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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

577. रंगरेज़ हमारा (चोका - 2)

रंगरेज़ हमारा   

***  

सुहानी संध्या   
डूबने को सूरज   
देखो नभ को 
नारंगी रंग फैला   
मानो सूरज   
एक बड़ा संतरा,   
साँझ की वेला   
दीया-बाती जलाओ   
गोधूली-वेला 
देवता को जगाओ   
ऋचा सुनाओ   
अपनी संस्कृति को   
न बिसराओ,   
शाम होते ही जब   
लौटते घर   
विचरते परिन्दे    
गलियाँ सूनी   
जगमग रोशनी   
वो देखो चन्दा   
हौले-हौले मुस्काए   
साँझ ढले तो   
सूरज सोने जाए   
तारे चमके   
टिम-टिम झलके   
काली स्याही से   
गगन रंग देता   
बड़ा सयाना   
रंगरेज़ हमारा   
सबका प्यारा   
अनोखी ये दुनिया   
किसने रची!  
हर्षित हुआ मन   
घर-आँगन   
देख सुन्दर रूप   
चकित निहारते।   

-जेन्नी शबनम (13.8.2012)
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बुधवार, 22 अगस्त 2012

369. सुहाने पल (चोका - 1)

सुहाने पल

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मुट्ठी में बन्द  
कुछ सुहाने पल
ज़रा लजाते  
शरमा के बताते 
पिया की बातें
हसीन मुलाकातें  
प्यारे-से दिन  
जगमग-सी रातें 
सकुचाई-सी 
झुकी-झुकी नज़रें
बिन बोले ही 
कह गई कहानी 
गुदगुदाती 
मीठी-मीठी ख़ुशबू 
फूलों के लच्छे 
जहाँ-तहाँ खिलते  
रात चाँदनी 
अँगना में पसरी
लिपटकर 
चाँद से फिर बोली-
ओ मेरे मीत  
झीलों से भी गहरे
जुड़ते गए 
ये तेरे-मेरे नाते
भले हों दूर
न होंगे कभी दूर     
मुट्ठी ज्यों खोली
बीते पल मुस्काए 
न बिसराए  
याद हमेशा आए
मन को हुलासाए !

-जेन्नी शबनम (30.7.2012)
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