गुरुवार, 3 अगस्त 2023

761. बिछड़े खेत (चोका- 15)

बिछड़े खेत

*** 


खेत बेचारे   

एक दूजे को देखें   

दुख सुनाएँ   

भाई-भाई से वे थे   

सटे-सटे-से   

मेड़ से जुड़े हुए,   

बिछड़े खेत   

बिक गए जो खेत   

वे रोते रहे   

मेड़ बना बाउंड्री   

कंक्रीट बिछे   

खेत से उपजेंगे   

बहुमंज़िला   

पत्थर-से मकान,   

खेत के अन्न   

शहर ने निगले   

बदले दिए   

कंक्रीट के जंगल,   

खेत का दर्द   

कोई  समझता   

धन की माया   

समझे सरमाया,   

खेत-किसान   

बेबस  लाचार   

हो रहे ख़त्म   

अन्नखेतकिसान   

खेत  बचा   

अन्न कहाँ उपजे?   

कौन क्या खाए?   

 सरमायादार   

अब तू पत्थर खा।  


- जेन्नी शबनम (2.8.2023)

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बुधवार, 21 जून 2023

760. हरदी गुरदी

हरदी गुरदी 

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कभी-कभी जी चाहता है   

इतना जिऊँ इतना जिऊँ इतना जिऊँ

कि ज़िन्दगी कहे-

अब बस! थक गई! अब और नहीं जी सकती! 

हरदी गुरदी! हरदी गुरदी! हरदी गुरदी!

पर सोचती हूँ

मैं ज़िन्दा भी हूँ क्या?

जो इतना जिऊँ इतना जिऊँ इतना जिऊँ

क्यों जियूँ, कैसे जियूँ, कितना जियूँ?

मैं तो कब की मर चुकी 

कभी भाला कभी तीर व तलवार से

सदियों सदियों सदियों से

अभी तेज़ाब आग बलात्कार और चुन्नी के फन्दों से

इसी सदी में इसी सदी में इसी सदी में

आज खून से लथपथ चीख रही हूँ 

अभी अभी अभी

 तब किसी ने सुना  देखा  जाना

 अब। 

दिन महीने साल  सदियाँ 

आपस में कानाफूसी करते रहते-

ये ज़िन्दा क्यों रहती है?

ये मरकर हर बार जी क्यों जाती है?

मौत इसको छूकर लौट क्यों आती है 

ये औरतें भी  अजीब चीज़ हैं 

कितना भी मारो 

जीना नहीं छोड़ती। 

सोचती हूँ 

मैं हँसती हूँ तो प्रश्न

प्रेम करती हूँ तो प्रश्न

अकेलेपन को भोगती हूँ तो प्रश्न

आबरू बचाने के लिए जूझती हूँ तो प्रश्न 

हिम्मत दिखाती हूँ तो प्रश्न 

हार जाती हूँ तो प्रश्न 

अधिकार माँगती हूँ तो प्रश्न 

प्रश्न प्रश्न प्रश्न। 

उफ!

मेरी ज़ात ज़िन्दा है

यह प्रश्न है

बहुत बहुत बहुत जीना चाहती

यह भी प्रश्न है। 

प्रश्नों से घिरी मैं 

इतना इतना इतना जिऊँगी

कि ज़िन्दगी कहे-

जीना सीखो इससे

फिर कभी न कहना-

हरदी गुरदी! हरदी गुरदी! हरदी गुरदी!


- जेन्नी शबनम (21.6.2023)

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सोमवार, 5 जून 2023

759. पर्यावरण (10 हाइकु)

पर्यावरण

1.

भटक रहे 

जंगल-मरुस्थल 

जीव व जन्तु।   


2.

जंगल मिटा

बना है मरुस्थल 

आँखें हैं नम।


3.

कब उजड़े 

काँप रहे जंगल

रौद्र मानव। 


4.

बिछा पत्थर 

खोई पगडण्डी 

पाँव में चुभे। 


5.

दूषित जल

नदी है तड़पती 

प्यास की मारी। 


6.

कौन सुनेगा

उजड़ने की व्यथा

प्रकृति रोती। 


7.

ताल-तलैया

आसमान को ताके 

सूखते जाते। 


8.

नाग-सा डँसे

व्यभिचारी मानव

प्रकृति रोए। 


9.

शहर बना

पत्थरों का जंगल

मन वीरान। 


10.

पर्यावरण 

अब कैसे मुस्काए?

बड़ी लाचारी।


-जेन्नी शबनम (5.6.2023)

(पर्यावरण दिवस) 

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गुरुवार, 9 मार्च 2023

758. होली (9 हाइकु)

होली (9 हाइकु)

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1.

वासन्ती पर्व   

बन्धनों से हों मुक्त   

देती है सीख। 


2.

मन झूमता   

रंग की है बौछार   

मिलते यार। 


3.

हँसी-मज़ाक   

ये रंगीन-फुहार   

उम्र भुलाए। 


4.

फाग-तरंग   

हँसे मन मलंग   

खेलो रे रंग। 


5.

झूमके नाची   

अलसाई-सी देह   

होली के संग। 


6.

नशीला रंग   

मन को दिया रँग   

आओ खेले रंग।   


7.

होली रंगीन   

भिगोया जब तन   

मन भी रँगा। 


8.

फ़िज़ा रंगीन 

फागुन की फुहार 

मन क्यों सूना?


9.

रंग वही है

होली की खुमारी है,

मन  रँगा। 


- जेन्नी शबनम (8. 3. 23)

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सोमवार, 30 जनवरी 2023

757. मम्मी (मम्मी की दूसरी पुण्यतिथि)

मम्मी 

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जीवन का दस्तूर
सबको निभाना होता है
मरने तक जीना होता है।

तुम जीवन जीती रही
संघर्षों से विचलित होती रही
बच्चों के भविष्य के सपने
तुम्हारे हर दर्द पर विजयी होते रहे
पाई-पाई जोड़कर
हर सपनों को पालती रही
व्यंग्य-बाण से खुदे हर ज़ख़्म पर
बच्चों की खुशियों के मलहम लगाती रही।

जब आराम का समय आया
संघर्षों से विराम का समय आया
तुम्हारे सपनों पर किसी की नज़र लग गई
तुम्हारी ज़िन्दगी एक बार फिर बिखर गई 
तुम रोती रही, सिसकती रही
अपनी क़िस्मत को कोसती रही।

अपनी संतान की वेदना से
तुम्हारा मन छिलता रहा
उन ज़ख़्मों से तुम्हारा तन-मन भरता रहा
अशक्त तन पर हजारों टन की पीड़ा
घायल मन पर लाखों टन की व्यथा
सह न सकी यह बोझ
अंततः तुम हार गई
संसार से विदा हो गई
सभी दुःख से मुक्त हो गई।

पापा तो बचपन में गुज़र चुके थे 
अब मम्मी भी चली गई
मुझे अनाथ कर गई
अब किससे कहूँ कुछ भी
कहाँ जाऊँ मैं?

तुम थी तो एक कोई घर था
जिसे कह सकती थी अपना
जब चाहे आ सकती थी
चाहे तो जीवन बिता सकती थी
कोई न कहता- 
निकल जाओ 
इस घर से बाहर जाओ
तुम्हारी कमाई का नहीं है
यह घर तुम्हारा नहीं है।

मेरी हारी ज़िन्दगी को एक भरोसा था-
मेरी मम्मी है न
पर अब?

तुमसे यह तन, तुम-सा यह तन
अब तुम्हारी तरह हार रहा है
मेरा जीवन अब मुझसे भाग रहा है।

तुम्हारा घर अब भी मेरा है
तुम्हारा दिया अब भी एक ओसारा है
पर तुम नहीं हो, कहीं कोई नहीं है
तुम्हारी यह बेटी का अब कुछ नहीं है 
वह सदा के लिए कंगाल हो गई है।

-जेन्नी शबनम (30. 1. 2023)
(मम्मी की दूसरी पुण्यतिथि)
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सोमवार, 23 जनवरी 2023

756. पुल

पुल 

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पुल तो ध्वस्त हो गया   
जिससे दोनों पाटों को जोड़कर   
पार कर जाते थे अथाह खाई। 
   
हाँ, एक पतली सी डोरी छोड़ दी थी   
शायद किसी मोड़ पर वापसी हो   
तो लौटना मुमकिन हो सके   
यह याद रखते हुए   
कि यह अन्तिम   
अस्त्र, शस्त्र और मन्त्र है। 
   
जीवन के प्रवाह की   
यह डोरी अगर टूटी या छूटी   
फिर उम्र और वक़्त की सीमा कुछ भी हो   
जीवन एक पार ही रहेगा। 
   
तमाम अंतर्द्वंद्वों को समझते जानते हुए   
अब कोई नया पुल न बनेगा   
न मरम्मत की जाएगी   
न कोई सूत जोड़ी या छोड़ी जाएगी।

-जेन्नी शबनम (23.1.23)
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मंगलवार, 3 जनवरी 2023

755. नार्सिसिस्ट

नार्सिसिस्ट 

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उसका प्यार, उसकी नफ़रत   
उसका आरोप, उसका प्रत्यारोप   
उसकी प्रताड़ना, शिकायत   
उसकी दया, क्षमा   
उसका परिहास, उपहास   
उसके बन्धन, क्रन्दन   
उसका सच, झूठ 
कुछ समझ नहीं आता।
  
यह कैसा चरित्र है   
जो दूसरों के आँसू में हँसी तलाशता है   
दूसरों को नीचा गिराकर दम्भ से हुंकारता है।
    
वह मानता है  
वह सर्वश्रेष्ठ है 
ईश्वर की संतान है   
चाँद-तारे, धरती-आकाश   
पूरे विश्व की पहचान है   
उससे बेहतर कोई नहीं   
अगर उसे कोई बेहतर लग गया   
तो उसके सम्मान पर वह इतनी चोट करेगा   
कि दूसरा आत्मसमर्पण कर दे   
या आत्मविश्वास खो दे   
या हीनता का शिकार होकर    
उसकी तरह बीमार हो जाए   
या पर-कटे पंछी की तरह छटपटाए   
और इन सबसे उसकी बाँछें खिल जाती हैं   
उसे मिलती है बेइन्तिहा ख़ुशी। 
  
यह आत्ममुग्धता क्या है?   
क्या इसका कोई ईलाज है?   
शायद नहीं! 
नार्सिसिस्ट पर दया की जाए   
या जान बचाकर पलायन करना उचित है?
   
दिमाग़ शून्य हो जाता है   
यह कैसा चक्रव्यूह है   
जिससे बाहर आने की राहें तो हैं   
मगर इतनी कँटीली 
कि तन-मन दोनों छलनी होंगे   
न जीवन जीते बनेगा 
न मरने की हिम्मत बचेगी। 
   
या अल्लाह!   
क्यों बनाता है तू ऐसा मानव?   
ये नार्सिसिस्ट   
न किसी से प्रेम कर सकते   
न किसी की हत्या   
जीवनभर दूसरों को तड़पाकर   
आनन्दित होते हैं।
   
मुक्ति का कोई उपाय नहीं। 

-जेन्नी शबनम (1.1.2023)
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बुधवार, 16 नवंबर 2022

754. मेरा पर्स : मेरी ज़िन्दगी

मेरा पर्स : मेरी ज़िन्दगी  

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मेरा पर्स मानो भानुमति का पिटारा है
उसमें मेरी ज़रूरत की सभी चीज़ें हैं। 
 
अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों में
सब कुछ बेधड़क निकल आता है
मेरी दवाओं से लेकर
बिस्किट, चॉकलेट, पानी
काग़ज़, कलम, रूमाल
और जो काग़ज़ पर आज तक उतरे नहीं 
ऐसी कई ख़याल
कुछ मास्क, सैनिटाइजर, मेट्रो कार्ड
अचानक ख़रीददारी के लिए थैले
हाँ! मुझे क्रेडिट-डेबिट कार्ड का 
इस्तेमाल करना नहीं आता
तो कुछ कैश रुपये, जिससे मेरा काम चल जाए
मेरा पहचान पत्र और देह-दान कार्ड भी है
आकस्मिक दुर्घटना के बाद अस्पताल पहुँच सकूँ
देह-दान का कार्ड 
जिसपर दो मोबाइल नम्बर लिखे हुए हैं
ताकि दान-प्रक्रिया की अनुमति देने में देर न हो। 

सोचती हूँ कि मेरी ज़रूरतें कितनी कम हैं
कफ़न और साँसें, जो मेरे पर्स में नहीं हैं
बाक़ी जीवन से मृत्यु तक के सफ़र का सामान है। 

पर्स तो बदलती हूँ पर सामान नहीं
इन सामानों के बिना जीना मुश्किल है
और मरना भी आसान नहीं
जाने कब ज़रूरत पड़ जाए
मेरे पर्स में मेरी ज़िन्दगी पड़ी है
और मृत्यु के बाद की मेरी इच्छा भी। 

-जेन्नी शबनम (16.11.2022)
(जन्मदिन)
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शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

753. ज़िन्दगी नहीं है (तुकान्त)

ज़िन्दगी नहीं है 

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बहुत कुछ था जो अब नहीं है   
कुछ है पर ज़िन्दगी नहीं है।
   
कश्मकश में उलझकर क्या कहें   
जो कुछ भी था अब नहीं है। 
  
हयात-ए-सफ़र पर चर्चा क्या   
कहने को बचा अब कुछ नहीं है। 
  
फ़िसलते नातों का ये दौर   
ख़तम होता अब क्यों नहीं है। 
  
रह-रहकर पुकारता है मन   
सब है पर अपना कोई नहीं है। 
  
'शब' की बातें कच्ची-पक्की   
ज़िन्दा है पर ज़िन्दगी नहीं है। 

- जेन्नी शबनम (11. 11. 22)
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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

752. सपने हों पूरे / गर तू आ जाता (6 माहिया)

सपने हों पूरे

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1.
मन में जो आस खिली 
जीवन में मेरे 
अब जाकर प्रीत मिली। 
 
2.
थी अभिलाषा ये मन में 
सपने हों पूरे 
सारे इस जीवन में।  

- जेन्नी शबनम (10. 7. 2013)
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गर तू आ जाता 
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1.
पानी बहता जैसे 
बिन जाने समझे 
जीवन गुज़रा वैसे। 

2.
फूलों-सी खिल जाती 
गर तू आ जाता 
तुझमें मैं मिल जाती। 

3.
अजब यह कहानी है 
बैरी दुनिया से 
पहचान पुरानी है। 

4.
सुख का सूरज चमका 
आशाएँ जागी 
मन का दर्पण दमका। 

- जेन्नी शबनम (30. 1. 2014)
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