Wednesday, May 11, 2011

सपने पलने के लिए जीने के लिए नहीं...

सपने पलने के लिए जीने के लिए नहीं...

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कामनाओं की एक फेहरिस्त
बना ली हमने
कई छोटी छोटी चाह
पाल ली हमने
छोटे छोटे सपने
एक साथ सजा लिए हमने|
आँखें मूंद बगल की सीट पर बैठी मैं
तेज़ रफ़्तार गाड़ी
जिसे तुम चलाते हुए
मेरे बालों को सहलाते भी रहो और
मेरे लिए कोई गीत गाते भी रहो
बहुत लम्बी दूरी तय करें
बेमकसद
बस एक दूसरे का साथ
और बहुत सारी खुशियाँ,
तुम्हारे हाथों बना कोई
खाना
जिसे कौर कौर मुझे खिलाओ
और फिर साथ बैठ कर
बस मैं और तुम
खेलें कोई खेल,
हाथों में हाथ थामे
कहीं कोई
ऐतिहासिक धरोहर
जिसके कदम कदम पर छोड़ आयें
अपने निशाँ,
कोई एक सम्पूर्ण दिन
जहाँ बातों में
वक़्त में
सिर्फ हम और तुम हों|
तुम्हारी फेहरिस्त में महज़ पांच-छः सपने थे और
मैंने हज़ारों जोड़ रखे थे,
जानते हुए कि एक एक कर सपने टूटेंगे और
ध्वस्त सपनों के मज़ार पर
मैं अकेली बैठी
उन यादों को जीयूँगी,
जो अनायास
बिना सोचे
मिलने पर हमने किये थे,
मसलन
नेहरु प्लेस पर यूँ हीं घूमना
मॉल में पिक्चर देखते हुए कहीं और खोये रहना
हुमायूं का मकबरा जाते जाते
कुतुबमीनार देखने चल देना|
तुमको याद है न
तुम्हारा बनाया आलू का पराठा
जिसका अंतिम निवाला मुझे खिलाया तुमने,
अस्पताल का चिली फ्रेंच फ्राई
जिसे बड़ी चाव से खाया हमने
और उस दिन फिर कहा तुमने
कि चलो वहीं चलते हैं,
हंसकर मैंने कहा था
धत्त...
अस्पताल कोई घुमने की जगह है
या खाने की!
जब भी मिले हम
फेहरिस्त में कुछ नए सपने
और जोड़ लिए,
पुराने सपने वहीं रहे
जो पूरे होने केलिए शायद थे हीं नहीं,
जब भी मिले
पुराने सपने भूल
एक अलग कहानी लिख गए|
अचानक कैसे सब कुछ ख़त्म हो जाता है
क्यों देख लिए जाते ऐसे सपने
जिनमें एक भी पूरे नहीं होने होते,
फेहरिश्त आज भी
मेरे मन पर गुदी हुई है,
जब भी मिलना
चुपचाप पढ़ लेना
कोई इसरार न करना,
फेहरिस्त के सपने, सपने हैं
सिर्फ पलने के लिए, जीने के लिए नहीं!

__ जेन्नी शबनम __ 9. 5. 2011

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10 comments:

vishwagatha said...

कई छोटी छोटी चाह
पाल ली हमने
छोटे छोटे सपने
एक साथ सजा लिए हमने|

जेन्नी, बहुत सुन्दर भावों से सजी कविता के लिए बधाई | राजेशजी को भैया का स्मरण |

***Punam*** said...

सपने सपने होते हैं....

पूरे कब होते हैं..!

बसा के रखना

इन्हें आँखों में ही....

आज रात को

फिर देखेंगे हम

साथ-साथ.....!

संजय भास्कर said...

कितने गहरे भाव छुपा रखे है आपने बस कुछ पंक्तियों में...बहुत सुंदर...धन्यवाद।

SAJAN.AAWARA said...

SAPNO KI NAV PAR SAWAR HOKAR HUM UTNA DUR NAHI JAA SAKTE, JITNA KI HAKIKAT ME TERKAR. .
BAHUT PYARI KAVITA
. JAI HIND JAI BHARAT

कुश्वंश said...

एक बेहतरीन कविता के लिए बधाई

सहज साहित्य said...

क्यों देख लिए जाते ऐसे सपने
जिनमें एक भी पूरे नहीं होने होते,
फेहरिश्त आज भी
मेरे मन पर गुदी हुई है,
जब भी मिलना
चुपचाप पढ़ लेना
कोई इसरार न करना,
फेहरिश्त के सपने, सपने हैं
सिर्फ पलने के लिए, जीने के लिए नहीं!
-जेन्नी शबनम जी इन पंक्तियों में कितनी सादगी से सब कह दिया है !'फेहरिश्त आज भी मन पर गुदी हुई है, कितना अनूठा प्रयोग किया है।आपकी इस कविता में कल-कल छल-छल करते झरने का प्रवाह है ।माधुर्य तो हर शब्द में घुला हुआ है ।बहुत श्लाग्य कविता !

रश्मि प्रभा... said...

तुम्हारी फेहरिश्त में महज़ पांच-छः सपने थे और
मैंने हज़ारों जोड़ रखे थे,
जानते हुए कि एक एक कर सपने टूटेंगे और
ध्वस्त सपनों के मज़ार पर
मैं अकेली बैठी
उन यादों को जीयूँगी,
kuch kahna hamesha kaha sambhaw hota hai !

Mukesh Kumar Sinha said...

behtareeen ...........di bahut pyari see rachna..!!

PRAN SHARMA said...

SEEDHE - SAADE SHABDON MEIN
AAPKEE KAVITA MAN KO SPARSH
KAR GAYEE HAI. BAHAAEE AUR
SHUBH KAMNA .

कुश्वंश said...

बेहद सुन्दर कविता , सपनो को अर्थ देती