Saturday, October 22, 2011

बाध्यता नहीं (क्षणिका)

बाध्यता नहीं
(क्षणिका)

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ये चाह थी मेरी कि
तुम्हें चाहूँ
और तुम मुझे,
पर
ये सिर्फ
मेरी चाह थी
तुम्हारी बाध्यता नहीं !

_ जेन्नी शबनम (अक्टूबर 9, 2011)

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15 comments:

dheerendra11 said...

कम शब्दों में सब कुछ कह दिया..सुंदर पोस्ट मुझे पसंद आई...बधाई

***Punam*** said...

"ये चाह थी मेरी कि
तुम्हें चाहूँ
और तुम मुझे,
पर
ये सिर्फ
मेरी चाह थी
तुम्हारी बाध्यता नहीं !"

अब इसके आगे क्या कहूँ....?
और चाहूँ भी तो क्या चाहूँ...??

Dr.Nidhi Tandon said...

रिश्तों में चाह ..हो सकती अहि पर चाहने की बाध्यता होना उचित नहीं...कम शब्दों में आपने सारी बात कह दी .

sushma 'आहुति' said...
This comment has been removed by the author.
रविकर said...

वाह, बहुत सुंदर ||

रश्मि प्रभा... said...

मेरी चाह थी
तुम्हारी बाध्यता नहीं !... फिर बाध्यता से परे मुझे ही खुश रहना है . कम शब्दों में गहरे एहसास

सदा said...

ये सिर्फ
मेरी चाह थी
तुम्हारी बाध्यता नहीं !"

वाह ..बहुत ही बढि़या ।

Maheshwari kaneri said...

बहुत ही खुबसूरत.....

Kailash C Sharma said...

बहुत खूब ! कुछ शब्दों में बहुत कुछ कह दिया..

sushma 'आहुति' said...

कम शब्द गहरे भाव.....

Rajesh Kumari said...

bahut khoob bahut kuch chipa hai in panktiyon me.

दिगम्बर नासवा said...

हर कोई अपनी चाह के लिए ही जीता है ... कम शब्दों में गहरी बात ...

Rakesh Kumar said...

वाह! आपकी चाहत बहुत खूबसूरत है.
बाध्यता के बंधन से मुक्त.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
आपके अमूल्य विचारों से मेरा मनोबल
बढ़ता है.

Ashok Kumar said...

BHAWNA KO SHABD ME DHALNA;
NISSANDEH KUCHH KAHANE KO
MERE PAS SHABD NAHI HAI.

सहज साहित्य said...

प्रेम के सात्विक रूप को कुछ ही शब्दों में भावपूर्ण आकार देने में आपकी क्षमता सराहनीय है जेन्नी जी । ये पंक्तियाँ बहुत प्रभाशाली हैं-
ये चाह थी मेरी कि
तुम्हें चाहूँ
और तुम मुझे,