Friday, May 20, 2011

अधरों की बातें...

अधरों की बातें...

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तुम्हारे अधरों की बातें
तुम क्या जानो
मेरे अधरों को बहुत भाते हैं,
न समझे तुम मन की बातें
कैसे कहें तुमको
तुम्हें देख हम खिल जाते हैं,
तुम भी देख लो मेरे सनम
प्रीत की रीत
यूँ हीं नहीं निभाते हैं,
शाख पे बैठी कोई चिरैया
गीत प्यार का जब गाती
सुन गीत मधुर
साथी उसके उड़ आते हैं,
ऐसे तुम भी आ जाओ
मेरे अधरों पे गीत रच जाओ
अब तुम बिन हम रह नहीं पाते हैं,
जाने कब आयेंगे वो दिन
जादू सी रातें बीते हुए दिन
वो दिन बड़ा सताते हैं
हर पल तुमको बुलाते हैं
अब हम रह नहीं पाते हैं!

__ जेन्नी शबनम __ 18. 5. 2011

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17 comments:

कुश्वंश said...

बेहतरीन कविता, हृदयस्पर्शी बधाई

रश्मि प्रभा... said...

शाख पे बैठी कोई चिरैया
गीत प्यार का जब गाती
सुन गीत मधुर
साथी उसके उड़ आते हैं,
ऐसे तुम भी आ जाओ
मेरे अधरों पे गीत रच जाओ... neh nimantran pyaara sa hai

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कोमल एहसासों को व्यक्त किया है ..सुन्दर रचना

मनोज कुमार said...

मन के मधुर भावों की भावुक अभिव्यक्ति।

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति . दिल की गहराइयों से ओमदे(umde) जज्बात हैं शायद. अति प्रभावी !

PRAN SHARMA said...

khoobsoorat shabd aur unke anuroop
khoobsoorat bhaav . Achchhee lagee
hai kavita .Badhaaee .

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (21.05.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

SAJAN.AAWARA said...

Mam bahut hi khubsurat rachna likhi hai aapne. . Pyari kavita. .
Jai hind jai bharat

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर और मखमली सी भावप्रणव रचना!

सहज साहित्य said...

अधरों की बातें कविता की ये पंक्तियाँ माधुर्य गुण से ओतप्रोत हैं-शाख पे बैठी कोई चिरैया
गीत प्यार का जब गाती
सुन गीत मधुर
साथी उसके उड़ आते हैं,
ऐसे तुम भी आ जाओ
मेरे अधरों पे गीत रच जाओ
अब तुम बिन हम रह नहीं पाते हैं, 'चिरैया' शब्द का प्रयोग अतिरिक्त माधुर्य से सिक्त है । जेन्नी शबनम जी की भाषा के प्रति यह सजगता उनकी कविता में और चार चाँद लगा देती है ।

अमित श्रीवास्तव said...

ये अधीर सा करते अधर.

बहुत खूब...

sushma 'आहुति' said...

sunder rachna...

mahendra srivastava said...

जी मैं पहली बार आज आपके ब्लाग पर हूं। सच में बहुत अच्छी लगी आपकी कविता। शुरू से ही विषय की पटरी पर आ गई और आखिर तक उस पर बनी रही। बहुत सुंदर

तुम क्या जानो
मेरे अधरों को बहुत भाते हैं,
न समझे तुम मन की बातें
कैसे कहें तुमको

Shah Nawaz said...

वाह... बहुत खूब... बहुत ही गहराई लिए हुए रचना है!

deepak sinha said...

sundar rachna,badhaee ke sath meri subhkana,

MUKANDA said...

बेरख्त जरे लम्हे ,कहते हो भूलाने को
असरार जले दिल पे , नासूर हज़ारो है ,..............रवि विद्रोही

prritiy----sneh said...

Bahut sunder
Shubhkamnayen