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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

716. ज़िन्दगी भी ढलती है

ज़िन्दगी भी ढलती है 

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पीड़ा धीरे-धीरे पिघल, आँसुओं में ढलती है   
वक़्त की पाबन्दी है, ज़िन्दगी भी ढलती है।   

अजब व्यथा है, सुबह और शाम मुझमें नहीं   
बस एक रात ही तो है, जो मुझमें जगती है।   

चाहके भी समेट न पाई, तक़दीर अपनी   
बामुश्किल बसर हो जो, ज़िन्दगी क्यों मिलती है।   

मैं तो ठहरी रही, सदियों से ख़ुद में ही छुपके   
वक़्त की बेबसी, सदियाँ बेतहाशा उड़ती है।   

जाने क्यों हर रास्ता, मुझसे पीछे छूटा है   
मैं अनजानी, ज़िन्दगी बेअख्तियार उड़ती है।   

दिन की कहानी, मुमकिन ही कहाँ कि 'शब' बताए   
रात ज़िन्दगी उसकी, रात की कहानी कहती है।  

- जेन्नी शबनम (9. 4. 2021)

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बुधवार, 20 जनवरी 2021

709. बात इतनी सी है

बात इतनी सी है 

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चले थे साथ बात इतनी सी है   
जिए पर तन्हा बात इतनी सी है।   

वे मसरूफ़ रहते तो बात न थी   
मग़रूर हुए बात इतनी सी है।   

मुफ़लिसी के दिन थे पर कपट न की   
ग़ैरतमंद हूँ बात इतनी सी है।   

झूठे भ्रम में जीया जीवन मैंने   
कोई न अपना बात इतनी सी है।   

हमदर्द नहीं होता कोई यहाँ   
सब है छलावा बात इतनी सी है।   

ख़ुद से हर ग़म बाँटा ऐ मेरे ख़ुदा   
तुम भी हो ग़ैर बात इतनी सी है।   

सोच समझके अब तुम बोलना ‘शब‘   
जग है पराया बात इतनी सी है।   

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2021) 
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