Monday, May 23, 2011

चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं...

चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं...

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मिलती नहीं मनचाही फ़िज़ा
सभी आशाएं दम तोड़ती हैं
तन्हा तन्हा बहुत हुआ सफ़र
चलो नयी फ़िज़ा हम सजाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

आसान नहीं हर इल्ज़ाम सहना
बेगुनाही जतलाना भी मुमकिन कब होता है
बहुत दूर ठिठका है आसमान
चलो कुछ आसमान अपने लिए तोड़ लाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

बेसबब तो नहीं होता यूँ मूंह मोड़ना
ज़मीन को चाहता है कौन छोड़ना
धुंधली धुंधली नज़र आती है ज़मीन
चलो आसमान पे घर बसाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

दुनिया के रवाजों से थक गए
हर दौर से हम गुज़र गए
सब कहते दुनिया के काएदे हम नहीं निभाते हैं
चलो एक और गुनाह कर आते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

__ जेन्नी शबनम __ 23. 5. 2011

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11 comments:

यस चंचल said...

बहुत खूबसूरत रचना बात दिल को छु गयी आपकी

कुश्वंश said...

पहले इस जहाँ को अपनी उम्मीदों जैसा बनाने की कोशिश करेंगे हम , फिर आपकी बात में भी कोई बात है . अच्छे शब्दांकन हेतु बधाई

रश्मि प्रभा... said...

मिलती नहीं मनचाही फ़िज़ा
सभी आशाएं दम तोड़ती हैं
तन्हा तन्हा बहुत हुआ सफ़र
चलो नयी फ़िज़ा हम सजाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!... khoobsurat khyaal

PK Sharma said...

kya baat hai sabnam G

संजय भास्कर said...

पूरी रचना बहुत ही खूब.कुछ भी छोड़ दूं तो नाइंसाफी होगी...

SAJAN.AAWARA said...

MAM APKI YE RACHNA KUCH KARNE KI HIMMAT PARDAN KARTI HAI.
JAI HIND JAI BHARAT

mridula pradhan said...

चलो एक और गुनाह कर आते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!
bahut pasand aayee.

Dr. RAMJI GIRI said...

विचार और इरादे बहुत ही तो नेक हैं...:-)वैसे चाँद पर भी 'प्लाट' 'बुक' होने लगे हैं...

सुन्दर ,इमानदार और भाव-प्रवीण रचना...

sushma 'आहुति' said...

चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!bhut bhut hi sunder rachna... very nice

सहज साहित्य said...

आसान नहीं हर इल्ज़ाम सहना
बेगुनाही जतलाना भी मुमकिन कब होता है
बहुत दूर ठिठका है आसमान
चलो कुछ आसमान अपने लिए तोड़ लाते हैं
आपने सच कहा है -बेगुनाही जतलाना कभी मुमकिन नहीं होता ।सच्चा व्यक्ति झूठे की तरह साफ़ -सुथरे तर्क नही गढ़ सकता है, मधुरता में सराबोर करके झूठी कसमें नहीं खा सकता। इतना सब कुछ होने पर भी विश्वास न किया जाना सबसे बड़ी चोट है । आपने कड़वा सच बयान किया है । बहुत अन्तर्द्वन्द्व से भरी है आपकी यह कविता !

वीना said...

दुनिया के रवाजों से थक गए
हर दौर से हम गुज़र गए
सब कहते दुनिया के काएदे हम नहीं निभाते हैं
चलो एक और गुनाह कर आते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

अच्छी रचना अच्छे भाव के साथ....