खण्डहर
मन का खण्डहर होना
सिर्फ़ मन के संज्ञान में होता है।
सिर्फ़ समय का नाता है
कभी एक पल लगता है, तो कभी कई जन्म।
नए महलों को मालूम नहीं होता
सबका भविष्य एक ही जैसा है
समय कभी किसी को नहीं बख़्शता है।
शरीर का खण्डहर बनना ज़माना देखता है
पर मन पुख़्ता है, कोई नहीं देखता
शरीर के साथ मन भी तिरस्कृत होता है
साबुत मन उम्र भर, टूटे जिस्म को ढोता है।
कि उसके गौरवशाली इतिहास का कोई साक्षी
उसके ख़ुशहाल अतीत की गवाही दे
और अदालत का फ़ैसला उसको सुनाई दे।
उसके खण्डहर तन में वह ख़ास पल
मृत्योपरान्त भी जीता है
ऐसा लगता है मानो शरीर बीता है
तन खण्डहर हो जाता है
परवाह नहीं कि जीवन कितना, मृत्यु कब
पर एक चाह है, जो जाती नहीं
कोई आए, हाल पूछे, ज़रा बैठे
साथ न दे, साथ का भरोसा ही दे।
खण्डहर में तब्दील होने के गवाहों ने
तमाशा देखा, सुकून पाया
खण्डहर के ख़ज़ानों की बोली लगी है
अब सारे तमाशबीन खण्डहर के मालिक हैं।
खण्डहर बना देता है
किसी भी खण्डहर में एक-न-एक फूल खिल जाता है
मौसम ज़िन्दगी पैदा करता है, पत्थर में साँसे भरता है
उसका प्यार, दुलार, अधिकार था
उसके रिश्तों का आधार था
अगर कभी याद आए तो खण्डहर के अतीत में
अपने दम्भ को याद करने जाता है
इसे मैंने मारा है सोचकर मुस्कुराता है
पर मौसम के लिए खण्डहर भी प्यार है
उसके लिए अब भी एक नक्शा है, एक आकार है।