Wednesday, September 21, 2011

मैं तेरी सूरजमुखी...

मैं तेरी सूरजमुखी...

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ओ मेरे सूरज
मैं तेरी सूरजमुखी (सूर्यमुखी)
बाट जोहते जोहते मुर्झाने लगी,
कई दिनों से तू आया नहीं
जाने कौन सी राह पकड़ ली तूने
कौन ले गया तुझे?
क्या ये भी बिसर गया
कि सारा दिन तुझे हीं तो निहारती हूँ
जीवन ऐसे हीं तेरे संग बिताती हूँ,
तुम चाहो न चाहो
तेरे बिना रह नहीं सकती
चाहूँ फिर भी तुम बिन खिल नहीं सकती,
जानती हूँ तुम्हारा साथ बस दिन भर का है
फिर तू अपनी राह मैं अपनी राह
अगली सुबह फिर तेरी राह,
लड़ लिया करो न, बादलों से मेरे लिए
ओ मेरे सूरज
मैं तेरी सूरजमुखी !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 17, 2011)

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11 comments:

vidhya said...

बहुत ही बढ़िया

रविकर said...

अगर आपकी उत्तम रचना, चर्चा में आ जाए |

शुक्रवार का मंच जीत ले, मानस पर छा जाए ||


तब भी क्या आनन्द बांटने, इधर नहीं आना है ?

छोटी ख़ुशी मनाने आ, जो शीघ्र बड़ी पाना है ||

चर्चा-मंच : 646

http://charchamanch.blogspot.com/

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुन्दर....

सहज साहित्य said...

प्रेम की सादगी ही उसकी गुरुता और गम्भीरता है । सचमुच बाद्लों से लड़ाई हो ही जाए यदी सूरज चाहे तो !नवल कल्पना और न अभिव्यंजना का मणि-कांचन प्रयोग है आपकी यह कविता ।

Rajesh Kumari said...

pyaari si kavita.surajmukhi aur sooraj jiske bina vah rah nahi sakti.

दिगम्बर नासवा said...

Samvedansheel rachna ... bahut achee lagi ...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

कोमल प्रेम भावों की सुन्दर रचना

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत बढ़िया रचना |

मेरे ब्लॉग में भी आयें-

**मेरी कविता**

रेखा said...

बहुत ही खुबसूरत ...

veerubhai said...

बेहतरीन कविता .लड़ तू मेरे लिए बादलों से लड़झगड़ .

Udan Tashtari said...

उम्दा रचना....