Tuesday, September 14, 2010

173. अज्ञात शून्यता... / agyaat shoonyata...

अज्ञात शून्यता...

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एक शून्यता में
प्रवेश कर गई हूँ
या कि मुझमें
शून्यता प्रवाहित हो गई है,
थाह नहीं मिलता
किधर खो गई हूँ
या जान बुझकर
खो जाने दी हूँ स्वयं को !

कँपकपाहट है
और डर भी
बदन से छूट जाना चाहते
अंग मेरे सभी,
हाथ में नहीं आता
कोई ओस-कण
थर्रा रहा काल
कदाचित महाप्रलय है !

मुक्ति की राह है
या फिर कोई भयानक गुफ़ा,
क्यों खींच रहा मुझे
जाने कौन है उस पार ?
शून्यता है पर
संवेदनशून्यता क्यों नहीं ?
नहीं समझ मुझे
यह क्या रहस्य है,
मेरा या मेरी इस
अज्ञात शून्यता का !

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2010)

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agyaat shoonyata...

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ek shoonyata mein
pravesh kar gai hun
ya ki mujhmein
shoonyata pravaahit ho gai hai,
thaah nahin milta
kidhar kho gai hun
ya jaan bujhkar
kho jaane dee hun svayam ko !

kanpkapaahat hai
aur darr bhi
badan se chhut jana chaahte
ang mere sabhi,
haath mein nahin aataa
koi os-kan,
tharra raha kaal
kadaachit mahapralay hai !

mukti ki raah hai
ya fir koi bhayaanak gufa,
kyon kheench raha mujhe
jaane koun hai us paar ?
shoonyata hai par
samvedanshunyata kyon nahin?
nahin samajh mujhe
yeh kya rahasya hai,
mera ya meri is
agyaat shoonyata ka !

- jenny shabnam (14. 9. 2010)

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8 comments:

अशोक बजाज said...

आपका पोस्ट सराहनीय है. बधाई

रश्मि प्रभा... said...

is rahasya ko rahasya hi rahne den , shunyta me koi kiran dikhe shabdon se - mumkin hai , bahut hi achhi rachna................

vatvriksh ke liye ise bhejen

Shekhar Suman said...

bahut khub likha hai aapne....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति ....

ρяєєтι said...

bahut hi bhaawuk rachna... tooo good di..

राकेश कौशिक said...

इस शैली में पहली बार आपकी सुंदर रचना पढने को मिली - धन्यवाद्

kishor kumar khorendra said...

अज्ञात शून्यता...

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एक शून्यता में
प्रवेश कर गई हूँ,
या कि मुझमें
शून्यता प्रवाहित हो गई है,

jal me ghada duba ho
tab ..
थाह नहीं मिलता
किधर खो गई हूँ,
या जान बुझकर
खो जाने दी हूँ स्वयं को !

ha ajib lagata hai
jab shunyata ka ahsaas hota hai

कंपकपाहट है
और डर भी,
बदन से छूट जाना चाहते
सभी अंग मेरे,
हाथ में नहीं आता
कोई ओस-कण,

haa os bund ya tinke ka bhi aashray nahin hota tab
थर्रा रहा काल
कदाचित महाप्रलय है !

मुक्ति की राह है
या फिर कोई भयानक गुफ़ा,
क्यों खींच रहा मुझे
जाने कौन है उस पार?
haa shunyata me apaar shakti hai
vah khichata hai
tab ham rahate hai
n deh
n man
n reshte naate
शून्यता है पर
संवेदनशून्यता क्यों नहीं?

sanvedana me shunyata ki aatma
ka aabhaas hota hain
lekin vah kitna

ksht prad hai

aanandmay ...?
नहीं समझ मुझे
ये रहस्य क्या है,
मेरा या मेरी इस
अज्ञात शून्यता का!

bahut khub ...


__ जेन्नी शबनम __ १४. ०९. २०१०

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

बहुत ही सुन्दर मार्मिक कविता जो हर संवेदनशील हृदय की हो सकती है . वाह .