गुरुवार, 21 नवंबर 2013

425. साँसों की लय (चोका - 5)

साँसों की लय  

*******

साँसें ज़िन्दगी 
निरंतर चलती 
ज़िंदा होने का   
मानों फ़र्ज़ निभाती, 
साँसों की लय 
है हिचकोले खाती    
बढ़ती जाती   
अपनी ही रफ़्तार  
थकती रही 
पर रुकती नही 
चलती रही 
कभी पूरजोरी से 
कभी हौले से 
कभी तूफ़ानी चाल 
हो के बेहाल 
कभी मध्यम चाल 
सकपका के   
कभी धुक-धुक सी  
डर-डर के 
मानो रस्म निभाती, 
साँसें अक्सर  
बेअदबी करती 
इश्क़ भूल के 
नफरत ख़ुद से 
नसों में रोष 
बेइन्तिहा भरती 
लगती कभी
मानो ग़ैर जिन्दगी, 
रहे तो रहे 
परवाह न कोई 
मिटे तो मिटे 
मगर साँसें घटें 
रस्म तो टूटे 
मानों होगी आज़ादी, 
कुम्हलाई है 
सपनों की ज़मीन 
उगते नही 
बारहमासी फूल 
जो दे सुगंध 
सजा जाए जीवन 
महके साँसें 
मानो बगिया मन, 
घायल साँसें 
भरती करवटें 
डर-डर के 
कँटीले बिछौने पे 
जिन्दगी जैसे 
लहूलुहान साँसें 
छटपटाती 
मानों ज़िन्दगी रोती 
आहें भरती 
रुदाली बन कर 
रोज़ मर्सिया गाती । 

- जेन्नी शबनम (21. 11. 2013)

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शनिवार, 16 नवंबर 2013

424. जन्म-नक्षत्र

जन्म-नक्षत्र

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सारे नक्षत्र
अपनी-अपनी जगह
आसमान में देदीप्यमान थे
कहीं संकट के कोई चिह्न नहीं
ग्रहों की दशा विपरीत नहीं
दिन का दूसरा पहर
सूरज मद्धिम-मद्धिम दमक रहा था
कार्तिक का महीना अभी-अभी बीता था
मघा नक्षत्र पूरे शबाब पर था
सारे संकेत शुभ घड़ी बता रहे थे
फिर यह क्योंकर हुआ?
यह आघात क्यों?
जन्म-नक्षत्र ने खोल दिए सारे द्वार    
ज़मीं ही स्वर्ग बन गई तुम्हारे लिए  
और मैं छटपटाती रही
नरक भोगती रही तुम्हारे स्वर्ग में 
शुभ घड़ी शुभ संकेत सब तुम्हारे लिए 
नक्षत्र की शुभ दृष्टि तुम पर 
और मुझ पर टेढ़ी नज़र 
ऐसा क्यों?

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2013)
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सोमवार, 11 नवंबर 2013

423. खिड़कियाँ

खिड़कियाँ 

*** 

अभेद दीवारों से झाँकती   
कभी बंद, कभी खुलती   
जाने क्या-क्या सोचती है खिड़की   
शहर का हाल, मोहल्ले का सरोकार   
या दूसरी झाँकती खिड़की के अंदर की बेहाली   
जहाँ अनगिनत आत्माएँ, टूटी बिखरी   
अपने-अपने घुटनों में, अपना मुँह छुपाए   
आने वाले प्रलय से बदहवास हैं   
किसी के पास   
शब्द की जादूगरी नहीं बची   
न ग़ैरों के लिए   
किसी का मज़बूत कंधा ही बचा है   
सभी झाँकती खिड़कियाँ   
एक दूसरे का हाल जानती हैं   
इसलिए उन्होंने   
सारे सवालों को देश निकाला दे दिया है   
और बहनापे के नाते से इंकार कर दिया है   
बची हुई कुछ अबोध खिड़कियाँ   
अचरज और आतंक से देखती   
लहू में लिपटे शोलों को   
दोनों हाथों से लपक रही हैं   
खिड़कियाँ   
जाने क्या-क्या सोच रही हैं।   

- जेन्नी शबनम (10. 9. 2013) 
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शनिवार, 2 नवंबर 2013

422. दीप-दीपाली (दीपावली पर 18 हाइकु) पुस्तक 46-48

दीप-दीपाली 

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1.
उतरे नीचे
नक्षत्र आसमाँ के
ज़मीन पर

2.
लौटे प्रवासी
त्योहार का मौसम
सजी दीवाली

3.
राम प्रवासी
लौटे हो के विजयी
दीवाली सजी

4.
तमाम रात
बेताबी से जलती
दीप-दीपाली

5.
बड़ी बेताबी
मगर हौले-हौले
जलती बाती

6.
आख़िर भागा
एक दिन ही सही
तम अभागा

7.
जुगनू लाखों
धरती पर नाचे
साथ ही जले

8.
विफल हुई
अँधेरों की साज़िश
रोशनी जीती

9.
है इतराई
रोशनी छितराई
दीवाली आई

10.
मुठ्ठी से गिरी
धरा पर रोशनी
आसमान से

11.
अँधेरा भागा
उजाले से डरके
रोशनी नाची

12.
चादर तान
आज अँधेरा सोया
दीपक जला

13.
जीते रोशनी
महज़ एक दिन
हारे अँधेरा

14.
खुलके हँसी
जगमग रोशनी
अँधेरा चुप

15.
चाँद सितारे
उतरे ज़मीन पे
धरा सजाने

16.
रात है काली
दीयों से सजकर
ख़ूब शर्माती

17.
घूँघट काढ़े
धरती इठलाती
दीया जलाती


18.
घर-घर में
बरसी है चाँदनी
अमावस में

- जेन्नी शबनम (1. 11. 2013)
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रविवार, 20 अक्टूबर 2013

421. ज़िन्दगी (21 हाइकु) पुस्तक 44-46

ज़िन्दगी

*******

1.
लम्हों की लड़ी
एक-एक यूँ जुड़ी
ज़िन्दगी ढली।

2.
गुज़र गई
जैसे साज़िश कोई
तमाम उम्र।

3.
ताकती रही
जी गया कोई और
ज़िन्दगी मेरी।

4.
बिना बताए
जाने किधर गई
मेरी ज़िन्दगी

5.
फैला सन्नाटा
ज़मीं से नभ तक,
ज़िन्दगी कहाँ?

6.
कैसी पहेली
ज़िन्दगी हुई अवाक्
अनसुलझी।

7.
उलझी हुई 
है अजब पहेली
मूर्ख ज़िन्दगी

8.
ज़िन्दगी बीती
जैसे शोर मचाती
आँधी गुज़री।

9.
शोर मचाती
बावरी ये ज़िन्दगी 
भागती रही।

10.
खींचती रही
अन्तिम लक्ष्य तक
ज़िन्दगी-रथ।

11.
रिसता लहू
चाक-चाक ज़िन्दगी 
चुपचाप मैं।

12.
नहीं खिलती
ज़िन्दगी की बगिया
रेगिस्तान में।

13.
तड़पी सदा 
जल-बिन मीन-सी 
ज़िन्दगी बीती

14.
रौशन होती
ग़ैरों की चमक से
हाय ज़िन्दगी!

15.
तमाम उम्र
भरमाती ही रही
ज़िन्दगी छल।

16.
मौन ही रहो
ज़िन्दगी चुप रहो
ज्यों सूरज है।

17.
ज़िन्दगी ढली
मगर चुपचाप
ज्यों रात ढली।

18.
सूरज ढला
ज़िन्दगी भी गुज़री
सब ख़ामोश।

19.
अब भी शेष
देहरी पर मन
स्वाहा ज़िन्दगी

20.
मेरी ज़िन्दगी 
कहानी बन गई
सबने कही।

21.
हवन हुई
बादलों तक गई
ज़िन्दगी धुँआ।

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2013)
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सोमवार, 30 सितंबर 2013

420. क्या बिगड़ जाएगा

क्या बिगड़ जाएगा

***

गहराती शाम के साथ  
मन में धुक-धुकी समा जाती है 
सब ठीक तो होगा न 
कोई मुसीबत तो न आई होगी 
कहीं कुछ ग़लत-सलत न हो जाए 
इतनी देर, कोई अनहोनी तो नहीं हो गई 
बार-बार कलाई की घड़ी पर नज़र 
फिर दीवार घड़ी पर 
घड़ी ने वक़्त ठीक तो बताया है न  
या घड़ी ख़राब तो नहीं हो गई। 
 
हे प्रभु!
रक्षा करना, किसी संकट में न डालना 
कभी कोई ग़लती हुई हो तो क्षमा करना 
वक़्त पर लौट आने से क्या चला जाता है?
कोई सुनता क्यों नहीं? 
दिन में जितनी मनमर्ज़ी कर लो 
शाम के बाद सीधे घर 
आख़िर यह घर है, कोई होटल नहीं। 

कभी घड़ी पर निगाहें 
कभी मुख्य द्वार पर नज़र 
फिर बालकनी पर चहलक़दमी 
सिर्फ़ मुझे ही फ़िक्र क्यों?
सब तो अपने में मगन हैं 
कमबख़्त टी. वी. देखना भी नहीं सुहाता है 
जब तक सब सकुशल वापस न आ जाए। 

बार-बार टोकना 
किसी को नहीं भाता है 
मगर आदत जो पड़ गई है 
उस ज़माने से ही 
जब हमें टोका जाता था
और हमें भी बड़ी झल्लाहट होती थी 
फिर धीरे-धीरे आदत पड़ी  
और वक़्त की पाबन्दी को अपनाना पड़ा था। 
  
पर कितना तो मन होता था तब 
कि सबकी तरह थोड़ी-सी चकल्लस कर ली जाए 
ज़रा-सी मस्ती
ज़रा-सी अल्हड़ता 
ज़रा-सी दीवानगी 
ज़रा-सी शैतानी    
ज़रा-सी तो शाम हुई है 
क्या बिगड़ जाएगा। 

पर अब 
सब आने लगा समझ में 
फ़िक्रमंद होना भी लत की तरह है 
जानते हुए कि कुछ नहीं कर सकते  
जो होना है होकर ही रहता है 
न घड़ी की सूई, न बालकोनी, न दरवाज़े की घंटी
मेरी हाँ में हाँ मिलाएगी  
फिर भी आदत जो है।

-जेन्नी शबनम (30.9.2013)
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बुधवार, 25 सितंबर 2013

419. पीर जिया की (7 ताँका)

पीर जिया की
(7 ताँका)

***

1.
आँखों की कोर
जहाँ पे चुपके से  
ठहरा लोर, 
कहे निःशब्द कथा 
मन अपनी व्यथा। 

2.
छलके आँसू 
बह गया कजरा 
दर्द पसरा, 
सुध-बुध गँवाए
मन है घबराए। 

3.
सह न पाए 
मन कह न पाए
पीर जिया की,  
फिर आँसू पिघले  
छुप-छुप बरसे।  

4.
मौसम आया 
बहाकर ले गया 
आँसू की नदी,  
छँट गई बदरी 
जो आँखों में थी घिरी।   

5.
मन का दर्द 
तुम अब क्या जानो 
क्यों पहचानो, 
हुए जो परदेसी
छूटे हैं नाते देसी। 

6. 
बैरंग लौटे 
मेरी आँखों में आँसू 
खोये जो नाते, 
अनजानों के वास्ते 
काहे आँसू बहते।  

7.
आँख का लोर 
बहता शाम-भोर, 
राह अगोरे 
ताख़े पर ज़िन्दगी 
नहीं कहीं अँजोर। 
____________
लोर- आँसू 
अँजोर- उजाला
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-जेन्नी शबनम (24.9.2013)
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सोमवार, 9 सितंबर 2013

418. क़दम ताल

क़दम ताल

***

समय की भट्टी में पककर
कभी कंचन तो कभी बंजर बन जाता है जीवन 
कभी कोई आकार ले लेता है 
तो कभी सदा के लिए जल जाता है जीवन। 

सोलह आना सही-
आँखें मूँद लेने से समय रुकता नहीं
न थम जाने से ठहरता है
निदान न पलायन में है 
न समय के साथ चक्र बन जाने में है। 

मुनासिब यही है    
समय चलता रहे अपनी चाल 
और हम चलें अपनी रफ़्तार  
मिलाकर समय से क़दम ताल

-जेन्नी शबनम (9.9.2013)
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बुधवार, 21 अगस्त 2013

417. मन के नाते (राखी पर 12 हाइकु) पुस्तक 43,44

मन के नाते (राखी के हाइकु) (12 हाइकु)

*******

1.
हाथ पसारे 
बँधवाने राखी 
चाँद तरसे। 

2.
सूनी कलाई 
बहना नहीं आई
भैया उदास। 

3.
बाँधो मुझे भी
चन्दा मामा कहता 
सुन्दर राखी।

4.
लाखों बहना
बाँध न पाए राखी 
भैया विदेश।

5.
याद रखना-
बहन का आशीष
राखी कहती।

6.
राखी की लाज
रखना मेरे भैया 
ढाल बनना।

7.
ये धागे कच्चे
जोड़ते रिश्ते पक्के
होते ये सच्चे।  

8.
किसको बाँधे
हैं सारे नाते झूठे  
राखी भी सोचे।

9.
नेह लुटाती 
आजीवन बहना 
होती पराई।

10.
करता याद
बस आज ही भैया 
राखी जो आई।

11.
नहीं है आता 
मनाने अब भैया  
अब जो रूठी।

12.
है अनमोल 
उऋण होऊँ कैसे 
मन के नाते

- जेन्नी शबनम (21. 8. 2013)
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शनिवार, 17 अगस्त 2013

416. माथे पे बिन्दी (11 हाइकु) पुस्तक 42,43

माथे पे बिन्दी 

***

1.
माथे की बिन्दी 
आसमान में चाँद 
सलोना रूप। 

2.
लाल बिन्दिया 
ज्यों उगता सूरज
चेहरा खिला

3.
ऋषि कहते 
कपाल पर बिन्दी 
सौभाग्य-चिह्न

4.
झिलमिलाती 
भोर की लाली-जैसी 
माथे की बिन्दी

5.
मुख चमके 
दिप-दिप दमके 
लाल बिन्दी से

6.
सिन्दूरी बिन्दी 
सूरज-सी चमके
गोरी चहके

7.
माथे पे बिन्दी 
सुहाग की निशानी 
हमारी रीत 

8.
अखण्ड भाग्य 
सौभाग्य का प्रतीक 
छोटी-सी बिन्दी

9.
माथे पे सोहे 
आसमाँ पे चन्दा ज्यों 
मुस्काती बिन्दी

10.
त्रिनेत्र जहाँ 
शिव के माथे पर 
वहीं पे बिन्दी

11.
महत्वपूर्ण 
ज्यों है भाषा में बिन्दी 
त्यों स्त्री की बिन्दी

-जेन्नी शबनम (10.10.2012)
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बुधवार, 7 अगस्त 2013

415. मत सोच अधिक (15 हाइकु) पुस्तक 40-42

मत सोच अधिक 

******* 

1.
जो बीत गया 
मत सोच अधिक,
बढ़ता चल।

2.
जीवन-पथ 
डराता है बहुत, 
हारना मत।

3.
सब आएँगे 
जब हम न होंगे, 
अभी न कोई। 

4.
अपने छूटे
सब सपने टूटे, 
जीवन बचा।

5.
बहलाती हैं
ये स्मृतियाँ सुख की 
जीवन-भ्रम।

6.
शोक क्यों भला?
ग़ैरों के विछोह का 
ठहरा कौन?

7.
कतराती हैं 
सीधी सरल राहें, 
वक़्त बदला।

8.
ताली बजाती 
बरखा मुस्कुराती 
ख़ूब बरसी। 

9.
सब बिकता  
पर क़िस्मत नहीं, 
लाचार पैसा।

10
सब अकेले 
चाँद-सूरज जैसे
फिर शोक क्यों?

11.
जीवन साया 
कौन पकड़ पाया,
मगर भाया। 

12.
ज़िन्दगी माया 
बड़ा ही भरमाया 
हाथ न आया।

13.
सपने जीना 
सपनों को जिलाना,
हुनर बड़ा।

14.
कैसी पहेली 
ज़िन्दगी की दुनिया,
रही अबूझी।

15.
ख़ुद से नाता  
जीवन का दर्शन,  
आज की शिक्षा।

- जेन्नी शबनम (21. 7. 2013)
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रविवार, 28 जुलाई 2013

414. वापस अपने घर

वापस अपने घर

***

अरसे बाद 
ख़ुद के साथ वक़्त बीत रहा है  
यों लगता है जैसे बहुत दूर से चलकर आए हैं
सदियों बाद वापस अपने घर।

उफ़! कितना कठिन था सफ़र 
रास्ते में हज़ारों बन्धन  
कहीं कामनाओं का ज्वारभाटा 
कहीं भावनाओं की अनदेखी दीवार 
कहीं छलावे की चकाचौंध रोशनी
इन सबसे बहकता, घबराता   
बार-बार घायल होता मन 
जो बार-बार हारता 
लेकिन ज़िद पर अड़ा रहता 
और हर बार नए सिरे से 
सुकून तलाशता फिरता। 

बहुत कठिन था, अडिग होना 
इन सबसे पार जाना
उन कुण्ठाओं से बाहर निकलना
जो जन्म से ही विरासत में मिलती हैं     
सारे बन्धनों को तोड़ना 
जिसने आत्मा को जकड़ रखा था 
ख़ुद को तलाशना, ख़ुद को वापस लाना 
ख़ुद में ठहरना।

पर एक बार 
एक बड़ा हौसला, एक बड़ा फ़ैसला  
अन्तर्द्वन्द्व के विस्फोट का सामना  
ख़ुद को समझने का साहस
फिर हर भटकाव से मुक्ति
अंततः अपने घर वापसी।

अब ज़रा-ज़रा-सी कसक 
हल्की-हल्की-सी टीस 
मगर कोई उद्विग्नता नहीं  
कोई पछतावा नहीं
सब कुछ शान्त, स्थिर।

पर हाँ! 
इन सब में जीने के लिए उम्र और वक़्त 
हाथ से दोनों ही निकल गए।

-जेन्नी शबनम (28.7.2013)
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बुधवार, 24 जुलाई 2013

413. धूप (15 हाइकु) पुस्तक 39,40

धूप

*******

1.
सूर्य जो जला   
किसके आगे रोए  
ख़ुद ही आग। 

2.
घूमता रहा 
सारा दिन सूरज 
शाम को थका। 

3.
भुट्टे-सी पकी
सूरज की आग पे    
फ़सलें सभी।

4.
जा भाग जा तू!
जला देगी तुझको  
शहर की लू।

5.
झुलसा तन 
झुलस गई धरा 
जो सूर्य जला।

6.
जल-प्रपात 
सूर्य की भेंट चढ़े 
सूर्य शिकारी।

7.
धूप खींचता 
आसमान से दौड़ा,
सूरज घोड़ा।

8.
ठंडे हो जाओ 
हाहाकार है मचा 
सूर्य देवता।

9.
असह्य ताप 
धरती कर जोड़े- 
'मेघ बरसो!'

10.
माना सबने- 
सर्वशक्तिमान हो 
शोलों को रोको।

11.
ख़ुद भी जले  
धरा को भी जलाए  
प्रचण्ड सूर्य।

12.
हे सूर्य देव!
कर दो हमें माफ़  
गुस्सा न करो।

13.
आग उगली  
बादल जल गया 
सूरज दैत्य।

14.
झुलस गया 
अपने ही ताप से 
सूर्य बेचारा।

15.
धूप के ओले  
टप-टप टपके 
सूरज फेंके।

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2013)
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गुरुवार, 18 जुलाई 2013

412. जादूगर

जादूगर

*******

ओ जादूगर!
तुम्हारा सबसे ख़ास
मेरा प्रिय जादू दिखाओ न!
जानती हूँ 
तुम्हारी काया जीर्ण हो चुकी है 
और अब मैं 
ज़िन्दगी और जादू को समझने लगी हूँ 
फिर भी मेरा मन है 
एक बार और तुम मेरे जादूगर बन जाओ 
और मैं तुम्हारे जादू में 
अपना रोना भूल 
एक आख़िरी बार खिल जाऊँ।
तुम्हें याद है 
जब तुम मेरे बालों से टॉफ़ी निकालकर  
मेरी हथेली पर रख देते थे 
मैं झट से खा लेती थी 
कहीं जादू की टॉफ़ी ग़ायब न हो जाए
कभी तुम मेरी जेब से  
कुछ सिक्के निकाल देते थे 
मैं हत्प्रभ 
झट मुट्ठी बंद कर लेती थी 
कहीं जादू के सिक्के ग़ायब न हो जाए 
और मैं ढेर सारे गुब्बारे न खरीद पाऊँ।
मेरे मन के ख़िलाफ़
जब भी कोई बात हो 
मैं रोने लगती और तुम पुचकारते हुए 
मेरी आँखें बंदकर जादू करते 
जाने क्या-क्या बोलते 
सुनकर हँसी आ ही जाती थी 
और मैं खिसियाकर तुम्हें मुक्के मारने लगती
तुम कहते- 
बिल्ली झपट्टा मारी 
बिल्ली झपट्टा मारी 
मैं कहती-
तुम चूहा हो 
तुम कहते-
तुम बिल्ली हो 
एक घमासान, फिर तुम्हारा जादू 
वही टॉफ़ी, वही सिक्के।
जानती हूँ 
तुम्हारा जादू, सिर्फ़ मेरे लिए था 
तुम सिर्फ़ मेरे जादूगर थे 
मेरी हँसी मेरी ख़ुशी 
यही तो था तुम्हारा जादू।
ओ जादूगर!
एक आख़िरी जादू दिखाओ न! 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2013)
(पिता की पुण्यतिथि)
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शनिवार, 13 जुलाई 2013

411. सन्नाटे के नाम ख़त (10 हाइकु) पुस्तक 38, 39

सन्नाटे के नाम ख़त (10 हाइकु)

***

1.
सन्नाटा भागा
चुप्पी ने मौन तोड़ा, 
जाने क्या बोला।  

2.
कोई न आया 
पसरा है सन्नाटा 
मन अकेला।  

3.
किसे फुर्सत?
चुप्पी की बात सुने
चुप्पी समझे।  

4.
चुप्पी भीतर 
सन्नाटा है बाहर
खेलता खेल।  

5.
दूर देश में  
समंदर पार से 
चुप्पी है आई।   

6.
ख़त है आया 
सन्नाटे के नाम से, 
चुप्पी ने भेजा।   

7.
बड़ा डराता 
ये गहरा सन्नाटा 
ज्यों दैत्य काला।  

8.
चुप्पी को ओढ़    
हँसते ही रहना,  
दुनियादारी।  

9.
खिंचे सन्नाटे 
करते ढेरों बातें 
चुप-चुप-से।  

10.
क्या हुआ गुम?
क्यों हुए गुमसुम?
मन है मौन।  

- जेन्नी शबनम (21. 6. 2013)
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शनिवार, 22 जून 2013

410. उठो अभिमन्यु

उठो अभिमन्यु

***

उचित वेला है 
कितना कुछ जानना-समझना है  
कैसे-कैसे अनुबंध करने हैं
पलटवार की युक्ति सीखनी है 
तुम्हें मिटना नहीं है
उत्तरा अकेली नहीं रहेगी
परीक्षित अनाथ नहीं होगा 
मेरे अभिमन्यु, उठो जागो  
बिखरती संवेदनाओं को समेटो 
आसमान की तरफ़ आशा से न देखो 
आँखें मूँद घड़ी भर, ख़ुद को पहचानो।   

क्यों चाहते हो, सम्पूर्ण ज्ञान गर्भ में पा जाओ
क्या देखा नहीं, अर्जुन-सुभद्रा के अभिमन्यु का हश्र
छः द्वार तो भेद लिए, लेकिन अंतिम सातवाँ 
वही मृत्यु का कारण बना 
या फिर सुभद्रा की लापरवाह नींद।   

नहीं-नहीं, मैं कोई ज्ञान नहीं दूँगी
न किसी से सुनकर, तुम्हें बताऊँगी
तुम चक्रव्यूह रचना सीखो 
स्वयं ही भेदना और निकलना सीख जाओगे
तुम सब अकेले हो, बिना आशीष
अपनी-अपनी मांद में असहाय
दूसरों की उपेक्षा और छल से आहत।   

जान लो, इस युग की युद्ध-नीति-
कोई भी युद्ध अब सामने से नहीं 
निहत्थे पर, पीठ पीछे से वार है
युद्ध के आरम्भ और अंत की कोई घोषणा नहीं
अनेक प्रलोभनों के द्वारा शक्ति हरण  
और फिर शक्तिहीनों पर बल प्रयोग 
उठो जागो! समय हो चला है
इस युग के अंत का
एक नई क्रांति का।   

क़दम-क़दम पर एक चक्रव्यूह है 
और क्षण-क्षण अनवरत युद्ध है 
कहीं कोई कौरवों की सेना नहीं है
सभी थके हारे हुए लोग हैं
दूसरों के लिए चक्रव्यूह रचने में लीन  
छल ही एक मात्र उनकी शक्ति
जाओ अभिमन्यु 
धर्म-युद्ध प्रारंभ करो 
बिना प्रयास हारना हमारे कुल की रीत नहीं
और पीठ पर वार धर्म-युद्ध नहीं 
अपनी ढाल भी तुम और तलवार भी
तुम्हारे पक्ष में कोई युगपुरुष भी नहीं।  

- जेन्नी शबनम (22. 6. 2013)
 (पुत्र का 20वाँ जन्मदिन)
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शुक्रवार, 14 जून 2013

409. अहल्या

अहल्या

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छल भी तुम्हारा 
बल भी तुम्हारा
ठगी गई मैं, अपवित्र हुई मैं 
शाप भी दिया तुमने  
मुक्ति-पथ भी बताया तुमने      
पाषाण बनाया मुझे 
उद्धार का आश्वासन दिया मुझे 
दाँव पर लगी मैं  
इंतज़ार की व्यथा सही मैंने 
प्रयोजन क्या था तुम्हारा?
मंशा क्या थी तुम्हारी?
इंसान को पाषाण बनाकर 
पाषाण को इंसान बनाकर 
शक्ति-परीक्षण, शक्ति-प्रदर्शन 
महानता तुम्हारी, कर्तव्य तुम्हारा 
बने ही रहे महान
कहलाते ही रहे महान 
इन सब के बीच 
मेरा अस्तित्व ?
मैं अहल्या  
मैं कौन?
मैं ही क्यों?
तुम श्रद्धा के पात्र 
तुम भक्ति तुल्य 
और मैं?

- जेन्नी शबनम (14. 6. 2013)
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शुक्रवार, 7 जून 2013

408. खूँटे से बँधी गाय

खूँटे से बँधी गाय

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खूँटे से बँधी गाय 
जुगाली करती-करती 
जाने क्या-क्या सोचती है  
अपनी ताक़त 
अपनी क्षमता 
अपनी बेबसी 
और गौ पूजन की परम्परा  
जिसके कारण वह ज़िंदा है  
या फिर इस कारण भी कि
वैसी ज़रूरतें 
जिन्हें सिर्फ़ वो ही पूरी कर सकती है  
शायद उसका कोई विकल्प नहीं 
इस लिए ज़िंदा रखी गई है  
जब चाहा 
दूसरे खूँटे से उसे बाँध दिया गया 
ताकि ज़रूरतें पूरी करे  
कौन जाने, ख़ुदा की मंशा 
कौन जाने, तक़दीर का लिखा 
उसके गले का पगहा 
उसके हर वक़्त को बाँध देता है 
ताकि वो आज़ाद न रहे कभी 
और उसकी ज़िन्दगी 
पल-पल शुक्रगुज़ार हो उनका 
जिन्होंने एक खूँटा दिया 
और खूँटा गड़े रहने की जगह 
ताकि खूँटे के उस दायरे में 
उसकी ज़िन्दगी सुरक्षित रहे  
और वक़्त की इंसाफी  
उसके खूँटे की ज़मीन आबाद रहे।  

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2013)
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रविवार, 2 जून 2013

407. शगुन (क्षणिका)

शगुन

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हवा हर सुबह चुप्पी ओढ़ 
अँजुरी में अमृत भर 
सूर्य को अर्पित करती है 
पर सूरज है कि जलने के सिवा 
कोई शगुन नहीं देता।  

- जेन्नी शबनम (2. 6. 2013)
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रविवार, 26 मई 2013

406. गुलमोहर (16 हाइकु) पुस्तक - 36-38

गुलमोहर

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1.
उनका आना 
जैसे मन में खिला  
गुलमोहर। 

2.
खिलता रहा  
गुलमोहर फूल  
पतझर में।  

3.
तुम्हारी छवि 
जैसे दोपहरी में  
गुलमोहर। 

4.
झरी पत्तियाँ
गुलमोहर हँसा 
आई बहार। 

5.
झूमती हवा 
गुलमोहर झूमा 
रुत सुहानी। 

6.
उसकी हँसी-
झरे गुलमोहर 
सुर्ख़ गुलाबी। 

7.
गुलमोहर!
तुमसे ही है सीखा 
खिले रहना। 

8.
खिलता रहा    
गुलमोहर-गाछ
शेष मुर्झाए। 

9.
सजाके पथ  
रहता है बेफ़िक्र 
गुलमोहर।  

10.
हवा ने कहा-
गुलमोहर सुन
साथ में उड़। 

11.
उड़के आया 
गुलमोहर फूल 
मेरे अँगना।  

12.
पसरा रंग 
गुलमोहर-गंध    
बैसाख ख़ुश। 

13.
आम्र-मंजरी 
फूल गुलमोहर 
दोनों चहके। 

14.
सुर्ख़ फूलों-सा 
तेरा रंग खिला, ज्यों
गुलमोहर। 

15.
गुलमोहर 
क़तार में हैं खड़े 
प्रहरी बड़े। 

16.
पलाश फूल 
गुलमोहर फूल 
दोनों आओ न। 

- जेन्नी शबनम (2. 5. 2013)
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सोमवार, 13 मई 2013

405. माँ (मातृ दिवस पर 11 हाइकु) पुस्तक 35,36

 माँ 

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1.
जिससे सीखा 
सहनशील होना, 
वो है मेरी माँ।   

2.
माँ-सी है छवि 
माँ मुझमें है बसी,  
माँ देती रूप।  

3.
स्त्री है जननी 
रच दिया संसार 
पर लाचार।  

4.
हर नारी माँ 
हर बेटी होती माँ 
मुझमें भी माँ।   

5.
हर माँ देती 
सूरज-सी रोशनी 
निःस्वार्थ भाव।  

6.
रचा संसार 
मानी गई बेकार, 
जाने क्यों नारी? 

7.
धरा-सी धीर 
बन कोख की ढाल 
प्रेम लुटाती। 

8.
माँ की ममता 
ब्रह्मांड है समाया 
ओर न छोर।  

9.
प्यार लुटाती  
प्यार को तरसती  
पीर लिये माँ।  

10.
उसने छला 
जिसके लिए मिटी
लाचार है माँ।  

11.
एक ही दिन 
क्यों याद आती है वो?
जो जन्म देती।  

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2013)
(मातृ दिवस पर )
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रविवार, 5 मई 2013

404. तुम्हारा 'कहा'

तुम्हारा 'कहा'

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जानती हूँ, तुम्हारा 'कहा' 
मुझसे शुरू होकर 
मुझ पर ही ख़त्म होता है, 
उस 'कहा' में 
क्या कुछ शामिल नहीं होता 
प्यार 
मनुहार 
जिरह 
आरोप 
सरोकार 
संदेह 
शब्दों के डंक,
तुम जानते हो 
तुम्हारी इस सोच ने मुझे तोड़ दिया है 
ख़ुद से भी नफ़रत करने लगी हूँ
और सिर्फ़ इस लिए मर जाना चाहती हूँ 
ताकि मेरे न होने पर 
तुम्हारा ये 'कहा'
तुम किसी से कह न पाओ 
और तुमको घुटन हो  
तुम्हारी सोच, तुमको ही बर्बाद करे 
तुम रोओ, किसी 'उस' के लिए 
जिसे अपना 'कहा' सुना सको 
जानती हूँ 
मेरी जगह कोई न लेगा 
तुम्हारा 'कहा' 
अनकहा बनकर तुमको दर्द देगा 
और तब आएगा मुझे सुकून,
जब भी मैंने तुमसे कहा कि
तुम्हारा ये 'कहा' मुझे चुभता है 
न बोलो, न सोचो ऐसे 
हमेशा तुम कहते हो- 
तुम्हें न कहूँ तो भला किससे 
एक तुम ही तो हो 
जिस पर मेरा अधिकार है 
मेरा मन, प्रेम करूँ 
या जो मर्जी 'कहा' करूँ। 

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2013)
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बुधवार, 1 मई 2013

403. औक़ात देखो

औक़ात देखो

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पिछला जन्म  
पाप की गठरी   
धरती पर बोझ  
समाज के लिए पैबन्द   
यह सब सुनकर भी  
मुँह उठाए, तुम्हें ही अगोरा 
मन टूटा, पर तुम्हें ही देखा। 
  
असाध्य तुम, पर जीने की सहूलियत तुमसे 
मालूम है, मेरी पैदाइश हुई है 
उन कामों को करने के लिए, जो निकृष्ट हैं  
जिन्हें करना तुम अपनी शान के ख़िलाफ़ मानते हो  
या तुम्हारी औक़ात से परे है। 
 
काम करना मेरा स्वभाव है  
मेरी पूँजी है और मेरा धर्म भी  
फिर भी  
मैं भाग्यहीन, बेग़ैरत, कृतघ्न, फ़िजूल। 
 
जान लो तुम   
मैंने अपना सारा वक़्त दिया है तुम्हें 
ताकि तुम चैन से आँखें मूँद सो सको  
हर प्रहार को अपने सीने पर झेला है 
ताकि तुम सुरक्षित रह सको   
पसीने से लिजबिज मेरा बदन 
आठों पहर सिर्फ़ तुम्हारे लिए खटा है  
ताकि तुम मनचाही ज़िन्दगी जी सको। 
     
कभी चैन के पल नहीं ढूँढे   
कभी नहीं कहा कि ज़रा देर रुकने दो 
होश सँभालने से लेकर जिस्म की ताक़त खोने तक 
दुनिया का बोझ उठाया है मैंने। 
  
अट्टालिकएँ मुझे जानती हैं  
मेरे बदन का ख़ून चखा है उसने  
लहलहाती फ़सलें मेरी सखा हैं  
मुझसे ही पानी पीती हैं   
फुलवारी के फूल  
अपनी सुगन्ध की उत्कृष्टता मुझसे ही पूछते हैं। 
  
मेरे बिना तुम सब अपाहिज हो 
तुम बेहतर जानते हो   
एक पल को अगर रुक जाऊँ 
दुनिया थम जाएगी      
चन्द मुट्ठी भर तुम सब  
मेरे ही बल पर शासन करते हो  
फिर भी कहते- 
''अपनी औक़ात देखो''   

-जेन्नी शबनम (1.5.2013) 
(मज़दूर दिवस) 
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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

402. जन्म का खेल (7 हाइकु) पुस्तक 34,35

जन्म का खेल

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1.
हर जन्म में 
तलाशती ही रही 
ज़रा-सी नेह। 

2.
प्रतीक्षारत 
एक नए युग की 
कई जन्मों से। 

3.
परे ही रहा 
समझ से हमारे 
जन्म का खेल। 

4.
जन्म के साथी 
हो ही जाते पराए
जग की रीत। 

5.
रोज़ जन्मता 
पल-पल मरके 
है वो इंसान। 

6.
शाश्वत खेल 
न चाहें पर खेलें 
जन्म-मरण। 

7.
जितना सच 
है जन्म, मृत्यु भी है 
उतना सच। 

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2013)
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बुधवार, 24 अप्रैल 2013

401. अब तो जो बचा है (पुस्तक- 79)

अब तो जो बचा है

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दो राय नहीं 
अब तक कुछ नहीं बदला था  
न बदला है, न बदलेगा 
सभ्यता का उदय और संस्कार की प्रथाएँ 
युग परिवर्तन और उसकी कथाएँ
आज़ादी का जंग और वीरता की गाथाएँ 
एक-एक कर सब बेमानी 
शिक्षा-संस्कार-संस्कृति, घर-घर में दफ़न, 
क्रांति-गीत, क्रांति की बातें 
धर्म-वचन, धार्मिक-प्रवचन 
जैसे भूखे भेड़ियों ने खा लिए
और उनकी लाश को
मंदिर मस्जिद पर लटका दिया, 
सामाजिक व्यवस्थाएँ 
जो कभी व्यवस्थित हुई ही नहीं 
सामाजिक मान्यताएँ, चरमरा गईं  
नैतिकता, जाने किस सदी की बात थी 
जिसने शायद किसी पीर के मज़ार पर 
दम तोड़ दिया था, 
कमज़ोर क़ानून 
ख़ुद ही जैसे हथकड़ी पहन खड़ा है 
अपनी बारी की प्रतीक्षा में 
और कहता फिर रहा है  
आओ और मुझे लूटो-खसोटो
मैं भी कमज़ोर हूँ  
उन स्त्रियों की तरह 
जिन पर बल प्रयोग किया गया
और दुनिया गवाह है, सज़ा भी स्त्री ने ही पाई, 
भरोसा, अपनी ही आग में लिपटा पड़ा है
बेहतर है वो जल ही जाए 
उनकी तरह जो हारकर ख़ुद को मिटा लिए 
क्योंकि उम्मीद का एक भी सिरा न बचा था
न जीने के लिए, न लड़ने के लिए,
निश्चित ही, पुरुषार्थ की बातें 
रावण के साथ ही ख़त्म हो गई 
जिसने छल तो किया
लेकिन अधर्मी नहीं बना  
एक स्त्री का मान तो रखा,
अब तो जो बचा है
विद्रूप अतीत, विक्षिप्त वर्तमान 
और लहूलुहान भविष्य 
और इन सबों की साक्षी 
हमारी मरी हुई आत्मा! 

- जेन्नी शबनम (24. 4. 2013)
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