Friday, February 10, 2012

नन्हे हाथों में...

नन्हे हाथों में...

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नामुमकिन हो गया
उस सफ़र पर जाना
जहां जाने के लिए
बारहा कोशिश करती रही,
मर्जी नहीं थी
न चाह
पर यहाँ रुकना भी बेमानी लगता रहा,
ठीक उसी वक़्त
जब काफ़िला गुजरा
और मैंने कदम बढ़ा दिए
किसी ने मुझे रोक लिया,
पलट कर देखा
दो नन्हे हाथ
आँचल थामे हुए थे,
रिश्तों की दुहाई
जीवन पलट गया
मेरे साथ
उजाले की किरण न थी
पर उम्मीद की किरण तो थी
उन नन्हे हाथों में !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 1995)

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11 comments:

Pallavi said...

जब भले ही हमारे पास उजाले की कोई किरण न हो कोई आस न हो मगर तब भी यह नन्हे सुमन अपनी उम्मीदों की किरण से हमारे जीवन को जीने की वजह दे ही देते हैं।... खूबसूरत रचना।

vidya said...

बहुत सुन्दर...
नन्हे हाथ...
इन्हें कोई कैसे टाले..कैसे ठुकराए..

रश्मि प्रभा... said...

नन्हें हाथों की उम्मीद साँसें बन चलती जाती हैं ...

kshama said...

Bahut,bahut sundar!

***Punam*** said...

"मेरे साथ
उजाले की किरण न थी
पर उम्मीद की किरण तो थी
उन नन्हे हाथों में !"




जिंदगी के कई निर्णय ऐन मौके पर ऐसे ही बदल दिए जाते हैं....
और ये बदलाव जीवन में possitive दृष्टिकोण ही लाते है....
बस,धैर्य चाहिए उसी क्षण रुकने का.....
जब कि पाँव बढ़ने वाले हों...
अब,रोकने वाले कोई नन्हें से हाथ हो सकते हैं...
या फिर आपका आपना विचलित मन.....!!

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भाव समेटे हैं।

Dr.Nidhi Tandon said...

एक भी हो तो भी ..उम्मीद की किरण तो है...

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत बढ़िया रचना

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सही कहा। ये नन्हे हाथ ही जीवन की दिशा बदल देते हैं।

amrendra "amar" said...

bahut sunder, bahut hi bhavpurn rachna .........

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

नन्हे हाथों में आशा की किरणें , वाह क्या सुंदर व सकारात्मक भाव हैं, बधाई...