Tuesday, February 24, 2009

18. मेरी आजमाइश करते हो

मेरी आजमाइश करते हो

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गैरों के सामने इश्क की नुमाइश करते हो
क्यों भला ज़िन्दगी की फरमाइश करते हो ?

इश्क करते नहीं ईमान से तुम
और ख़ुद ही ख़ुदा से नालिश करते हो !

गैरों की जमात के तुम मुसाफिर हो
अपनों में आशियाँ की गुंजाइश करते हो !

ज़ख्म गहरा देते हो हर मुलाकात के बाद
और फिर भी मिलने की गुज़ारिश करते हो !

इक पहर का साथ तो मुमकिन नहीं
मुकम्मल ज़िन्दगी की ख़्वाहिश करते हो !

तुम्हे तो आदत है बेवफाई करने की
और 'शब' की वफ़ा की आजमाइश करते हो !

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 16, 2009)

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