Friday, 10 February 2012

321. नन्हे हाथों में...

नन्हे हाथों में...

*******

नामुमकिन हो गया
उस सफ़र पर जाना
जहाँ जाने के लिए
बारहा कोशिश करती रही,
मर्जी नहीं थी
न चाह
पर यहाँ रुकना भी बेमानी लगता रहा,
ठीक उसी वक़्त
जब काफ़िला गुजरा
और मैंने कदम बढ़ा दिए
किसी ने मुझे रोक लिया,
पलट कर देखा
दो नन्हे हाथ
आँचल थामे हुए थे,
रिश्तों की दुहाई
जीवन पलट गया
मेरे साथ
उजाले की किरण न थी
पर उम्मीद की किरण तो थी
उन नन्हे हाथों में !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 1995)

________________________________________

11 comments:

Pallavi saxena said...

जब भले ही हमारे पास उजाले की कोई किरण न हो कोई आस न हो मगर तब भी यह नन्हे सुमन अपनी उम्मीदों की किरण से हमारे जीवन को जीने की वजह दे ही देते हैं।... खूबसूरत रचना।

vidya said...

बहुत सुन्दर...
नन्हे हाथ...
इन्हें कोई कैसे टाले..कैसे ठुकराए..

रश्मि प्रभा... said...

नन्हें हाथों की उम्मीद साँसें बन चलती जाती हैं ...

kshama said...

Bahut,bahut sundar!

***Punam*** said...

"मेरे साथ
उजाले की किरण न थी
पर उम्मीद की किरण तो थी
उन नन्हे हाथों में !"




जिंदगी के कई निर्णय ऐन मौके पर ऐसे ही बदल दिए जाते हैं....
और ये बदलाव जीवन में possitive दृष्टिकोण ही लाते है....
बस,धैर्य चाहिए उसी क्षण रुकने का.....
जब कि पाँव बढ़ने वाले हों...
अब,रोकने वाले कोई नन्हें से हाथ हो सकते हैं...
या फिर आपका आपना विचलित मन.....!!

vandan gupta said...

बहुत सुन्दर भाव समेटे हैं।

Unknown said...

एक भी हो तो भी ..उम्मीद की किरण तो है...

Gyan Darpan said...

बहुत बढ़िया रचना

Smart Indian said...

सही कहा। ये नन्हे हाथ ही जीवन की दिशा बदल देते हैं।

amrendra "amar" said...

bahut sunder, bahut hi bhavpurn rachna .........

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

नन्हे हाथों में आशा की किरणें , वाह क्या सुंदर व सकारात्मक भाव हैं, बधाई...