शुक्रवार, 14 जून 2013

409. अहल्या

अहल्या

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छल भी तुम्हारा 
बल भी तुम्हारा
ठगी गई मैं, अपवित्र हुई मैं 
शाप भी दिया तुमने  
मुक्ति-पथ भी बताया तुमने      
पाषाण बनाया मुझे 
उद्धार का आश्वासन दिया मुझे 
दाँव पर लगी मैं  
इंतज़ार की व्यथा सही मैंने 
प्रयोजन क्या था तुम्हारा?
मंशा क्या थी तुम्हारी?
इंसान को पाषाण बनाकर 
पाषाण को इंसान बनाकर 
शक्ति-परीक्षण, शक्ति-प्रदर्शन 
महानता तुम्हारी, कर्तव्य तुम्हारा 
बने ही रहे महान
कहलाते ही रहे महान 
इन सब के बीच 
मेरा अस्तित्व ?
मैं अहल्या  
मैं कौन?
मैं ही क्यों?
तुम श्रद्धा के पात्र 
तुम भक्ति तुल्य 
और मैं?

- जेन्नी शबनम (14. 6. 2013)
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शुक्रवार, 7 जून 2013

408. खूँटे से बँधी गाय

खूँटे से बँधी गाय

******* 

खूँटे से बँधी गाय 
जुगाली करती-करती 
जाने क्या-क्या सोचती है  
अपनी ताक़त 
अपनी क्षमता 
अपनी बेबसी 
और गौ पूजन की परम्परा  
जिसके कारण वह ज़िंदा है  
या फिर इस कारण भी कि
वैसी ज़रूरतें 
जिन्हें सिर्फ़ वो ही पूरी कर सकती है  
शायद उसका कोई विकल्प नहीं 
इस लिए ज़िंदा रखी गई है  
जब चाहा 
दूसरे खूँटे से उसे बाँध दिया गया 
ताकि ज़रूरतें पूरी करे  
कौन जाने, ख़ुदा की मंशा 
कौन जाने, तक़दीर का लिखा 
उसके गले का पगहा 
उसके हर वक़्त को बाँध देता है 
ताकि वो आज़ाद न रहे कभी 
और उसकी ज़िन्दगी 
पल-पल शुक्रगुज़ार हो उनका 
जिन्होंने एक खूँटा दिया 
और खूँटा गड़े रहने की जगह 
ताकि खूँटे के उस दायरे में 
उसकी ज़िन्दगी सुरक्षित रहे  
और वक़्त की इंसाफी  
उसके खूँटे की ज़मीन आबाद रहे।  

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2013)
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रविवार, 2 जून 2013

407. शगुन (क्षणिका)

शगुन

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हवा हर सुबह चुप्पी ओढ़ 
अँजुरी में अमृत भर 
सूर्य को अर्पित करती है 
पर सूरज है कि जलने के सिवा 
कोई शगुन नहीं देता।  

- जेन्नी शबनम (2. 6. 2013)
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रविवार, 26 मई 2013

406. गुलमोहर (16 हाइकु) पुस्तक - 36-38

गुलमोहर

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1.
उनका आना 
जैसे मन में खिला  
गुलमोहर। 

2.
खिलता रहा  
गुलमोहर फूल  
पतझर में।  

3.
तुम्हारी छवि 
जैसे दोपहरी में  
गुलमोहर। 

4.
झरी पत्तियाँ
गुलमोहर हँसा 
आई बहार। 

5.
झूमती हवा 
गुलमोहर झूमा 
रुत सुहानी। 

6.
उसकी हँसी-
झरे गुलमोहर 
सुर्ख़ गुलाबी। 

7.
गुलमोहर!
तुमसे ही है सीखा 
खिले रहना। 

8.
खिलता रहा    
गुलमोहर-गाछ
शेष मुर्झाए। 

9.
सजाके पथ  
रहता है बेफ़िक्र 
गुलमोहर।  

10.
हवा ने कहा-
गुलमोहर सुन
साथ में उड़। 

11.
उड़के आया 
गुलमोहर फूल 
मेरे अँगना।  

12.
पसरा रंग 
गुलमोहर-गंध    
बैसाख ख़ुश। 

13.
आम्र-मंजरी 
फूल गुलमोहर 
दोनों चहके। 

14.
सुर्ख़ फूलों-सा 
तेरा रंग खिला, ज्यों
गुलमोहर। 

15.
गुलमोहर 
क़तार में हैं खड़े 
प्रहरी बड़े। 

16.
पलाश फूल 
गुलमोहर फूल 
दोनों आओ न। 

- जेन्नी शबनम (2. 5. 2013)
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सोमवार, 13 मई 2013

405. माँ (मातृ दिवस पर 11 हाइकु) पुस्तक 35,36

 माँ 

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1.
जिससे सीखा 
सहनशील होना, 
वो है मेरी माँ।   

2.
माँ-सी है छवि 
माँ मुझमें है बसी,  
माँ देती रूप।  

3.
स्त्री है जननी 
रच दिया संसार 
पर लाचार।  

4.
हर नारी माँ 
हर बेटी होती माँ 
मुझमें भी माँ।   

5.
हर माँ देती 
सूरज-सी रोशनी 
निःस्वार्थ भाव।  

6.
रचा संसार 
मानी गई बेकार, 
जाने क्यों नारी? 

7.
धरा-सी धीर 
बन कोख की ढाल 
प्रेम लुटाती। 

8.
माँ की ममता 
ब्रह्मांड है समाया 
ओर न छोर।  

9.
प्यार लुटाती  
प्यार को तरसती  
पीर लिये माँ।  

10.
उसने छला 
जिसके लिए मिटी
लाचार है माँ।  

11.
एक ही दिन 
क्यों याद आती है वो?
जो जन्म देती।  

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2013)
(मातृ दिवस पर )
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रविवार, 5 मई 2013

404. तुम्हारा 'कहा'

तुम्हारा 'कहा'

******* 

जानती हूँ, तुम्हारा 'कहा' 
मुझसे शुरू होकर 
मुझ पर ही ख़त्म होता है, 
उस 'कहा' में 
क्या कुछ शामिल नहीं होता 
प्यार 
मनुहार 
जिरह 
आरोप 
सरोकार 
संदेह 
शब्दों के डंक,
तुम जानते हो 
तुम्हारी इस सोच ने मुझे तोड़ दिया है 
ख़ुद से भी नफ़रत करने लगी हूँ
और सिर्फ़ इस लिए मर जाना चाहती हूँ 
ताकि मेरे न होने पर 
तुम्हारा ये 'कहा'
तुम किसी से कह न पाओ 
और तुमको घुटन हो  
तुम्हारी सोच, तुमको ही बर्बाद करे 
तुम रोओ, किसी 'उस' के लिए 
जिसे अपना 'कहा' सुना सको 
जानती हूँ 
मेरी जगह कोई न लेगा 
तुम्हारा 'कहा' 
अनकहा बनकर तुमको दर्द देगा 
और तब आएगा मुझे सुकून,
जब भी मैंने तुमसे कहा कि
तुम्हारा ये 'कहा' मुझे चुभता है 
न बोलो, न सोचो ऐसे 
हमेशा तुम कहते हो- 
तुम्हें न कहूँ तो भला किससे 
एक तुम ही तो हो 
जिस पर मेरा अधिकार है 
मेरा मन, प्रेम करूँ 
या जो मर्जी 'कहा' करूँ। 

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2013)
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बुधवार, 1 मई 2013

403. औक़ात देखो

औक़ात देखो

***

पिछला जन्म  
पाप की गठरी   
धरती पर बोझ  
समाज के लिए पैबन्द   
यह सब सुनकर भी  
मुँह उठाए, तुम्हें ही अगोरा 
मन टूटा, पर तुम्हें ही देखा। 
  
असाध्य तुम, पर जीने की सहूलियत तुमसे 
मालूम है, मेरी पैदाइश हुई है 
उन कामों को करने के लिए, जो निकृष्ट हैं  
जिन्हें करना तुम अपनी शान के ख़िलाफ़ मानते हो  
या तुम्हारी औक़ात से परे है। 
 
काम करना मेरा स्वभाव है  
मेरी पूँजी है और मेरा धर्म भी  
फिर भी  
मैं भाग्यहीन, बेग़ैरत, कृतघ्न, फ़िजूल। 
 
जान लो तुम   
मैंने अपना सारा वक़्त दिया है तुम्हें 
ताकि तुम चैन से आँखें मूँद सो सको  
हर प्रहार को अपने सीने पर झेला है 
ताकि तुम सुरक्षित रह सको   
पसीने से लिजबिज मेरा बदन 
आठों पहर सिर्फ़ तुम्हारे लिए खटा है  
ताकि तुम मनचाही ज़िन्दगी जी सको। 
     
कभी चैन के पल नहीं ढूँढे   
कभी नहीं कहा कि ज़रा देर रुकने दो 
होश सँभालने से लेकर जिस्म की ताक़त खोने तक 
दुनिया का बोझ उठाया है मैंने। 
  
अट्टालिकएँ मुझे जानती हैं  
मेरे बदन का ख़ून चखा है उसने  
लहलहाती फ़सलें मेरी सखा हैं  
मुझसे ही पानी पीती हैं   
फुलवारी के फूल  
अपनी सुगन्ध की उत्कृष्टता मुझसे ही पूछते हैं। 
  
मेरे बिना तुम सब अपाहिज हो 
तुम बेहतर जानते हो   
एक पल को अगर रुक जाऊँ 
दुनिया थम जाएगी      
चन्द मुट्ठी भर तुम सब  
मेरे ही बल पर शासन करते हो  
फिर भी कहते- 
''अपनी औक़ात देखो''   

-जेन्नी शबनम (1.5.2013) 
(मज़दूर दिवस) 
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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

402. जन्म का खेल (7 हाइकु) पुस्तक 34,35

जन्म का खेल

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1.
हर जन्म में 
तलाशती ही रही 
ज़रा-सी नेह। 

2.
प्रतीक्षारत 
एक नए युग की 
कई जन्मों से। 

3.
परे ही रहा 
समझ से हमारे 
जन्म का खेल। 

4.
जन्म के साथी 
हो ही जाते पराए
जग की रीत। 

5.
रोज़ जन्मता 
पल-पल मरके 
है वो इंसान। 

6.
शाश्वत खेल 
न चाहें पर खेलें 
जन्म-मरण। 

7.
जितना सच 
है जन्म, मृत्यु भी है 
उतना सच। 

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2013)
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बुधवार, 24 अप्रैल 2013

401. अब तो जो बचा है (पुस्तक- 79)

अब तो जो बचा है

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दो राय नहीं 
अब तक कुछ नहीं बदला था  
न बदला है, न बदलेगा 
सभ्यता का उदय और संस्कार की प्रथाएँ 
युग परिवर्तन और उसकी कथाएँ
आज़ादी का जंग और वीरता की गाथाएँ 
एक-एक कर सब बेमानी 
शिक्षा-संस्कार-संस्कृति, घर-घर में दफ़न, 
क्रांति-गीत, क्रांति की बातें 
धर्म-वचन, धार्मिक-प्रवचन 
जैसे भूखे भेड़ियों ने खा लिए
और उनकी लाश को
मंदिर मस्जिद पर लटका दिया, 
सामाजिक व्यवस्थाएँ 
जो कभी व्यवस्थित हुई ही नहीं 
सामाजिक मान्यताएँ, चरमरा गईं  
नैतिकता, जाने किस सदी की बात थी 
जिसने शायद किसी पीर के मज़ार पर 
दम तोड़ दिया था, 
कमज़ोर क़ानून 
ख़ुद ही जैसे हथकड़ी पहन खड़ा है 
अपनी बारी की प्रतीक्षा में 
और कहता फिर रहा है  
आओ और मुझे लूटो-खसोटो
मैं भी कमज़ोर हूँ  
उन स्त्रियों की तरह 
जिन पर बल प्रयोग किया गया
और दुनिया गवाह है, सज़ा भी स्त्री ने ही पाई, 
भरोसा, अपनी ही आग में लिपटा पड़ा है
बेहतर है वो जल ही जाए 
उनकी तरह जो हारकर ख़ुद को मिटा लिए 
क्योंकि उम्मीद का एक भी सिरा न बचा था
न जीने के लिए, न लड़ने के लिए,
निश्चित ही, पुरुषार्थ की बातें 
रावण के साथ ही ख़त्म हो गई 
जिसने छल तो किया
लेकिन अधर्मी नहीं बना  
एक स्त्री का मान तो रखा,
अब तो जो बचा है
विद्रूप अतीत, विक्षिप्त वर्तमान 
और लहूलुहान भविष्य 
और इन सबों की साक्षी 
हमारी मरी हुई आत्मा! 

- जेन्नी शबनम (24. 4. 2013)
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रविवार, 21 अप्रैल 2013

400. रात (11 हाइकु) पुस्तक 33, 34

रात

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1.
चाँद न आया 
रात की बेक़रारी
बहुत भारी। 

2.
रात शर्माई 
चाँद का आलिंगन 
पूरनमासी।  

3.
रोज़ जागती 
तन्हा रात अकेली 
दुनिया सोती। 

4.
चन्दा के संग
रोज़ रात जागती 
सब हैं सोए।  

5.
जाने किधर  
भटक रही नींद 
रात गहरी। 

6. 
चाँद जो सोया 
करवट लेकर 
रात है रूठी। 

7.
चाँद को जब  
रात निगल गई 
चाँदनी रोई। 

8.
हिस्से की नींद 
सदियों बाद मिली 
रात है सोई। 

9.
रात जागती 
सोई दुनिया सारी 
मन है भारी। 

10.
अँधेरी रात, 
है चाँद-सितारो  की 
बैठक आज।  

11.
काला-सा टीका 
रात के माथे पर 
कृष्ण पक्ष में। 

- जेन्नी शबनम (2. 4. 2013)
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बुधवार, 17 अप्रैल 2013

399. इलज़ाम न दो

इलज़ाम न दो

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आरोप निराधार नहीं 
सचमुच तटस्थ हो चुकी हूँ 
संभावनाओं की सारी गुंजाइश मिटा रही हूँ 
जैसे रेत पे ज़िन्दगी लिख रही हूँ
मेरी नसों का लहू आग में लिपटा पड़ा है 
पर मैं बेचैन नहीं
जाने किस मौसम का इंतज़ार है मुझे?
आग के राख में बदल जाने का 
या बची संवेदनाओं से प्रस्फुटित कविता के 
कराहती हुई इंसानी हदों से दूर चली जाने का
शायद इंतज़ार है 
उस मौसम का जब 
धरती के गर्भ की रासायनिक प्रक्रिया 
मेरे मन में होने लगे 
तब न रोकना मुझे न टोकना 
क्या मालूम 
राख में कुछ चिंगारी शेष हो 
जो तुम्हारे जुनून की हदों से वाक़िफ़ हों
और ज्वालामुखी-सी फट पड़े 
क्या मालूम मुझ पर थोपी गई लांछन की तहरीर 
बदल दे तेरे हाथों की लकीर
बेहतर है 
मेरी तटस्थता को इलज़ाम न दो
मेरी ख़ामोशी को आवाज़ न दो
एक बार 
अपने गिरेबान में झाँक लो।  

- जेन्नी शबनम (21. 2. 2013)
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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

398. मन में है फूल खिला (माहिया लिखने का प्रथम प्रयास) (5 माहिया)

मन में है फूल खिला (5 माहिया) 
(माहिया लिखने का प्रथम प्रयास)

*******

1.
जाने क्या लाचारी   
कोई ना समझे    
मन फिर भी है भारी !  

2.
सन्देशा आज मिला  
उनके आने का 
मन में है फूल खिला !

3.
दुनिया भरमाती है  
है अजब पहेली   
समझ नहीं आती है !

4.
मैंने दीप जलाया   
जब भी तू आया 
मन ने झूमर गाया  ! 

5.
चुपचाप हवा आती 
थपकी यूँ देती  
ज्यों लोरी है गाती !

- जेन्नी शबनम (3. 4. 2013)

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बुधवार, 3 अप्रैल 2013

397. अद्भुत रूप (5 ताँका)

अद्भुत रूप (5 ताँका) 

***

1.
नीले नभ से
झाँक रहा सूरज, 
बदली खिली 
भीगने को आतुर
धरा का कण-कण।  

2.
झूमती नदी 
बतियाती लहरें
बलखाती है 
ज्यों नागिन हो कोई  
अद्भुत रूप लिए। 

3.
मैली कुचैली 
रोज़-रोज़ है होती
पापों को धोती, 
किसी को न रोकती 
बेचारी नदी रोती।  

4.
जल उठा है 
फिर से एक बार 
बेचारा चाँद 
जाने क्यों चाँदनी है 
रूठी अबकी बार। 

5.
उठ गया जो 
दाना-पानी उसका 
उड़ गया वो,
भटके वन-वन 
परिन्दों का जीवन। 

-जेन्नी शबनम (1.4.2013)
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रविवार, 31 मार्च 2013

396. आदत

आदत

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सपने-अपने, ज़िन्दगी-बन्दगी   
धूप-छाँव, अँधेरे-उजाले   
सब के सब   
मेरी पहुँच से बहुत दूर   
सबको पकड़ने की कोशिश में   
ख़ुद को भी दाँव पर लगा दिया   
पर, मुँह चिढ़ाते हुए   
वे सभी, आसमान पर चढ़ बैठे 
मुझे दुत्कारते, मुझे ललकारते   
यूँ जैसे जंग जीत लिया हो   
कभी-कभी, धम्म से कूद   
वे मेरे आँगन में आ जाते   
मुझे नींद से जगा   
टूटे सपनों पर मिट्टी चढ़ा जाते   
कभी स्याही, कभी वेदना के रंग से   
कुछ सवाल लिख जाते   
जिनके जवाब मैंने लिख रखे हैं    
पर कह पाना   
जैसे, अँगारों पर से नंगे पाँव गुज़रना   
फिर भी मुस्कुराना   
अब आसमान तक का सफ़र   
मुमकिन तो नहीं   
आदत तो डालनी ही होगी   
एक-एक कर सब तो छूटते चले गए   
आख़िर   
किस-किस के बिना जीने की आदत डालूँ? 

- जेन्नी शबनम (31. 3. 2013) 
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बुधवार, 27 मार्च 2013

395. होली के रंग (8 हाइकु) पुस्तक 32, 33

होली के रंग

*******

1.
रंग में डूबी 
खेले होरी दुल्हिन  
नई नवेली। 

2. 
मन चितेरा 
अब तक न आया 
फगुआ बीता। 

3.
धरती रँगी 
सूरज नटखट 
गुलाल फेंके। 

4.
खिलखिलाया 
रंग और अबीर
वसंत आया। 

5.
उड़ती हवा 
बिखेरती अबीर 
रंग बिरंगा। 

6.
तन पे चढ़ा 
फागुनी रंग जब,
मन भी रँगा।  

7.
ओ मेरे पिया 
करके बरजोरी
रंग ही दिया। 

8.
फागुनी हवा 
उड़-उड़ बौराती
रंग रंगीली। 

- जेन्नी शबनम (27. 3. 2013)
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शनिवार, 23 मार्च 2013

394. आत्मा होती अमर (10 सेदोका)

आत्मा होती अमर (10 सेदोका)

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1.
छिड़ी है जंग 
सच झूठ के बीच 
किसकी होगी जीत ?
झूठ हारता  
भले देर-सबेर  
होता सच विजयी !  

2.
दिल बेजार 
रो-रो कर पूछता
क्यों बनी ये दुनिया ?
ऐसी दुनिया -
जहाँ नहीं अपना 
रोज़ तोड़े सपना !

3.
कुंठित सोच 
भयानक है रोग 
सर्वनाश की जड़,
खोखले होते 
मष्तिष्क के पुर्जे 
बदलाव कठिन !

4.
नश्वर नहीं
फिर भी है मरती 
टूट के बिखरती, 
हमारी आत्मा 
कहते धर्म-ज्ञानी -
आत्मा होती अमर !

5.
अपनी पीड़ा 
सदैव लगी छोटी,
गैरों की पीड़ा बड़ी,
खुद को भूल  
जी चाहता हर लूँ 
सारे जग की पीड़ा !

6.
फड़फड़ाते
पर कटे पक्षी-से
ख्वाहिशों के सम्बन्ध,
उड़ना चाहे  
पर उड़ न पाएँ  
नियत अनुबंध !

7.
नहीं विकल्प 
मंज़िल की डगर 
मगर लें संकल्प 
बहुत दूर 
विपरीत सफर 
न डिगेंगे कदम !

8.
एक पहेली 
बूझ-बूझ के हारी 
मगर अनजानी, 
ये जिंदगानी 
निरंतर चलती 
जैसे बहती नदी !

9.
संभावनाएँ
सफलता की सीढ़ी 
कई राह खोलतीं,
जीवित हों तो,
मरने मत देना 
संभावना जीवन ! 

10.
पुनरुद्धार 
अपनी सोच का हो
अपनी आत्मा का हो  
तभी तो होगा 
जीवन गतिमान 
मंज़िल भी आसान !

- जेन्नी शबनम (अगस्त 7, 2012)

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गुरुवार, 21 मार्च 2013

393. यह कविता है (क्षणिका)

यह कविता है

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मन की अनुभूति   
ज़रा-ज़रा जमती, ज़रा-ज़रा उगती
ज़रा-ज़रा सिमटती, ज़रा-ज़रा बिखरती  
मन की परछाई बन एक रूप है धरती
मन के व्याकरण से मन की स्लेट पर 
मन की खल्ली से जोड़-जोड़कर कुछ हर्फ़ है गढ़ती
नहीं मालूम इस अभिव्यक्ति की भाषा 
नहीं मालूम इसकी परिभाषा
सुना है, यह कविता है। 

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2013)
(विश्व कविता दिवस पर)
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बुधवार, 20 मार्च 2013

392. स्त्री के बिना (स्त्री पर 7 हाइकु) पुस्तक 32

स्त्री के बिना 

*******

1.
अग्नि-परीक्षा  
अब और कितना 
देती रहे स्त्री। 

2.
नारी क्यों पापी 
महज़ देखने से 
पर-पुरुष। 

3.
परों को काटा 
पिंजड़े में जकड़ा 
मन न रुका। 

4.
स्त्री को मिलती 
मुट्ठी-मुट्ठी उपेक्षा 
जन्म लेते ही। 

5. 
घूरती रही 
ललचाई नज़रें, 
शर्म से गड़ी। 

6.
कुछ न पाया 
ख़ुद को भी गँवाया
लांछन पाया। 

7. 
नारी के बिना 
बसता अँधियारा
घर श्मशान। 

- जेन्नी शबनम (8. 3. 3013)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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सोमवार, 18 मार्च 2013

391. तुम्हें पसंद जो है (क्षणिका)

तुम्हें पसंद जो है

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तस्वीरों में तुम बड़े दिलकश लगते हो  
आँखों में शरारत, होंठों पर मुस्कुराहट
काली घनी लटें, कपाल को ज़रा-ज़रा-सी ढकती हुई
तस्वीर वही कहती है, जो मेरा मन चाहता है 
मेरे मनमाफ़िक तस्वीर खिंचवाना, तुम्हें पसंद जो है। 

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2013)
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बुधवार, 13 मार्च 2013

390. क्यों नहीं आते

क्यों नहीं आते

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अकसर सोचती हूँ  
इतने भारी-भारी-से 
ख़याल क्यों आते हैं
जिनको पकड़ना 
मुमकिन नहीं होता 
और अगर पकड़ भी लूँ
तो उसके बोझ से 
मेरी साँसे घुटने लगती हैं  
हल्के-फुल्के तितली-से 
ख़याल क्यों नहीं आते 
जिन्हें जब चाहे उछलकर पकड़ लूँ 
भागे तो उसके पीछे दौड़ सकूँ
और लपककर मुट्ठी में भर लूँ 
इतने हल्के कि अपनी जेब में भर लूँ 
या फिर कहीं भी छुपा कर रख सकूँ।  

- जेन्नी शबनम (13. 3. 13)
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शुक्रवार, 8 मार्च 2013

389. अब न ऊ देवी है न कड़ाह

अब न ऊ देवी है न कड़ाह

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सरेह से अभी-अभी लौटे हैं   
गोड़ में कादो-माटी, अँचरा में लोर  
दउरी में दू ठो रोटी-नून-मर्चा 
जाने काहे आज मन नहीं किया 
कुछो खाने का
न कौनो से बतियाने का 
भोरे से मन बड़ा उदास है 
मालिक रहते त आज इ दिन देखना न पड़ता 
आसरा छूट जाए, त केहू न अपन 
दू बखत दू-दू गो रोटी आ दू गो लूगा (साड़ी)
इतनो कौनो से पार न लगा  
अपन जिनगी लुटा दिए
मालिक चले गए 
कूट पीस के बाल बच्चा पोसे, हाकिम बनाए
अब इ उजर लूगा 
आ भूईयाँ पर बईठ के खाने से 
सबका इज्जत जाता है 
अपन मड़इए ठीक
मालिक रहते त का मजाल जे कौनो आँख तरेरता
भोरे से अनाज उसीनाता 
आ दू सेर धान-कुटनी ले जाती
अब दू कौर के लिए
भोरे-भोरे, सरेहे-सरेहे... 
आह!
अब न ऊ देवी है न कड़ाह। 

- जेन्नी शबनम (8. 3. 13)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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बुधवार, 6 मार्च 2013

388. चाँद का रथ (7 हाइकु) पुस्तक 31, 32

चाँद का रथ

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1.
थी विशेषता  
जाने क्या-क्या मुझमें,
हूँ अब व्यर्थ। 

2.
सीले-सीले-से
गर हों अजनबी, 
होते हैं रिश्ते। 

3.
मन का द्वन्द्व 
भाँपना है कठिन
किसी और का। 

4.
हुई बावली 
सपनों में गुजरा 
चाँद का रथ। 

5. 
जन्म के रिश्ते 
सदा नहीं टिकते 
जग की रीत।  

6.
अनगढ़-से
कई-कई किस्से हैं 
साँसों के संग। 

7.
हाइकु ऐसे   
चंद लफ़्ज़ों में पूर्ण 
ज़िन्दगी जैसे। 

- जेन्नी शबनम (18. 2. 2013)
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रविवार, 3 मार्च 2013

387. ज़िन्दगी स्वाहा (क्षणिका)

ज़िन्दगी स्वाहा

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कब तक आख़िर मेढ़क बन कर रहें
आओ संग-संग,एक बड़ी छलाँग लगा ही लें 
पार कर गए तो मंज़िल 
गिर पड़े तो वही दुनिया, वही कुआँ, वही कुआँ के मेढ़क 
टर्र-टर्र करते एक दूसरे को ताकते, ज़िन्दगी स्वाहा। 

- जेन्नी शबनम (3. 3. 2013)
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शुक्रवार, 1 मार्च 2013

386. कतर दिया

कतर दिया

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क्या-क्या न कतर दिया   
कभी सपने   
कभी आवाज़   
कभी ज़िन्दगी   
और तुम हो कि   
किसी बात की कद्र ही नहीं करते   
हर दिन एक नए कलेवर के साथ   
एक नई शिकायत   
कभी मेरे चुप होने पर   
कभी चुप न होने पर   
कभी सपने देखने पर   
कभी सपने न देखने पर   
कभी तहज़ीब से ज़िन्दगी जीने पर   
कभी बेतरतीब ज़िन्दगी जीने पर   
हाँ, मालूम है   
सब कुछ कतर दिया   
पर तुम-सी बन न पाई   
तुम्हारी रंजिश बस यही है।    

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2013) 
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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

385. हवा

हवा

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हवा कटार है, अंगार है, तूफ़ान है 
हवा जलती है, सुलगती है, उबलती है 
हवा लहू से लथपथ 
लाल और काले के भेद से अनभिज्ञ
बवालों से घिरी है। 
  
हवा ख़ुद से जिरह करती, शनैः-शनैः सिसकती है
हवा अपने ज़ख़्मी पाँव को घसीटते हुए 
दर-ब-दर भटक रही है 
हवा अपने लिए बैसाखी भी नहीं चाहती। 
 
वह जान चुकी है
हवा की अपनी मर्ज़ी नहीं होती 
ज़माने का रुख़
उसकी दिशा तय करता है। 

- जेन्नी शबनम (28.2.2013)
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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

384. यादें जो है ज़िन्दगी (5 सेदोका)

यादें जो है ज़िन्दगी (5 सेदोका)

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1.
वर्षा की बूँदें 
टप-टप बरसे 
मन का कोना भींगे, 
सींचती रही 
यादें खिलती रही  
यादें जो है ज़िन्दगी !

2.
जी ली जाती है 
कुछ लम्हें समेट
पूरी यह ज़िन्दगी,
पूर्ण भले हो  
मगर टीसती है 
लम्हे-सी ये ज़िन्दगी !

3.
महज नहीं
हाथ की लकीरों में 
ज़िन्दगी के रहस्य,
बतलाती हैं 
माथे की सिलवटें 
ज़िन्दगी के रहस्य !

4.
सीली ज़िन्दगी 
वक्त के थपेड़ों से 
जमती चली गई 
कैसे पिघले ?
हल्की-सी तपिश भी 
ज़िन्दगी लौटाएगी !

5.
शैतान हवा 
पलट दिया पन्ना 
खुल गई किताब 
थी अधपढ़ी
जमाने से थी छुपी 
ज़िन्दगी की कहानी !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 24, 2012)

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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

383. औरत : एक बावरी चिड़ी (7 हाइकु) पुस्तक 30, 31

औरत : एक बावरी चिड़ी 

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1.
चिड़िया उड़ी
बाबुल की बगिया 
सूनी हो गई।

2.
ओ चिरइया 
कहाँ उड़ तू चली 
ले गई ख़ुशी।

3.
चिड़ी चाहती
मन में ये कहती-
''बाबुल आओ''

4.
चिड़ी कहती-
काश! वह जा पाती 
बाबुल-घर।

5.
बावरी चिड़ी
ग़ैरों में वो ढूँढती
अपनापन।

6.
उड़ी जो चिड़ी
रुकती नहीं कहीं 
यही ज़िन्दगी।

7.
लौट न पाई  
एक बार जो उड़ी 
कोई भी चिड़ी।

- जेन्नी शबनम (1. 2. 2013)
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सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

382. जाड़ा भागो (13 हाइकु) पुस्तक 29, 30

जाड़ा भागो

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1.
आँख मींचती
थर-थर काँपती 
ठण्डी हवाएँ।

2.
आलसी दिन 
है झटपट भागा 
जो जाड़ा दौड़ा।

3.
सूरज सोता 
सर्द-सर्द मौसम
आग तापता।

4.
ज़रा-सी धूप 
पिटारी में छुपा लो 
सर्दी के लिए।

5.
स्वेटर-शाल
मन में इतराए 
जाड़ा जो आए।

6.
हार ही गई 
ठिठुरती हड्डियाँ
असह्य शीत। 

7.
कुनमुनाता
गीत गुनगुनाता  
सूरज जागा।

8.
मोती-सी बिछी 
सारी रात बिखरी
जाड़े की ओस। 

9.
सूर्य अकड़ू     
कम्बल औ रजाई 
देते दुहाई।

10.
दिन काँपता 
रात है ठिठुरती
ऐ जाड़ा, भागो!

11.
रस्सी पे टँगा   
घना काला कोहरा 
दिन औ रात।  

12.
सूर्य देवता 
अब जाग भी जाओ 
जाड़ा भगाओ।  

13.
सूरज जागा 
धूप खिलखिलाई   
कोहरा भागा।

-जेन्नी शबनम (26.12.2012)
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गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

381. प्रेम का जादू (वेलेन्टाइन डे पर 7 हाइकु)

प्रेम का जादू 

***

1.
प्रेम का पाग
घीमे-धीमे पकता
जो प्रेम सच्चा। 

2.
ख़ुद में लीन
गिरता-सँभलता
प्रेम अनाड़ी। 

3.
प्रेम का जादू 
सिर चढ़के बोले
जिसको लगे। 

4.
प्रेम की माला 
सब कोई जपता 
प्रेम न बूझा। 

5.
प्रेम की अग्नि 
ऊँच-नीच न देखे 
मन में जले। 

6.
प्रेम का काढ़ा
हर रोग की दवा 
पी लो ज़रा-सा। 

7.
प्रेम बन्धन 
न रस्सी, न साँकल
पर अटूट। 

-जेन्नी शबनम (14.2.2013)
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रविवार, 3 फ़रवरी 2013

380. हों मन सुवासित (नव वर्ष पर 7 हाइकु) पुस्तक 28

हों मन सुवासित 

*******

1.
शुभ प्रभात!
मंगल-कामनाएँ
नए साल में। 

2. 
खुशियाँ फैले 
हों मन सुवासित 
हम सब का। 

3.
स्वागत करें 
प्रेम व उल्लास से 
नव वर्ष का।  

4.
हँसके-रोके 
आख़िर बीत गया 
पुराना साल। 

5.
हो ख़ुशहाल 
यह सारा संसार 
मनवा चाहे। 

6.
नई उम्मीद 
नए साल से जागी 
परिपूर्ण हो। 

7.
पहली तिथी 
दो हज़ार तेरह
नूतन वर्ष। 

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2013)
(नव वर्ष पर)
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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

379. चकमा (क्षणिका)

चकमा 

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चलो आओ, हाथ थामो मेरा, मुट्ठी जोर से पकड़ो 
वहाँ तक साथ चलो, जहाँ ज़मीन-आसमान मिलते हैं 
वहाँ से सीधे नीचे छलाँग लगा लेते हैं 
आज वक़्त को चकमा दे ही देते हैं।  

- जेन्नी शबनम (31. 1. 2013)
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गुरुवार, 17 जनवरी 2013

378. स्टैचू बोल दे (10 क्षणिका)

स्टैचू बोल दे 

*******  

1. 
स्टैचू बोल दे
*** 
जी चाहता है  
उन पलों को तू स्टैचू बोल दे  
जिन पलों में वह साथ हो  
और फिर भूल जा

2.
लाइफ़
***  
एक मुट्ठी ही सही  
तू उसके मन में चाहत भर दे  
लाइफ़ भर का मेरा काम  
चल जाएगा

3.
बैलेंस 
***  
भरोसे की पोटली में  
ज़रा-सा भ्रम भी बाँध दे  
सत्य असह्य हो तो  
भ्रम मुझे बैलेंस करेगा

4.
नम्बर लॉक
***   
उसके लम्स के कतरे  
तू अपनी उस तिजोरी में रख दे  
जिसमें चाभी नहीं नंबर लॉक हो  
मेरी तरह वो तुझसे  
जबरन न कर सकेगा  

5.
सेटलाइट
***  
अंतरिक्ष में  
एक सेटलाइट टाँग दे  
जो सिर्फ़ मेरी निगहबानी करे  
तुझे जब फ़ुर्सत हो रिवाइंड कर  
और मेरा हाल जान ले

6. 
कैलेण्डर 
***
क़यामत का दिन  
तूने मुकरर्र तो किया होगा  
इस साल के कैलेण्डर में घोषित कर दे  
ताकि उससे पहले  
अपने सातों जन्म जी लूँ  

7.
सेविंग्स अकाउंट 
***  
अपना थोड़ा वक़्त  
तेरे बैंक के सेविंग्स अकाउंट में  
जमा कर दिया है  
न अपना भरोसा न दुनिया का  
अंतिम दिन कुछ वक़्त  
जो सिर्फ़ मेरा

8. 
मैनेजमेंट
*** 
मैं सागर हूँ  
मुझमें लहरें, तूफ़ान, ख़ामोशी, गहराई है  
इस दुनिया में भेजने से पहले  
मैनेजमेंट का कोर्स  
मुझे करा तो दिया होता  

9. 
बाय 
*** 
मेरे कहे को सच न मान  
रोज़ 'बाय' कर लौटना होता है  
और उसने कहा-  
जाकरके आते हैं  
कभी न लौटा  

10.
कंफ़्यूज़
***  
बहुत कंफ़्यूज़ हूँ
एक प्रश्न का उत्तर दे-  
मुझे धरती क्यों बनाया?  
जबकि मन इंसानी!  

- जेन्नी शबनम (17. 1. 2013)  
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सोमवार, 7 जनवरी 2013

377. क्रान्ति-बीज बन जाना (पुस्तक 59)

क्रान्ति-बीज बन जाना


***


रक्त-बीज से पनपकर 

कोमल पंखुड़ियों-सी खिलकर 

सूरज को मुट्ठी में भर लेना  

तुम क्रान्ति-बीज बन जाना। 


नाज़ुक हथेलियों पर  

अंगारों की लपटें दहकाकर 

हिमालय को मन में भर लेना  

तुम क्रान्ति-बीज बन जाना 


कोमल काँधे पर  

काँटों की फ़सलें उगाकर 

फूलों को दामन में भर लेना 

तुम क्रान्ति-बीज बन जाना 


मन की सरहदों पर

सन्देहों के बाड़ लगाकर

प्यार को सीने में भर लेना 

तुम क्रान्ति-बीज बन जाना। 

  

जीवन-पथ पर 

जब वार करे कोई अपना बनकर 

नश्तर बन पलटवार कर देना   

तुम क्रान्ति-बीज बन जाना। 


अनुकम्पा की बात पर 

भिड़ जाना इस अपमान पर  

बन अभिमानी भले जीवन हार देना

तुम क्रान्ति-बीज बन जाना   


सिर्फ़ अपने दम पर 

सपनों को पंख लगाकर 

हर हार को जीत में बदल देना 

तुम क्रान्ति-बीज बन जाना। 



-जेन्नी शबनम (7.1.2013)
[पुत्री के 13वें जन्मदिन पर]
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बुधवार, 12 दिसंबर 2012

376. कहो ज़िन्दगी (पुस्तक 95)

कहो ज़िन्दगी

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कहो ज़िन्दगी 
आज का क्या संदेश है 
किस पथ पे जाना शुभ है
किन राहों पे अशुभ घड़ी का दोष है?
कहो ज़िन्दगी   
आज कौन-सा दिन है
सोम है या शनि है
उजालों का राज है या, अँधेरों का मायाजाल है
स्वप्न और दुःस्वप्न का, क्या आपसी क़रार है?
कहो ज़िन्दगी  
अभी कौन-सा पहर है, सुबह है या रात है
या कि ढलान पर उतरती 
ज़िन्दगी की आख़िरी पदचाप है?
अपनी कसी मुट्ठियों में, टूटते भरोसे की टीस 
किससे छुपा रही हो?
मालूम तो है, यह संसार पहुँच से दूर है 
फिर क्यों चुप हो, अशांत हो?
अनभिज्ञ नहीं तुम 
फिर भी लगता है, जाने क्यों 
तुम्हारी ख़ुद से, नहीं कोई पहचान है 
कहों ज़िन्दगी  
क्या यही हो तुम?
सवाल दागती, सवालों में घिरी 
ख़ुद सवाल बन, अपने जवाब तलाशती 
सारे जवाब ज़ाहिर हैं, फिर भी 
पूछने का मन है- 
कहो ज़िन्दगी तुम्हारा कैसा हाल है?

- जेन्नी शबनम (12. 12. 2012)
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