शनिवार, 17 नवंबर 2018

593. लौट जाऊँगी

लौट जाऊँगी  

*******   

कब कहाँ खो आई ख़ुद को   
कब से तलाश रही हूँ ख़ुद को   
बात-बात पर कभी रूठती थी   
अब रूठूँ तो मनाएगा कौन   
बार-बार पुकारेगा कौन   
माँ की पुकार में दुलार का नाम   
अब भी आँखों में ला देता नमी   
ठहर गई है मन में कुछ कमी   
अब तो यूँ जैसे मैं बेनाम हो गई   
अपने रिश्तों के परवान चढ़ गई   
कोई पुकारे तो यूँ महसूस होता है   
गर्म सीसे का ग़ुब्बारा ज़ोर से मारा है   
कभी मेरी हँसी और ठहाके गूँजते थे   
अब ख़ुद से ही बतियाते मौसम बदलते हैं   
टी. वी. की शौक़ीन कृषि दर्शन तक देखती थी   
अब टी. वी. तो चलता है मगर क्या देखा याद नहीं   
वक़्त ने एक-एककर मुझसे मुझको छीन लिया   
ख़ुद को तलाशते-तलाशते वक़्त यूँ ही गुज़र गया   
सारे शिकवे शिकायत गंगा से कह आती हूँ   
आँखों का पानी सिर्फ़ गंगा ही देखती है   
वह भी ढाढ़स बँधाने बदली को भेज देती है   
मेरी आँखों-सी बदली भी जब तब बरसती है   
वो मंज़र जाने कब आएगा   
वो सुखद पल जाने कब आएगा   
सारे नातों से घिरी हुई मैं   
एक झूठ के चादर से लिपटी मैं   
सबको ख़ुशामदीद कह जाऊँगी   
तन्हा सफ़र पर लौट जाऊँगी   
खो आई थी कभी ख़ुद को   
ख़ुद से मिलकर   
ख़ुद के साथ चली जाऊँगी   
ख़ुद के साथ लौट जाऊँगी। 

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2018)   
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बुधवार, 7 नवंबर 2018

592. रंगीली दिवाली (दिवाली पर 10 हाइकु) पुस्तक 98,99

रंगीली दिवाली

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1.
छबीला दीया
ये रंगीली दीवाली
बिखेरे छटा। 

2.
साँझ के दीप
अँधेरे से लड़ते
वीर सिपाही।

3.
दीये नाचते
ये गुलाबी मौसम
ख़ूब सुहाते। 

4.
झूमती धरा
अमावस की रात
ख़ूब सुहाती। 

5.
दीप-शिखाएँ
जगमग चमके
दीप मालाएँ। 

6.
धूम धड़ाका
बेज़बान है डरा
चीखे पटाखा। 

7.
ज्योति फैलाता
नन्हा बना सूरज
दिवाली रात। 

8.
धरा ने ओढ़ी
जुगनुओं की चुन्नी
रात है खिली। 

9.
सत्य की जीत
दीवाली देती सीख
समझो जरा। 

10.
पेट है भूखा
ग़रीब की कुटिया,
कैसी दिवाली?

- जेन्ना शबनम (7. 11. 2018)
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

591. चाँद की पूरनमासी

चाँद की पूरनमासी

*** 

चाँद तेरे रूप में अब किसको निहारूँ?   
वह जो बचपन में दूर का खिलौना था   
या सफ़ेद बालों वाली बुढ़िया 
जो चरखे से रूई कातती रहती थी 
या वह साथी, जिससे बतकही करते हुए 
न जाने कितनी पूरनमासी की रातें बीती थीं 
इश्क़ के जाने कितने क़िस्से गढ़े गए थे 
जीवन के फ़लसफ़े जवान हुए थे। 
 
क़िस्से-कहानियों से तुम्हें निकालकर 
अपने वजूद में शामिलकर 
जाने कितना इतराया करती थी 
कितने सपनों को गुनती रहती थी 
अब यह सब बीते जीवन का क़िस्सा लगता है 
सीखों व अनुभवों की बोधकथा का हिस्सा लगता है। 
 
हर पूरनमासी की रात, जब तुम खिलखिलाओगे 
अपने रूप पर इठलाओगे 
मेरी बतकही अब मत सुनना 
मेरी विनती सुन लेना 
धरती पर चुपके से उतर जाना 
अँधेरे घरों में उजाला भर देना 
हो सके तो गोल-गोल रोटी बन जाना 
भूखों को एक-एक टुकड़ा खिला जाना। 
 
ऐ चाँद! अब तुमसे अपना नाता बदलती हूँ 
तुम्हें अपना गुरु मानकर  
तुममें अपने गुरु का रूप मढ़ देती हूँ 
मुझे जो पाठ सिखाया जीवन का 
जग को भी सिखला देना 
हर पूरनमासी को आकर 
यों ही उजाला कर जाना।

-जेन्नी शबनम (24.10.2018)
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रविवार, 14 अक्टूबर 2018

590. वर्षा (5 ताँका)

वर्षा    

***   

1.   
वर्षा की बूँदें   
उछलती-गिरती   
ठौर न पातीं    
मौसम बरसाती   
माटी को तलाशती।   

2.   
ओ रे बदरा   
इतना क्यों बरसे   
सब डरते   
अन्न-पानी दूभर   
मन रोए जीभर।   

3.   
मेघ दानव   
निगल गया खेत,   
आया अकाल   
लहू से लथपथ   
खेत व खलिहान।   

4.   
बरखा रानी   
झम-झम बरसी   
मस्ती में गाती   
खिल उठा है मन   
नाचता उपवन।   

5.   
प्यासी धरती   
अमृत है चखती   
सोंधी ख़ुशबू    
मन को है लुभाती   
बरखा तू है रानी।   

-जेन्नी शबनम (9.9.2018)
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सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

589. अनुभूतियाँ (क्षणिका)

अनुभूतियाँ   

*******   

कुछ अनुभूतियाँ, आकाश के माथे का चुम्बन है   
कुछ अनुभूतियाँ, सूरज की ऊर्जा का आलिंगन है   
हर चाहना हर कामना, अद्भूत अनोखा अँसुवन है   
न क्षीण न स्थाई, मगर ये भाव सहज सुहाना बंधन है।   

- जेन्नी शबनम (8. 10. 2018)   
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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

588. बापू (चोका - 9)

बापू (चोका)   

*******   

जन्म तुम्हारा   
सौभाग्य है हमारा   
तुमने दिया   
जग को नया ज्ञान   
हारे-पिछड़े   
वक्त ने जो थे मारे   
दुख उनका   
सह न पाए तुम   
तुमने किया   
अहिंसात्मक जंग   
तुमने कहा -   
सत्य और अहिंसा   
सच्चे विचार   
स्वयं पर विजय   
यही था बस   
तुम्हारा हथियार   
तुम महान   
लाए नया विहान   
दूर भगाया   
विदेशी सरमाया   
मगर देखो   
तुम्हारा उपकार   
भूला संसार   
छल से किया वार   
दिया आघात   
जो अपने तुम्हारे   
सीना छलनी   
हुई लहूलुहान   
तुम्हारी भूमि   
प्रण पखेरू उड़े   
तुम निष्प्राण   
जग में कोहराम   
ओह! हे राम!   
यह क्या हुआ राम!   
हिंसा से हारा   
अहिंसा का पुजारी   
तुम तो चले गए   
अच्छा ही हुआ   
न देखा यह सब   
देख न पाते   
तुम्हारी कर्मभूमि   
खंडों में टूटी   
तुम्हारा बलिदान   
हुआ है व्यर्थ   
तुम्हारे अपने ही   
छलते रहे   
खंजर भोंक रहे   
अपनों को ही   
तुम्हारी शिक्षा भूल   
तुम्हारा दर्शन   
तुम्हारे विचार त्याग   
घिनौने कार्य   
तुम्हारे नाम पर   
ओह! दुःखद!   
हम नहीं भूलेंगे   
अपनाएँगे   
तुमसे सीखा पाठ   
नमन बापू   
पूजनीय हो तुम   
अमर रहो तुम!   

- जेन्नी शबनम (2. 10. 2018)

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शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

587. मीठी-सी बोली (हिन्दी दिवस पर 10 हाइकु)

मीठी-सी बोली 

***   

1.   
मीठी-सी बोली   
मातृभाषा हमारी   
ज्यों मिश्री घुली।    

2.   
हिन्दी है रोती   
बेबस व लाचार   
बेघर होती।    

3.   
प्यार चाहती   
अपमानित हिन्दी   
दुखड़ा रोती।    

4.   
अँग्रेज़ी भाषा   
सर चढ़के बोले   
हिन्दी ग़ुलाम।    

5.   
विजय-गीत   
कभी गाएगी हिन्दी   
आस न टूटी।    

6.   
भाषा लड़ती   
अँग्रेज़ी और हिन्दी   
कोई न जीती।    

7.   
जन्मी दो जात   
अँग्रेज़ी और हिन्दी   
भारत देश।    

8.   
मन की पीर   
किससे कहे हिन्दी   
है बेवतन।    

9.   
हिन्दी से नाता   
नौकरी मिले कैसे   
बड़ी है बाधा।    

10.   
हमारी हिन्दी   
पहचान मिलेगी   
आस में बैठी।    

-जेन्नी शबनम (14.9.2018)   
(हिन्दी दिवस)
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सोमवार, 10 सितंबर 2018

586. चाँद रोज़ जलता है (तुकांत)

चाँद रोज़ जलता है   

*******   

तूने ज़ख़्म दिया तूने कूरेदा है   
अब मत कहना क़हर कैसा दिखता है।   

राख में चिंगारी तूने ही दबाई   
अब देख तेरा घर ख़ुद कैसे जलता है।   

तू हँसता है करके बरबादी ग़ैरों की   
ग़ुनाह का हिसाब ख़ुदा रखता है।   

पैसे के परों से तू कब तक उड़ेगा   
तेज़ बारिशों में काग़ज़ कब टिकता है।   

तू न माने 'शब' के दिल को सूरज जाने   
उसके कहे से चाँद रोज़ जलता है।   

- जेन्नी शबनम (10. 9. 2018)   
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शनिवार, 1 सितंबर 2018

585. फ़ॉर्मूला (पुस्तक 65)

फ़ॉर्मूला   

*******   

मत पूछो ऐसे सवाल   
जिसके जवाब से तुम अपरिचित हो   
तुम स्त्री-से नहीं हो   
समझ न सकोगे स्त्री के जवाब   
तुम समझ न पाओगे, स्त्री के जवाब में   
जो मुस्कुराहट है, जो आँसू है   
आख़िर क्यों है,   
पुरूष के जीवन का गणित और विज्ञान   
सीधा और सहज है   
जिसका एक निर्धारित फ़ॉर्मूला है   
मगर स्त्रियों के जीवन का गणित और विज्ञान   
बिलकुल उलट है   
बिना किसी तर्क का   
बिना किसी फ़ॉर्मूले का,   
उनके आँसुओं के ढेरों विज्ञान हैं    
उनकी मुस्कुराहटों के ढेरों गणित हैं   
माँ, पत्नी, पुत्री या प्रेमिका   
किसी का भी जवाब तुम नहीं समझ सकोगे   
क्योंकि उनके जवाब में अपना फ़ॉर्मूला फिट करोगे,   
तुम्हारे सवाल और जवाब, दोनों सरल हैं   
पर स्त्री का मन, देवताओं के भी समझ से परे है   
तुम तो महज़ मानव हो   
छोड़ दो इन बातों को   
मत विश्लेषण करो स्त्रियों का   
समय और समझ से दूर   
एक अलग दुनिया है स्त्रियों की   
जहाँ किसी का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं, न ही वर्जित है   
परन्तु शर्त एक ही है   
तुम महज़ मानव नहीं, इंसान बनकर प्रवेश करो   
फिर तुम भी जान जाओगे   
स्त्रियों का गणित   
स्त्रियों का विज्ञान   
स्त्रियों के जीवन का फ़ॉर्मूला   
फिर सारे सवाल मिट जाएँगे   
और जवाब तुम्हें मिल जाएगा।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2018)   
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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

584. कम्फर्ट ज़ोन

कम्फर्ट ज़ोन  
 
***   

कम्फ़र्ट ज़ोन के अन्दर    
तमाम सुविधाओं के बीच   
तमाम विडम्बनाओं के बीच   
सुख का मुखौटा ओढ़े   
शनैः-शनैः बीत जाता है, रसहीन जीवन   
हासिल होता है, महज़ रोटी, कपड़ा, मकान   
बेरंग मौसम और रिश्तों की भरमार। 
   
कम्फर्ट ज़ोन के अन्दर 
नहीं होती है कोई मंज़िल    
अगर है, तो पराई है मंज़िल।
   
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर   
अथाह परेशानियाँ मगर असीम सम्भावनाएँ    
अनेक पराजय मगर स्व-अनुभव   
अबूझ डगर मगर रंगीन मौसम   
असह्य संग्राम मगर अक्षुण्ण आशाएँ   
अपरिचित दुनिया मगर बेपनाह मुहब्बत   
अँधेरी राहें मगर स्पष्ट मंज़िल। 
  
बेहद कठिन है फ़ैसला लेना   
क्या उचित है? 
अपनी मंज़िल या कम्फर्ट ज़ोन। 

-जेन्नी शबनम (28.8.2018)   
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शनिवार, 18 अगस्त 2018

583. खिड़की स्तब्ध है

खिड़की स्तब्ध है

*******   

खिड़की, महज़ एक खिड़की नहीं   
वह एक एहसास है, संभावना है   
भीतर और बाहर के बीच का भेद   
वह बख़ूबी जानती है   
इस पार छुपा हुआ संसार है   
जहाँ की आवोहवा मौन है   
उस पार विस्तृत संसार है   
जहाँ बहुत कुछ मनभावन है   
खिड़की असमंजस में है   
खिड़की सशंकित है   
कैसे पाट सकेगी   
कैसे भाँप सकेगी   
दोनों संसार को   
एक जानदार है   
एक बेजान है,   
खिड़की स्तब्ध है!   

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2018)
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बुधवार, 15 अगस्त 2018

582. सिंहनाद करो

सिंहनाद करो  
 
***   

व्यर्थ लगता है   
शब्दों में समेटकर 
हिम्मत में लपेटकर 
अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करना। 
 
हम जिसे अपनी आज़ादी कहते हैं 
हम जिसे अपना अधिकार मानते हैं 
सुकून से दरवाज़े के भीतर 
देश की दुर्व्यवस्था पर 
देश और सरकार को कोसते हैं 
अपनी ख़ुशनसीबी पर 
अभिमान करते हैं कि हम सकुशल हैं। 
 
यह भ्रम जाने किस वक़्त टूटे   
असंवेदनशीलता का क़हर   
जाने कब धड़धड़ाता हुआ आए   
हमारे शरीर और आत्मा को छिन्न-भिन्न कर जाए। 

ज्ञानी-महात्मा कहते हैं  
सब व्यर्थ है 
जग मोह है, माया है, क्षणभंगुर है  
फिर तो व्यर्थ है हमारी सोच 
व्यर्थ है हमारी अभिलाषाएँ 
जो हो रहा है, होने दो 
नदी के साथ बहते जाओ 
आज़ादी हमारा अधिकार नहीं 
बस जीते जाओ, जीते जाओ। 
   
यही वक़्त है   
ख़ुद से अब साक्षात्कार करो 
सारे क़हर आत्मसात करो 
या फिर सिंहनाद करो।

-जेन्नी शबनम (15.8.2018)   
(स्वतंत्रता दिवस)
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रविवार, 5 अगस्त 2018

581. अनछुई-सी नज़्म (क्षणिका)

अनछुई-सी नज़्म   

*******   

कुछ कहो कि सन्नाटा भाग जाए   
चुप्पियों को लाज आ जाए   
अँधेरों की तक़दीर में भर दो रोशनाई से रंग   
कि छप जाए रंगों भरी ग़ज़ल   
और सदके में झुक जाए मेरी अनछुई-सी नज़्म।     

- जेन्नी शबनम (5. 8. 2018)
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शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

580. गुमसुम प्रकृति (प्रकृति पर 10 सेदोका)

गुमसुम प्रकृति
(प्रकृति पर 10 सेदोका)   

*******   

1.   
अपनी व्यथा   
गुमसुम प्रकृति   
किससे वो कहती   
बेपरवाह   
कौन समझे दर्द   
सब स्वयं में व्यस्त।   

2.   
वन, पर्वत   
सूरज, नदी, पवन   
सब हुए बेहाल   
लड़खड़ाती   
साँसें सबकी डरी   
प्रकृति है लाचार।   

3.   
कौन है दोषी?   
काट दिए हैं वन   
उगा कंक्रीट-वन   
मानव दोषी   
मगर है कहता -   
प्रकृति अपराधी।   

4.   
दोषारोपण   
जग की यही रीत   
कोई न जाने प्रीत   
प्रकृति तन्हा   
किस-किस से लड़े   
कैसे ज़खम सिले।   

5.   
नदियाँ प्यासी   
दुनिया ने छीनी है   
उसका मीठा पानी,   
करो विचार   
प्रकृति है लाचार   
कैसे बुझाए प्यास।   

6.   
बाँझ निगोड़ी   
कुम्हलाई धरती   
नि:संतान मरती   
सूखा व बाढ़   
प्रकृति का प्रकोप   
धरा बेचारी।   

7.   
सब रोएँगे   
साँसें जब घुटेंगी   
प्रकृति भी रोएगी,   
वक्त है अभी   
प्रकृति को बचा लो   
दुनिया को बसा लो।   

8.   
विषैले नाग   
ये कल कारखाना   
ज़हर उगलते   
साँसें उखड़ी   
ज़हर पी-पी कर   
प्रकृति है मरती।   

9.   
लहूलुहान   
खेत व खलिहान   
माँगता बलिदान   
रक्त पिपासु   
खुद मानव बना   
धरा का खून पिया।   

10.   
प्यासी नदियाँ   
प्यासी तड़पे धरा   
प्रकृति भी है प्यासी,   
छाई उदासी,   
अभिमानी मानव   
विध्वंस को आतूर।   

- जेन्नी शबनम (23. 5. 2018)

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रविवार, 22 जुलाई 2018

579. तपता ये जीवन (10 ताँका)

तपता ये जीवन 

***   

1.   
अँजुरी भर   
सुख की छाँव मिली   
वह भी छूटी   
बच गया है अब   
तपता ये जीवन।   

2.   
किसे पुकारूँ   
सुनसान जीवन   
फैला सन्नाटा,   
आवाज़ घुट गई   
मन की मौत हुई।   

3.   
घरौंदा बसा   
एक-एक तिनका   
मुश्किल जुड़ा,   
हर रिश्ता विफल   
ये मन असफल।   

4.   
क्यों नहीं बनी   
किस्मत की लकीरें   
मन है रोता,   
पग-पग पे काँटे   
आजीवन चुभते।   

5.   
सावन आया   
पतझर-सा मन   
नहीं हर्षाया,   
जीवन होता, काश!    
गुलमोहर-गाछ।   

6.   
नहीं विवाद   
मालूम है, जीवन   
क्षणभंगुर   
कैसे न दिखे स्वप्न   
मन नहीं विपन्न।   

7.   
हवा के संग   
उड़ता ही रहता   
मन-तितली   
मुर्झाए सभी फूल   
कहीं मिला न ठौर।   

8.   
तड़प रहा   
प्रेम की चाहत में   
मीन-सा मन,   
प्रेम लुप्त हुआ, ज्यों   
अमावस का चाँद।   

9.   
जो न मिलता   
सिरफिरा ये मन   
वही चाहता   
हाथ पैर मारता   
अंतत: हार जाता।   

10.   
स्वप्न-संसार   
मन पहरेदार   
टोकता रहा,   
जीवन से खेलता 
दिमाग अलबेला।   

-जेन्नी शबनम (25.5.2018) 
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बुधवार, 18 जुलाई 2018

578. उनकी निशानी (पुस्तक - 49)

उनकी निशानी  

*******  

आज भी रखी हैं, बहुत सहेजकर  
अतीत की कुछ यादें  
कुछ निशानियाँ  
कुछ सामान  
टेबल, कुर्सी, पलंग, बक्सा  
फ़ुल पैंट, बुशर्ट और घड़ी  
टीन की पेटी   
एक पुराना बैग, जिसमें कई जगह मरम्मत है  
और एक डायरी, जिसमें काफ़ी कुछ है  
हस्तलिखित, जिसे लिखते हुए  
उन्होंने सोचा भी न होगा कि  
यह निशानी बन जाएगी  
हमलोगों के लिए बच जाएगा  
बहुत कुछ थोड़ा-थोड़ा  
जिसमें पिता हैं पूरे के पूरे  
और हमारी यादों में आधे-अधूरे  
कुछ चिट्ठियाँ भी हैं  
जिनमें रिश्तों की लड़ी है  
जीवन-मृत्यु की छटपटाहट है  
संवेदनशीलता है, रूदन है, क्रंदन है  
जीवन का बंधन है  
उस काले बैग में  
उनके सुनहरे सपने हैं  
उनके मिज़ाज हैं  
उनकी बुद्धिमता है  
उनके बोए हुए फूल हैं  
जो अब बोन्जाई बन गए  
सब स्थिर है, कोई कोहराम नहीं  
बहुत कुछ अनकहा है  
जिसे अब हमने पूरा-पूरा जाना है  
उनकी निशानियों में  
उनको तलाशते-तलाशते  
अब समझ आया  
मैं ही उनकी यादें हूँ  
मैं ही उनके सपने हूँ  
मेरा पूरा-का-पूरा वजूद  
उनकी ही तो निशानी है  
मैं उनकी निशानी हूँ।  

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2018)  
(पापा की 40 वीं पुण्यतिथि पर)
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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

577. रंगरेज हमारा (चोका - 2)

रंगरेज हमारा   

*******   

सुहानी संध्या   
डूबने को सूरज   
देखो नभ को 
नारंगी रंग फैला   
मानो सूरज   
एक बड़ा संतरा   
साँझ की वेला   
दीया-बाती जलाओ   
गोधूली-वेला 
देवता को जगाओ,   
ऋचा सुनाओ,   
अपनी संस्कृति को   
मत बिसराओ,   
शाम होते ही जब   
लौटते घर   
विचरते परिंदे   
गलियाँ सूनी   
जगमग रोशनी   
वो देखो चन्दा   
हौले-हौले मुस्काए   
साँझ ढले तो   
सूरज सोने जाए   
तारे चमके   
टिम-टिम झलके   
काली स्याही से   
गगन रंग देता   
बड़ा सयाना   
रंगरेज हमारा   
सबका प्यारा   
अनोखी ये दुनिया   
किसने रची!   
हर्षित हुआ मन   
घर-आँगन   
देख सुन्दर रूप   
चकित निहारते !   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2012)

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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

576. भाव और भाषा (चोका - 4)

भाव और भाषा   

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भाषा-भाव का   
आपसी नाता ऐसे   
शरीर-आत्मा   
पूरक होते जैसे,   
भाषा व भाव   
ज्यों धरती-गगन   
चाँद-चाँदनी   
सूरज की किरणें   
फूल-खूशबू   
दीया और बाती   
तन व आत्मा   
एक दूजे के बिना   
सब अधूरे,   
भाव का ज्ञान   
भाव की अभिव्यक्ति   
दूरी मिटाता   
निकटता बढ़ाता,   
भाव के बिना   
सम्बन्ध हैं अधूरे   
बोझिल रिश्ते   
सदा कसक देते   
फिर भी जीते   
शब्द होते पत्थर   
लगती चोट   
घुटते ही रहते,   
भाषा के भाव   
हृदय का स्पंदन   
होते हैं प्राण   
बिन भाषा भी जीता   
मधुर रिश्ता   
हों भावप्रवण तो   
बिन कहे ही   
सब कह सकता   
गुन सकता,   
भाव-भाषा संग जो   
प्रेम पगता   
हृदय भी जुड़ता   
गरिमा पाता   
नज़दीकी बढ़ती   
अनकहा भी   
मन समझ जाता   
रिश्ता अटूट होता !  

- जेन्नी शबनम ( अक्टूबर 18, 2012)

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