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सोमवार, 20 जुलाई 2020

678. तितली होती (चोका - 13)

तितली होती 

*** 

अक्सर पूछा   
ख़ुद से ही सवाल   
जिसका हल   
नहीं किसी के पास,   
मैं ऐसी क्यों हूँ?   
मैं चिड़िया क्यों नहीं   
या कोई फूल   
या तितली ही होती,   
यदि होती तो   
रंग-बिरंगे होते   
मेरे भी रूप   
सबको मैं लुभाती   
हवा के संग   
डाली-डाली फिरती   
ख़ूब खिलती   
उड़ती व नाचती,   
मन में द्वेष   
ख़ुद पे अहंकार   
कड़वी बोली   
इन सबसे दूर   
सदा रहती   
प्रकृति का सानिध्य   
मिलता मुझे   
बेख़ौफ़ मैं भी जीती   
कभी न रोती   
बेफ़िक्री से ज़िन्दगी   
ख़ूब मैं जीती   
हँसती ही रहती   
कभी न मुरझाती। 

-जेन्नी शबनम (20.7.2020)
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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

618. जीवन-पथ (चोका - 12)

जीवन-पथ    

***   

जीवन-पथ   
उबड़-खाबड़-से 
टेढ़े-मेढ़े-से   
गिरते-पड़ते भी   
होता चलना,   
पथ कँटीले सही   
पथरीले भी   
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ   
अकेले हों मगर   
होता चलना,   
नहीं कोई अपना   
न कोई साथी   
फैला घना अँधेरा   
डर-डर के   
क़दम हैं बढ़ते   
गिर जो पड़े   
खुद ही उठकर   
होता चलना,   
ख़ुद पोंछना आँसू   
जग की रीत   
समझ में तो आती;   
पर रुलाती   
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता।    

-जेन्नी शबनम (8.6.2019) 
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