शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

551. उदासी (क्षणिका)

उदासी  

*******  

ज़बरन प्रेम ज़बरन रिश्ते  
ज़बरन साँसों की आवाजाही  
काश! कोई ज़बरन उदासी भी छीन ले!  

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2017)  
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शनिवार, 1 जुलाई 2017

550. ज़िद (क्षणिका)

ज़िद

*******  

एक मासूम सी ज़िद है-  
सूरज तुम छुप जाओ  
चाँद तुम जागते रहना  
मेरे सपनों को आज  
ज़मीं पर है उतरना। 

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2017)
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शुक्रवार, 30 जून 2017

549. धरा बनी अलाव (गर्मी के 10 हाइकु)

धरा बनी अलाव  

***  

1.  
दोषी है कौन?  
धरा बनी अलाव,  
हमारा कर्म   

2.  
आग उगल  
रवि गर्व से बोला-  
सब झुलसो!  

3.  
रोते थे वृक्ष-  
'मत काटो हमको' 
अब भुगतो   

4.  
ये पेड़ हरे  
साँसों के रखवाले  
मत काटो रे 

5.  
बदली सोचे-  
आँखों में आँसू नहीं  
बरसूँ कैसे?  

6.  
बिन आँसू के  
आसमान है रोया,  
मेघ खो गए   

7.  
आग फेंकता  
उजाले का देवता  
रथ पे चला   

8.  
अब तो चेतो  
प्रकृति को बचा लो,  
नहीं तो मिटो   

9.  
कण्ठ सूखता  
नदी-पोखर सूखे  
क्या करे जीव?  

10.  
पेड़ व पक्षी  
प्यास से तड़पते  
लिपट रोते   

-जेन्नी शबनम (29.6.2017)
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रविवार, 25 जून 2017

548. फ़ौजी-किसान (19 हाइकु)

फ़ौजी-किसान  

***  

1.  
कर्म पे डटा  
कभी नहीं थकता  
फ़ौजी-किसान   

2.  
किसान हारे  
ख़ुदकुशी करते,  
बेबस सारे   

3.  
सत्ता निर्लज्ज   
राजनीति करती,  
मरे किसान   

4.  
बिकता मोल  
पसीना अनमोल,  
भूखा किसान   

5.  
कोई न सुने  
किससे कहे हाल  
डरे किसान   

6.  
भूखा-लाचार  
उपजाता अनाज  
न्यारा किसान   

7.  
माटी का पूत  
माटी को सोना बना  
माटी में मिला    

8.  
क़र्ज़ में डूबा  
पेट भरे सबका,  
भूखा, अकड़ा   

9.  
कर्म ही धर्म  
किसान कर्मयोगी,  
जीए या मरे   

10.  
अन्न उगाता  
सर्वहारा किसान  
बेपरवाह   

11.  
निगल गई  
राजनीति राक्षसी  
किसान मृत   

12.  
अन्न का दाता  
किसान विष खाता  
होके लाचार   

13.  
देव अन्न का  
मोहताज अन्न का  
कैसा है न्याय?   

14.  
बग़ैर स्वार्थ  
करते परमार्थ  
किसान योगी   

15.  
उम्मीदें टूटीं  
किसानों की ज़िन्दगी  
जग से रूठी   

16.  
हठी किसान  
हार नहीं मानता 
साँसें निढाल   

17.  
रँगे धरती  
किसान रंगरेज़,  
ख़ुद बेरंग   

18.  
माटी में सना  
माटी का रखवाला  
माटी में मिला   

19.  
हाल बेहाल  
प्रकृति बलवान  
रोता किसान 

-जेन्नी शबनम (20.6.2017)
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गुरुवार, 1 जून 2017

547. मर गई गुड़िया

मर गई गुड़िया  

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गुड़ियों के साथ खेलती थी गुड़िया  
ता-ता थइया नाचती थी गुड़िया  
ता ले ग म, ता ले ग म गाती थी गुड़िया  
क ख ग घ पढ़ती थी गुड़िया  
तितली-सी उड़ती थी गुड़िया 

ना-ना ये नही है मेरी गुड़िया  
इसके तो पंख है नुचे  
कोमल चेहरे पर ज़ख़्म भरे  
सारे बदन से रक्त यूँ है रिसता  
ज्यों छेनी-हथौड़ी से कोई पत्थर है कटा   

गुड़िया के हाथों में अब भी है गुड़िया  
जाने कितनी चीख़ी होगी गुड़िया  
हर प्रहार पर माँ-माँ पुकारी होगी गुड़िया  
तड़प-तड़पकर मर गई गुड़िया  
कहाँ जानती होगी स्त्री का मतलब गुड़िया   

जिन दानवों ने गुड़िया को नोच खाया  
पौरुष दम्भ से सरेआम हुंकार रहा  
दूसरी गुड़िया को तलाश रहा  
अख़बार के एक कोने में ख़बर छपी  
एक और गुड़िया हवस के नाम चढ़ी    

मूक लाचार बनी न्याय व्यवस्था  
सबूत गवाह सब अकेली थी गुड़िया  
जाने किस ईश का शाप मिला  
कैसे किसी ईश का मन न पसीजा  
छलनी हुआ माँ बाप का सीना   

जाने कहाँ उड़ गई है मेरी गुड़िया  
वापस अब नही आएगी गुड़िया  
ना-ना अब नही चाहिए कोई गुड़िया  
जग हँसाई को हम कैसे सहें गुड़िया  
हम भी तुम्हारे पास आ रहे मेरी गुड़िया 

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2017)  
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शनिवार, 13 मई 2017

546. तहज़ीब (क्षणिका)

तहज़ीब

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तहज़ीब सीखते-सीखते  
तमीज़ से हँसने का शऊर आ गया  
तमीज़ से रोने का हुनर आ गया  
न आया तो तहज़ीब और तमीज़ से  
ज़िन्दगी जीना नहीं आया।  

- जेन्नी शबनम (13. 5. 2017)
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गुरुवार, 11 मई 2017

545. हमारी माटी (गाँव पर 20 हाइकु)

हमारी माटी    

***  

1.  
किरणें आईं   
खेतों को यूँ जगाती   
जैसे हो माई।  

2.  
सूरज जागा  
पेड़-पौधे मुस्काए  
खिलखिलाए।  

3.  
झुलसा खेत  
उड़ गई चिरैया  
दाना न पानी।  

4.  
दुआ माँगता  
थका-हारा किसान  
नभ ताकता।  

5.  
जादुई रूप  
चहूँ ओर बिखरा  
आँखों में भरो।  

6.  
आसमाँ रोया  
खेतिहर किसान  
संग में रोए।  

7.  
पेड़ हँसते  
बतियाते रहते,  
बूझो तो भाषा?  

8.  
बहती हवा  
करे अठखेलियाँ  
नाचें पत्तियाँ।  

9.  
पास बुलाती  
प्रकृति है रिझाती  
प्रवासी मन।  

10.  
पाँव रोकती,  
बिछुड़ी थी कबसे  
हमारी माटी।  

11.  
चाँद उतरा  
चाँदनी में नहाई  
सभी मड़ई।  

12.  
बुढ़िया बैठी  
ओसारे पर धूप  
क़िस्सा सुनाती।  

13.  
हरी सब्ज़ियाँ  
मचान पे लटकी  
झूला झूलती।  

14.  
आम्र मंजरी  
पेड़ों पर खिलके  
मन लुभाए।  

15.  
गिरा टिकोला  
खट्टा-मीठा-ठिगना  
मन टिके ना।  

16.  
रवि हारता  
गरमी हर लेती  
ठण्डी बयार।  

17.  
गप्पें मारती  
पूरबा दिनभर   
गाछी पे बैठी।  

18.  
बुढ़िया दादी  
टाट में से झाँकती  
धूप बुलाती।  

19.  
गाँव का चौक  
जगमग करता  
मानो शहर।  

20.  
धूल उड़ाती  
पशुओं की क़तार  
गोधूली वेला।  

-जेन्नी शबनम (11.5.2017)  
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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

544. सुख-दुःख जुटाया है (क्षणिका)

सुख-दुःख जुटाया है  

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तिनका-तिनका जोड़कर सुख-दुःख जुटाया है  
सुख कभी-कभी झाँककर   
अपने होने का एहसास कराता है   
दुःख सोचता है कभी तो मैं भूलूँ उसे   
ज़रा देर वो आराम करे 
मेरे मायके वाली टिन की पेटी में

- जेन्नी शबनम (24. 4. 2017)
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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

543. एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में (तुकांत)

एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में

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तन्हा रहे ताउम्र अपनों की भीड़ में  
एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में  

वक़्त के आइने में दिखा ये तमाशा
ख़ुद को निहारा पर दिखे न भीड़ में  

एक अनदेखी ज़ंजीर से बँधा है मन
तड़पे है पर लहू रिसता नहीं पीर में  

शानों शौक़त की लम्बी फ़ेहरिस्त है
साँस-साँस क़र्ज़दार गिनती मगर अमीर में  

रूबरू होने से कतराता है मन
जंग देख न ले जग मुझमें औ ज़मीर में  

पहचान भी मिटी सब अपने भी रूठे
पर ज़िन्दगी रुकी रही कफ़स के नजीर में  

बसर तो हुई मगर कैसी ये ज़िन्दगी
हँसते रहे डूब के आँखों के नीर में  

सफ़र की नादानियाँ कहती किसे 'शब'
कमबख़्त उलझी ज़िन्दगी अपने शरीर में  

- जेन्नी शबनम (17. 4. 2017)
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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

542. विकल्प (क्षणिका)

विकल्प  

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मेरे पास कोई विकल्प नहीं  
मैं हर किसी की विकल्प हूँ   
कामवाली, सफ़ाईवाली, रसोईया छुट्टी पर 
पशु को खिलानेवाला, चौकीदार छुट्टी पर 
तो मैं इन सभी की विकल्प बनती हूँ   
पर, मैं विकल्पहीन हूँ    
काश! मेरा भी कोई विकल्प हो  
एक दिन ही सही मैं छुट्टी पर जाऊँ   

- जेन्नी शबनम (1. 4. 2017)  
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शुक्रवार, 24 मार्च 2017

541. साथ-साथ

साथ-साथ 

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तुम्हारा साथ  
जैसे बंजर ज़मीन में फूल खिलना  
जैसे रेगिस्तान में जल का स्रोत फूटना।  
अकसर सोचती हूँ  
तुममें कितनी ज़िन्दगी बसती है  
बार-बार मुझे वापस खींच लाते हो ज़िन्दगी में  
मेरे घर मेरे बच्चे  
सब से विमुख होती जा रही थी  
ख़ुद का जीना भूल रही थी।  
उम्र की इस ढलान पर  
जब सब साथ छोड़ जाते है  
न तुमने हाथ छुड़ाया  
न तुम ज़िन्दगी से गए  
तुमने ही दूरी पार की  
जब लगा कि 
इस दूरी से मैं खंडहर बन जाऊँगी।   
तुमने मेरे जज़्बातों को ज़मीन दी  
और उड़ने का हौसला दिया  
देखो मैं उड़ रही हूँ  
जी रही हूँ!  
तुम पास रहो या दूर रहो  
साथ-साथ रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना।   

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2017)  
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मंगलवार, 21 मार्च 2017

540. नीयत और नियति

नीयत और नियति  

***  

नीयत और नियति समझ से परे है
एक झटके में सब बदल देती है  
ज़िन्दगी अवाक्! 
 
काँधे पर हाथ धरे चलते-चलते  
पीठ में गहरी चुभन  
अनदेखे लहू का फ़व्वारा  
काँधे पर का हाथ काँपता तक नहीं  
ज़िन्दगी हतप्रभ! 
 
सपनों के पीछे दौड़ते-दौड़ते  
जाने कितनी सदियाँ गुज़र जातीं   
पर सपने न मुठ्ठी में, न नींद में  
ज़िन्दगी रुख़्सत! 
 
सुख के अम्बार को देखते-देखते  
चकाचौंध से झिलमिल
दुःख का ग़लीचा, पाँवों के नीचे बिछ जाता  
ज़िन्दगी व्याकुल!  

पहचाने डगर पर  
ठिठकते-ठिठकते क़दम तो बढ़ते  
पर पक्की सड़क गड्ढे में तब्दील हो जाती  
ज़िन्दगी बेबस! 
 
पराए घर को सँवारते-सँवारते  
उम्र की डोर छूट जाती  
रिश्ते बेमानी हो जाते  
हर कोने में मौजूद रहकर 
हर एक इंच दूसरों का  
पराया घर, पराया ही रह जाता  
ज़िन्दगी विफल! 
 
बड़ी लम्बी कहानी सुनते-सुनते  
हर कोई भाग खड़ा होता  
अपना-पराया कोई नहीं  
मन की बात मन तक  
साँसों की गिनती थमती नहीं  
ज़िन्दगी बेदम!
  
नीयत और नियति के चक्र में  
लहूलुहान मन 
ज़िन्दगी कब तक?

-जेन्नी शबनम (21.3.2017)  
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शनिवार, 18 मार्च 2017

539. रेगिस्तान

रेगिस्तान

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मुमकिन है यह उम्र  
रेगिस्तान में ही चुक जाए  
कोई न मिले उस जैसा  
जो मेरी हथेलियों पर  
चमकते सितारों वाला  
आसमान उतार दे।   

यह भी मुमकिन है  
एक और रेगिस्तान  
सदियों-सदियों से  
बाँह पसारे मेरे लिए बैठा हो  
जिसकी हठीली ज़मीन पर  
मैं ख़ुशबू के ढाई बोल उगा दूँ।   

कुछ भी हो सकता है  
अनदेखा अनचाहा  
अनकहा अनसुना  
या यह भी कि तमाम ज़माने के सामने  
धड़धड़ाता हुआ कँटीला मौसम आए  
और मेरे पेशानी से लिपट जाए।  

यह भी तो मुमकिन है  
मैं रेगिस्तान से याराना कर लूँ  
शबो-सहर उसके नाम गुनगुनाऊँ  
साथ जीने मरने की कस्में खाऊँ  
और एक दूसरे के माथे पर  
अपने लहू से ज़िन्दगी लिख दूँ।   

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2017)
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सोमवार, 13 मार्च 2017

538. जागा फागुन (होली के 10 हाइकु)

जागा फागुन 

***  

1.  
होली कहती-  
खेलो रंग गुलाल  
भूलो मलाल   

2.  
जागा फागुन  
एक साल के बाद,  
खिलखिलाता   

3.  
सब हैं रँगे  
फूल, तितली, भौंरे  
होली के रंग   

4.  
खेल तो ली है  
रंग-बिरंगी होली  
रँगा न मन   

5.  
छुपती नहीं  
होली के रंग से भी  
मन की पीर   

6.  
रंग-अबीर  
तन को रँगे, पर  
मन फ़क़ीर  

7.  
रंगीली होली  
इठलाती आई है  
मस्ती छाई है   

8.  
उड़के आता  
तन-मन रँगता  
रंग-गुलाल   

9.  
मुर्झाए रिश्ते  
किसकी राह ताके  
होली बेरंग  

10.  
रंग-अबीर  
फगुनाहट लाया  
मन बौराया   

-जेन्नी शबनम (12.3.2017)
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बुधवार, 1 मार्च 2017

537. हवा बसन्ती (बसन्त ऋतु पर 10 हाइकु) पुस्तक 83,84

हवा बसन्ती  

*******  

1.  
हवा बसन्ती  
लेकर चली आई  
रंग-बहार   

2.  
पीली ओढ़नी  
लगती है सोहणी  
धरा ने ओढ़ी   

3.  
पीली सरसों  
मस्ती में झूम रही,  
आया बसन्त   

4.  
कर शृंगार  
बसन्त ऋतु आई  
जग मोहित   

5.  
कोयल कूकी-  
आओ सखी बसन्त   
साथ में नाचें   

6.  
धूप सुहानी  
छटा है बिखेरती  
झूला झूलती   

7.  
पात झरते,  
जीवन होता यही,  
सन्देश देते   

8.  
विदा हो गया  
ठिठुरता मौसम,  
रुत सुहानी   

9.  
रंग फैलाती  
कूदती-फाँदती ये,  
बसन्ती हवा   

10.  
मधुर तान  
चहूँ ओर छेड़ती  
हवा बसन्ती   

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2017)
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सोमवार, 23 जनवरी 2017

536. मुआ ये जाड़ा (ठंड के हाइकु 10) पुस्तक 82, 83

मुआ ये जाड़ा  

*******

1.  
रज़ाई बोली-  
जाता क्यों नहीं जाड़ा,
अब मैं थकी   

2.  
फिर क्यों आया  
सबको यूँ कँपाने,  
मुआ ये जाड़ा   

3.  
नींद से भागे
रजाई मे दुबके  
ठंडे सपने   

4.  
सूरज भागा  
थर-थर काँपता,  
माघ का दिन   

5.  
मुँह तो दिखा-  
कोहरा ललकारे,  
सूरज छुपा   

6.  
जाड़ा! तू जा न-  
करती है मिन्नतें,
काँपती हवा   

7.  
रवि से डरा  
दुम दबा के भागा  
अबकी जाड़ा   

8.  
धुंध की शाल  
धरती ओढ़े रही  
दिन व रात   

9.  
सबको देती  
ले के मुट्ठी में धूप,  
ठंडी बयार   

10.  
पछुआ हवा  
कुनमुनाती गाती  
सूर्य शर्माता   

- जेन्नी शबनम (23. 1. 2017)  
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सोमवार, 16 जनवरी 2017

535. तुम भी न बस कमाल हो

तुम भी न बस कमाल हो  

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धत्त!
तुम भी न बस कमाल हो!  
न सोचते न विचारते  
सीधे-सीधे कह देते  
जो भी मन में आए  
चाहे प्रेम या गुस्सा  
और नाराज़ भी तो बिना बात ही होते हो  
जबकि जानते हो  
मनाना भी तुम्हें ही पड़ेगा  
और ये भी कि  
हमारी ज़िन्दगी का दायरा  
बस तुम तक  
और तुम्हारा बस मुझ तक  
फिर भी अटपटा लगता है  
जब सबके सामने  
तुम कुछ भी कह देते हो  
तुम भी न बस कमाल हो!  

- जेन्नी शबनम (16. 1. 2017)
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रविवार, 1 जनवरी 2017

534. जीवन को साकार करें (क्षणिका)

जीवन को साकार करें 

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अति बुरी होती है  
साँसों की हो या संयम की  
विचलन की हो या विभोर की  
प्रेम की हो या परित्याग की  
जीवन सहज, निरंतर और मंगल है  
अतियों का त्यागकर, सीमित को अपनाकर  
जीवन के लय में बहकर  
जीवन का सत्कार करें, जीवन को साकार करें  

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2017)
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