ामोशी से फ़र्ज़ निभा दिया
इन सब में मैं कहाँ?
यह यायावर मन न अपना, न किसी का
शहर के बियाबान में भटककर
आकाश में एक चिनगारी ढूँढता।
अब भी समय है
आस है तो प्राण है
प्राण है तो जीवन है
भले कुछ भी अपना नहीं
न सगा न सखा
पर जीवन तो है
एक बार अपने लिए जीकर देखना है।
जन्मदिन
***
1.शहर के पाँ
***
शहर के पाँकाँच के ख़्वाब
***
काँच के ख़्वाब
फेरे जो करवट
चकनाचूर
हुए सब-के-सब,
काँच के ख़्वाब
दूसरा करवट
लगे पलने
फेरे जो करवट
चकनाचूर
फिर सब-के-सब,
डर लगता
कहीं नींद जो आई
काँच के ख़्वाब
पनपने न लगे,
ख़्वाब देखना
हर पल टूटना
अनवरत
मानो टूटता तारा
आसमाँ रोता
मन यूँ ही है रोता,
ख़्वाब देखता
करता नहीं नागा
मन बेचारा
ज्यों सूरज उगता,
हे मन मेरा!
समझ तू ये खेला
काँच का ख़्वाब
यही नसीब तेरा
न देख ख़्वाब
जिसे होना न पूरा,
चकोर ताके
चन्दा है मुस्कुराए
मुँह चिढ़ाए
पहुँच नहीं पाए
जान गँवाए
यूँ ही काँच के ख़्वाब
मन में पले
उम्मीद है जगाए,
पूरे न होते
फेरे जो करवट
चकनाचूर
होते सब-के-सब
मेरे काँच के ख़्वाब।
-जेन्नी शबनम (25.9.2023)
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पहली या अन्तिम बार
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याद करने के लिए कुछ ख़ास ज़रू
मसलन पहली या अन्तिम बार मिलना।
किसी ख़ास वक़्त में किसी ख़ास जगह पर मिलना
चाय-कॉफ़ी पर चर्चा करना
प्यार की बातें करना, संसार की
सुख-दुःख बाँटना
बिना बात किए चुपचाप चलना
बेवजह मुस्कुराना, किसी बात पर
या और भी बहुत कुछ जो साझा किया
पहली या अन्तिम बार।
कोई भी बात
दूसरी बार के बाद विस्मृत हो जा
पहली और अन्तिम के बीच का वक़्त
न मुट्ठी में टिकता है न ज़े
सब कुछ सपाट व सरपट भाग जाता है
जाने ऐसा क्यों है?
निशान तो होता है समय के पास
पर दिखता कुछ नहीं
हाँ, ख़ुद को याद दिलाना होता है
पहली और अन्तिम के बीच
कुछ बहुत ख़ास जो गुज़रा होता है
जीवन के वे सभी पल जो बीत चुके
उस वक्त को मुठ्ठी में समेटना
और ज़ेहन में भरना ज़रूरी है
क्या मालूम
कालचक्र पहली और अन्तिम यादें मि
फिर कुछ तो रह जाएगा यादों में
जीवन के संध्या में मुस्कुराने
या अन्तिम क्षणों में सब जी ले
-जेन्नी शबनम (11.9.2023)
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