Wednesday, July 7, 2010

153. अल्लाह ! ये कैसा सफ़र मैं कर आई... / allah ! ye kaisa safar main kar aai...

अल्लाह ! ये कैसा सफ़र मैं कर आई...

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एक लम्हे की बात थी
और सदियाँ गुज़र गईं,
मंज़िल नज़दीक थी
और ज़िन्दगी खो गई !

कुछ कदम थे बढ़े
कुछ कदम थे घटे,
जाने ये कैसा फ़साना
समझ कभी न पाई !

रूह भी हुई अब मिट्टी
मिट्टी में सो गई सिसकी,
तकदीर पर इल्ज़ाम
और दी ख़ुदा की दुहाई !

ग़र चल सको तो चलो
या लौट जाओ इसी पल,
न थी कुवत साथ मरने की
और जीने की कसम उसने खाई !

कह दिया होता उसी पल
बेमकसद है सदियों का सफ़र,
अब हर पहर हुआ ज़ख़्मी
अल्लाह ! ये कैसा सफ़र मैं कर आई !

- जेन्नी शबनम ( 7. 7. 2010)

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allah ! ye kaisa safar main kar aai...

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ek lamhe ki baat thi
aur sadiyaan guzar gaeen,
manzil nazdik thi
aur zindagi kho gai !

kuchh kadam they badhe
kuchh kadam they ghate,
jaane ye kaisa fasaana
samajh kabhi na paai !

rooh bhi hui ab mitti
mitti men so gai siski,
takdir par ilzaam
aur dee khuda ki duhaai !

gar chal sako to chalo
ya lout jaao isi pal,
na thi kuvat saath marne ki
aur jine ki kasam usne khaai !

kah diya hota usi pal
bemaksad hai sadiyon ka safar,
ab har pahar hua zakhmi
allah...ye kaisa safar main kar aai !

- Jenny Shabnam (7. 7. 2010)

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7 comments:

kshama said...

एक लम्हे की बात थी
और सदियाँ गुज़र गईं,
मंज़िल नज़दीक थी
और ज़िन्दगी खो गई !
Subhanallah,kya gazab likh gayin aap..harek shabd,harek pankti dil me utarti rahi,paiwast hoti rahi...!

Udan Tashtari said...

गज़ब!! बहुत उम्दा रचना!!

रश्मि प्रभा... said...

kya likhti hain, safar jo ho, ye shabdon kee kyaari usmein bhawnaaon ke phool adbhut hain

वन्दना said...

उफ़ …………………दर्द ही दर्द उतार दिया है।

राकेश कौशिक said...

दर्दे दास्ताँ - खूब कही

अनामिका की सदाये...... said...

फिर भी तुझको चलना होगा...तुझको चलना होगा..वाला गीत याद आ गया..

सुन्दर रचना.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार 13 जुलाई को आपकी रचना ..( एक राह और एक प्याली )... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/