शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

294. बाध्यता नहीं (क्षणिका)

बाध्यता नहीं

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ये मेरी चाह थी कि तुम्हें चाहूँ और तुम मुझे
पर ये सिर्फ़ मेरी चाह थी
तुम्हारी बाध्यता नहीं। 

- जेन्नी शबनम (9. 10. 2011)
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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

293. ज़िन्दगी (तुकांत)

ज़िन्दगी

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ज़िन्दगी तेरी सोहबत में, जीने को मन करता है 
चलते हैं कहीं दूर कि, दुनिया से डर लगता है। 

हर शाम जब अँधेरे, छीनते हैं मेरा सुकून
तेरे साथ ऐ ज़िन्दगी, मर जाने को जी करता है। 

अब के जो मिलना, संग कुछ दूर चलना
ढलती उमर में, तन्हाई से डर लगता है। 

आस टूटी नहीं, तुझसे शिकवा भी है
ग़र तू साथ नहीं, फिर भ्रम क्यों देता है। 

'शब' कहती थी कल, ऐ ज़िन्दगी तुझसे
छोड़ते नहीं हाथ, जब कोई पकड़ता है। 

ऐ ज़िन्दगी, अब यहीं ठहर जा
तुझ संग जीने को, मन करता है। 

- जेन्नी शबनम (16. 10. 2011)
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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

292. क़र्ज़ अदायगी

क़र्ज़ अदायगी

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तुमने कभी स्पष्ट कहा नहीं
शायद संकोच हो
या फिर सवालों से घिर जाने का भय
जो मेरी बेदख़ली पर तुमसे किए जाएँगे
जो इतनी नज़दीक वो ग़ैर कैसे?
पर हर बार तुम्हारी बेरुखी
इशारा करती है कि
ख़ुद अपनी राह बदल लूँ
तुम्हारे लिए मुश्किल न बनूँ
अगर कभी मिलूँ भी तो उस दोस्त की तरह
जिससे महज़ फ़र्ज़ अदायगी-सा वास्ता हो
या कोई ऐसी परिचित
जिससे सिर्फ़ दुआ सलाम का नाता हो। 
जानती हूँ
दूर जाना ही होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदायगी है
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं!

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2011)
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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

291. मुक्ति पा सकूँ

मुक्ति पा सकूँ

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मस्तिष्क के जिस हिस्से में विचार पनपते हैं
जी चाहता है, उसे काटकर फेंक दूँ
न कोई भाव जन्म लेंगे, न कोई सृजन होगा। 

कभी-कभी अपने ही सृजन से भय होता है
जो रच जाते हैं, वे जीवन में उतर जाते हैं
जो जीवन में उतर गए, वे रचना में सँवर जाते हैं। 

कई बार पीड़ा लिख देती हूँ और त्रासदी जी लेती हूँ
कई बार अपनी व्यथा, जो जीवन का हिस्सा है
पन्नों पर उतार देती हूँ। 

विचार का पैदा होना, बाधित करना होगा अविलम्ब
ताकि वर्तमान और भविष्य के विचार और जीवन से 
मुक्ति पा सकूँ। 

-जेन्नी शबनम (11.10.2011)
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सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

290. तब हुआ अबेर (क्षणिका)

तब हुआ अबेर

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जब मिला बेर, तब हुआ अबेर
मचा कोलाहल, चित्र दिया उकेर
छटपटाया मन, शब्द दिया बिखेर
बिछा सन्नाटा, अब जगा अँधेर
'शब' सो गई, तब हुआ सबेर। 

- जेन्नी शबनम (1. 10. 2011)
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

289. मेरी हथेली

मेरी हथेली

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अपनी एक हथेली तुम्हें सौंप आई
जब तुमसे मिली थी 
जिसकी लकीरों में है मेरी तक़दीर 
और मेरी तक़दीर सँवारने की तजवीज़।   
एक हथेली अपने पास रख ली 
जो वक़्त के हाथों ज़ख़्मी है 
जिसकी लकीरों में है मेरा अतीत 
और मेरे भविष्य की उलझी तस्वीर।   
विस्मृत नहीं करना चाहती कुछ भी 
जो मैंने पाया या खोया 
या फिर मेरी वो हथेली 
जो तुमने किसी दिन गुम कर दी
क्योंकि सहेजने की आदत तुम्हें नहीं। 

- जेन्नी शबनम (4. 10. 2011)
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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

288. भस्म होती हूँ (क्षणिका)

भस्म होती हूँ

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अक्सर सोचकर हत्प्रभ हो जाती हूँ
चूड़ियों की खनक हाथों से निकल चेहरे तक
कैसे पहुँच जाती है?
झुलसता मन अपना रंग झाड़कर
कैसे दमकने लगता है?
शायद वक़्त का हाथ मेरे बदन में घुसकर
मुझसे बग़ावत करता है
मैं अनचाहे हँसती हूँ चहकती हूँ
फिर तड़पकर अपने जिस्म से लिपट
अपनी ही आग में भस्म होती हूँ। 

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2011)
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मंगलवार, 27 सितंबर 2011

287. अपशगुन

अपशगुन

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उस दिन तुम जा रहे थे
कई बार आवाज़ दी
कि तुम मुड़ो और
मैं हाथ हिलाकर तुम्हें विदा करूँ,
लौटने पर तुम कितना नाराज़ हुए
जाते हुए को आवाज़ नहीं देते
अपशगुन होता है
कितना भी ज़रूरी हो न पुकारा करूँ तुम्हें। 
देखो न
सच में अपशगुन हो गया
पर तुम्हारे लिए नहीं मेरे लिए,
सोचती हूँ
मेरे लिए अपशगुन क्यों हुआ?
तुमने तो कभी भी आवाज़ नहीं दी मुझे। 
तुम उस दिन आए थे
अंतिम बार मिलने
अलविदा कहने के बाद मुड़े नहीं
ज़रा देर को भी रुके नहीं
जैसे हमेशा जाते हो चले गए
जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 
मैं जानती थी कि
तुम्हारे पास मेरे लिए कोई जगह नहीं
फिर भी एक कोशिश थी
कि शायद...
जानती थी कि ये मुमकिन नहीं
फिर भी...
तुम मेरी ज़िन्दगी से जा रहे थे
कहीं और ज़िन्दगी बसाने,
मन किया कि तुमको आवाज़ दूँ
तुम रूक जाओ
शायद वापस आ जाओ,
पर आवाज़ नहीं दे सकती थी
तुम्हारा अपशगुन हो जाता। 

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2011)
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शनिवार, 24 सितंबर 2011

286. ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं (तुकांत)

ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं

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चलते-चलते मैं चलती रही, ज़िन्दगी कभी ठहरी नहीं
ख़ुद को जब रोक के देखा, ज़िन्दगी तो बढ़ी ही नहीं। 

क़िस्मत को कैसा रोग लगा, ज़िन्दगी कभी हँसती नहीं
वक़्त ने कैसा ज़ख़्म दिया, ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं। 

कई भ्रम पाले जीने के वास्ते, ज़िन्दगी भ्रम से गुज़रती नहीं
रोज़-रोज़ तड़पती है, ज़िन्दगी चाहती मगर मरती नहीं। 

थक-थक गई चल-चलकर, ज़िन्दगी चलती पर बढ़ती नहीं
दम टूट-टूट जाता है मगर, ज़िन्दगी हारती पर मरती नहीं। 

क्यों न करूँ सवाल तुझसे ख़ुदा, ज़िन्दगी क्या सिर्फ़ मेरी नहीं?
'शब' मग़रूर बेवफ़ा ही सही, ज़िन्दगी क्या सिर्फ़ उसकी नहीं?

- जेन्नी शबनम (23. 9. 2011)
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बुधवार, 21 सितंबर 2011

285. मैं तेरी सूरजमुखी

मैं तेरी सूरजमुखी

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ओ मेरे सूरज
मैं तेरी सूरजमुखी (सूर्यमुखी)
बाट जोहते-जोहते मुर्झाने लगी
कई दिनों से तू आया नहीं
जाने कौन-सी राह पकड़ ली तूने
कौन ले गया तुझे?
क्या ये भी बिसर गया
कि सारा दिन तुझे ही तो निहारती हूँ
जीवन ऐसे ही तेरे संग बिताती हूँ
तुम चाहो न चाहो
तेरे बिना रह नहीं सकती
चाहूँ फिर भी तुम बिन खिल नहीं सकती
जानती हूँ तुम्हारा साथ बस दिन भर का है
फिर तू अपनी राह मैं अपनी राह
अगली सुबह फिर तेरी राह
लड़ लिया करो न, बादलों से मेरे लिए
ओ मेरे सूरज
मैं तेरी सूरजमुखी!  

- जेन्नी शबनम (17. 9. 2011)
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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

284. चाँद-सितारे / chaand-sitaare

चाँद-सितारे

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बचपन में जब चाँद-सितारों के लिए मचलती थी
अम्मा फ़्राक में ज़री-गोटे से, चाँद-तारे टाँक देती थी
बाबा चाँद-सी गोल चौअन्नी, बड़े लाड़ से देते थे
मैं चाँद-सितारे पा लेने के भ्रम में, ख़ूब इतराती थी।

अम्मा-बाबा चुपके से, एक-एक चौअन्नी का हिसाब लगाते थे
दो चौअन्नी में कितने दिन, चाँद-सी रोटी पक सकती थी
दो वक़्त की भूख भूल जाते, जब लाड़ली उनकी इठलाती थी
एक चौअन्नी का ज़री-गोटा, एक चौअन्नी गुल्लक में भरती थी।

अब भैया ने, चाँद-सितारों वाला घर, ढूँढ दिया
चाँद-सितारों की खनक में, खिल जाएगी बहना
अम्मा-बाबा हार गए, दे न पाए, नकली वाला चाँद-सितारा
भैया ने ढूँढ दिया, जहाँ चंदा-सी चमकेगी बहना।

आज देखो, अब भी रेखाएँ नहीं बनीं, मेरी ख़ाली हथेली पर
रोज़-रोज़ देख तरसती हूँ, पा लूँ चाँद-तारे अपनी हथेली पर
तुम्हारा वादा था, भर दोगे दामन मेरा, चाँद-सितारों से
सात फ़ेरों सात वचनों बाद, मुझसे पहली बार आलिंगन पर।

अम्मा-बाबा, चौअन्नी और ज़री-गोटे से, मुझे भ्रम देते थे
भैया तुम्हारे घर की झिलमिल रौशनी से, भ्रम देता रहता
तुमने चाँद-सितारों की जगह, उपकृत कर मुझे ही जड़ दिया
अपने घर के झूमर में, बेमियाद चमकाऊँ, तुम्हारा घर-अँगना।

कब तक मन को तसल्ली दूँ, हुई बेनूर, चाँद-सितारों का भ्रम पालूँ
उन बेजान फ़्राक में टँके, ज़री-गोटे की तरह
कब तक झिलमिल चमकती रहूँ, पथराई आँखें, घर गुलज़ार करूँ
तुम्हारे घर में सजे, झाड़-फ़ानूस की तरह।

बोलो, कब ला दोगे मुझे ज़मीन पर, अब इस भ्रम से मन नहीं बहलता
क्या भर दोगे मेरी अँजुरी में, कुछ चाँद-सितारों-सा पल तुम्हारा
बोलो, लौटा दोगे वो वक़्त, जब निढ़ाल ताकती रही, असली वाला चाँद-सितारा
क्या भर दोगे हथेली की लकीरों में, तक़दीर का सच्चा चाँद-सितारा।

आसमान के चाँद-सितारे, अब कब माँगती हूँ तुमसे
बस चाँद-सितारों-सा कुछ पल, माँगती हूँ तुमसे
भर दो दामन में मेरे, अपने कुछ चाँद-सितारे
बस कुछ पल तुम्हारे हैं, मेरे अपने चाँद-सितारे।

- जेन्नी शबनम (नवम्बर, 2008)
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chaand-sitaare

bachpan mein jab chaand-sitaaron ke liye machaltee thee
amma frock mein zari-gote se, chaand-taare taank detee thee
baaba chaand see gol chauanni, bade laad se dete they
main chaand-sitaare paa lene ke bhrum mein, khub itraatee thee.

amma baba chupke se, ek-ek chauanni ka hisaab lagaate they
do chauanni mein kitne din, chaand see roti pak saktee thee
do waqt kee bhookh bhool jate, jab laadli unki ithlaatee thee
ek chauanni ka zari-gota, ek chauanni gullak mein bhartee thee.

ab bhaiya ne, chaand-sitaaron wala ghar, dhundh diya
chaand-sitaaron kee khanak mein, khil jaayegi bahna
amaa baba haar gaye, de na paaye, nakli wala chaand-sitaara
bhaiya ne dhundh diya, jahaan chanda see chamkegi bahna.

aaj dekho, ab bhi rekhaayen nahin bani, meri khaali hatheli par
roz-roz dekh tarasti hun, paa lun chaand-taaren apni hatheli par
tumhara wada thaa, bhar doge daaman mera, chaand-sitaaron se
saat feron saat wachanon baad, mujhse pahli baar aalingan par.

amma baba, chauanni aur zari-gote se, mujhe bhrum dete they
bhaiya, tumhare ghar kee jhilmilati raushni se, bhrum deta rahta
tumne, chaand-sitaaron kee jagah, upakrit kar mujhko hi jad diya
apne ghar ke jhumar mein, bemiyaad chamkaaun, tumhaara ghar-angna.

kab tak man ko tasalli doon, hui benoor, chaand-sitaaron ka bhrum paaloon
un bejaan frock mein tanke, zari-gote kee tarah
kab tak jhilmil chamakti rahun, pathraai aahkhen, ghar gulzaar karoon
tumhaare ghar mein saje, jhaad-fanoos kee tarah.

bolo, kab laa doge mujhe zameen par, ab is bhrum se man nahi bahalta
kya bhar doge meri anjuri mein, kuchh chaand-sitaaron-sa pal tumhaara
bolo, lauta doge wo waqt, jab nidhaal taakti rahee, asli wala chaand-sitaara
kya bhar doge hatheli kee lakiron mein, takdir ka sachcha chaand-sitaara.

aasmaan ka chaand-sitaara, ab kab maangti hun tumse
bas chaand-sitaaron-sa kuchh pal, maangti hun tumse
bhar do daaman mein mere, apna kuchh chaand-sitaara
bas kuchh pal tumhara hai, mera apnaa chaand-sitaara.

- Jenny Shabnam (November, 2008)
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मंगलवार, 13 सितंबर 2011

283. अभिवादन की औपचारिकता

अभिवादन की औपचारिकता

***

अभिवादन में पूछते हैं आप
कैसी हो? क्या हाल है? सब ठीक है ?
करती हूँ मैं अविलम्ब 
निःसंवेदित, रटा-रटाया, उल्लासित अभिनन्दन 
अच्छी हूँ! सब कुशल मंगल है! आप कैसे हैं?

क्या सचमुच कोई जानने को उत्सुक है, किसी का हाल?
क्या सचमुच हम बता सकते 
किसी को अपना हाल?
ये प्रचलित औपचारिकता के शब्द हैं 
नहीं चाहता सुनना, कोई किसी का हाल
फिर भी पूछ्तें हैं, मैं भी पूछती हूँ 
मन में समझते हुए दूसरे का हाल। 

क्या सुनना चाहेंगे मेरा हाल
क्या दूसरों की पीड़ा जानना चाहेंगे
क्या सुन सकेंगे मेरा सच?
मेरा कुण्ठित अतीत और व्याकुल वर्तमान 
मेरा सम्पूर्ण हाल, जो शायद आपका भी हो थोड़ा सच। 

मैं तो जुटा न पाई हूँ, आप भी कहाँ कर पाए हैं 
अनौपचारिक बनकर सच बताने की हिम्मत
आज बता ही देती हूँ अपनी सारी सच्चाई 
कर ही देती हूँ हमारे बीच की औपचारिकता का अन्त। 

बताऊँ कैसे मेरा वह दर्द, वह अवसाद, वह दंश 
जो पल-पल मेरे मन को खण्डित करता है
बताऊँ कैसे मेरा वह सच 
जो मेरे अन्तर्मन की जागीर है 
मन के तहख़ाने में दफ़्न है
जानती हूँ, मेरा सच सुनकर आप रूखी हँसी हँस देंगे 
हमारे बीच के रहस्यमय आवरण हट जाएँगे
आप भूले से भी हाल पूछेंगे 
अच्छा ही होगा अब आप कभी 
मुझसे औपचारिकता नहीं निभाएँगे। 

कैसे बताऊँ कि मेरे मन में कितनी टीस है 
शरीर में कितनी पीर है
उम्र और वक़्त का हर एक ज़ख़्म, मुझसे मुझको छीनता है
अपनों की ख़्वाहिशों को पालने में 
ख़ुद को हर पल कितना मारना होता है
एक विफलता सम्बन्धों की 
एक लाचारगी जीने की, मन कितना तड़पता है। 

कैसे बताऊँ, तमाम कोशिशों के बावजूद 
समाज की कसौटी पर खरी नहीं उतरी हूँ
घर के बिखराव को बचाने में 
क्षण-क्षण कितना ढहती, बिखरती हूँ
वक़्त की कमी या फ़ुर्सत की कमी 
एक बहाना-सा बनाकर सबसे छिपती हूँ
त्रासदी-सा जीवन-सफ़र मेरा 
पर घर का सम्मान, सदा उल्लासित दिखती हूँ। 

कैसे बताऊँ, क्यों सम्बन्धों की भीड़ में 
एक अपना तलाशती हूँ
क्यों दुनिया की रंगीनियों में खोकर भी रंगहीन हूँ
क्यों छप्पन व्यंजनो के सामार्थ्य के बाद भी 
भूखी-प्यासी हूँ
क्यों जीवन से पलायान को सदैव तत्पर रहती हूँ।  

नहीं! नहीं! नहीं बता पाऊँगी सम्पूर्ण सत्य 
मंज़ूर है मुखौटा ओढ़ना
हमारी रीति-संस्कृति ने सिखाया है 
कटु सत्य नहीं बोलना
हमारी तहज़ीब है 
आँसुओं को छुपाकर दूसरों के सामने मुस्कुराना
यों भी सलीक़ा अच्छा नहीं होता, अपना भेद खोलना। 

अभिवादन की औपचारिकता है, किसी का हाल पूछना
जज़्बात की बात नहीं, महज़ चलन है ये पूछना
जान-पहचान की चिर-स्थायी है ये परम्परा 
औपचारिकता ही सही, बस यों ही हाल पूछते रहना। 

- जेन्नी शबनम (मई, 2009)
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सोमवार, 12 सितंबर 2011

282. लौट चलते हैं अपने गाँव

लौट चलते हैं अपने गाँव

***

मन उचट गया है शहर के सूनेपन से
अब डर लगने लगा है
भीड़ की बस्ती में अपने ठहरेपन से। 
 
चलो लौट चलते हैं अपने गाँव
अपने घर चलते हैं 
जहाँ अजोर होने से पहले
पहरू के जगाते ही हर घर उठ जाता है 
चटाई बीनती हुक्का गुड़गुड़ाती
बुढ़िया दादी धूप सेंकती है
गाँती बाँधे नन्हकी स्लेट पर पेन्सिल घिसती है। 

अजोर हुए अब तो देर हुई
बड़का बऊआ अपना बोरा-बस्ता लेकर
स्कूल न जाने की ज़िद में खड़ा है
गाँव के मास्टर साहब
आज ले ही जाने को अड़े हैं
क्या ग़ज़ब नज़ारा है, बड़ा अजब माजरा है। 

अँगने में रोज़ अनाज पसराता है
जाँता में रोज़ दाल दराता है
गेहूँ पीसने की अब बारी है
भोर होते ही रोटी भी तो पकानी है
सामने दौनी-ओसौनी जारी है
ढेंकी से धान कूटने की आवाज़ लयबद्ध आती है। 
  
खेत से अभी-अभी तोड़ी
घिउरा और उसके फूल की तरकारी
ज़माना बीता, पर स्वाद आज भी वही है
दोपहर में जन सब के साथ पनपियाई
अलुआ, नमक और अचार का स्वाद
मन में आज भी ताज़ा है। 
 
पगहा छुड़ाते धीरे-धीरे चलते बैलों की टोली
खेत जोतने की तैयारी है  
भैंसी पर नन्हका लोटता है
जब दोपहर बाद घर लौटता है। 
  
गोड़ में माटी की गंध
घूर तापते चचा की कहानी
सपनों सी रातें अब मुझे बुलाती हैं   
चलो लौट चलते हैं अपने गाँव
अपने घर चलते हैं 
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अजोर - रोशनी
पहरू - रात्रि में पहरेदारी करने वाला
चटाई बीनती - चटाई बुनना
गाँती - ठण्ड से बचाव के लिए बच्चों को विशेष तरीक़े से चादर / शॉल से लपेटना
बोरा-बस्ता - बैठने के लिए बोरा और किताब का झोला
जाँता - पत्थर से बना हाथ से चलाकर अनाज पीसने का यंत्र
दराता - दरना
दौनी - धान को निकालने के लिए फ़सल एकत्रित कर उस पर बैल चलाया जाता है
ओसौनी - दौनी होने के बाद धान को अलग करने की क्रिया
ढेंकी - लकड़ी से बना यंत्र जिसे पैर द्वारा चलाया जाता है 
घिउरा - नेनुआ
जन - काम करने वाले मज़दूर / किसान
पनपियाई - दोपहर से पहले का खाना
अलुआ - शकरकंद
गोड़ - पैर
घूर - अलाव
चचा - चाचा
_________

- जेन्नी शबनम (जुलाई 2003)
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बुधवार, 7 सितंबर 2011

281. अनुबन्ध

अनुबन्ध

***

एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच
कभी साथ-साथ घटित न होना
एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच
कभी साथ-साथ फलित न होना 
एक अनुबन्ध है स्वप्न और यथार्थ के बीच
कभी सम्पूर्ण सत्य न होना 
एक अनुबन्ध है धरा और गगन के बीच
कभी किसी बिन्दु पर साथ न होना 
एक अनुबन्ध है आकांक्षा और जीवन के बीच
कभी सम्पूर्ण प्राप्य न होना 
एक अनुबन्ध है मेरे मैं और मेरे बीच
कभी एकात्म न होना।

- जेन्नी शबनम (27.1.2009)
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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

280. जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ

जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ

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मन में कुछ दरक-सा जाता है
जब क्षितिज पर अस्त होता सूरज देखती हूँ
ज़िन्दगी बार-बार डराती है
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ। 

सपने ध्वस्त हो रहे हैं 
हवा मेरी सारी निशानियाँ मिटा रही है
वुजूद घुटता-सा है
ज़ेहन में मवाद की तरह यादें रिसती हैं
अपेक्षाओं की मुराद दम तोड़ती है
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ। 

सहेजे सपनों की विफलता का मलाल
धराशायी अरमान
मन की विक्षिप्तता
असह्य हो रहा अब ये संताप
मन डर जाता है जीवन के इस रीत से
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ। 

हूँ अब ख़ामोश
मूक-बधिर
निहार रही अपने जीवन का
अरूप अवशेष। 

- जेन्नी शबनम (11. 9. 2008)
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शनिवार, 3 सितंबर 2011

279. दर्द की मियाद और कितनी है (क्षणिका)

दर्द की मियाद और कितनी है

*******

कोई भी दर्द उम्र से पहले ख़त्म नहीं होता
किससे पूछूँ कि
दर्द की मियाद और कितनी है। 

- जेन्नी शबनम (2. 9. 2011)
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शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

278. फ़िज़ूल हैं अब (क्षणिका)

फ़िज़ूल हैं अब

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फ़िज़ूल हैं अब
इसलिए नहीं कि सब जान लिया
इसलिए कि जीवन बेमक़सद लगता है
जैसे चलती हुई साँसें या फिर बहती हुई हवा
रात की तन्हाई या फिर दिन का उजाला
दरकार नहीं, पर ये रहते हैं अनवरत मेरे साथ चलते हैं
मैं और ये सब, फ़िज़ूल हैं अब। 

- जेन्नी शबनम (28. 8. 2011)
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सोमवार, 29 अगस्त 2011

277. शेष न हो (क्षणिका)

शेष न हो

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सवाल भी ख़त्म और जवाब भी
शायद ऐसे ही ख़त्म होते हैं रिश्ते
जब सामने कोई हो
और कहने को कुछ भी शेष न हो। 

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2011)
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रविवार, 28 अगस्त 2011

276. इन्द्रधनुष खिला (बरसात पर 10 हाइकु) (पुस्तक - 19)

इन्द्रधनुष खिला 
(बरसात पर 10 हाइकु)

******* 

1.
आकाश दिखा
इन्द्रधनुष खिला
मचले जिया।

2.
हुलसे जिया
घिर आए बदरा
जल्दी बरसे।

3.
धरती गीली
चहुँ ओर है पानी
हिम पिघला।

4.
भीगा अनाज
कुलबुलाए पेट
छत टपकी।

5.
बिजली कौंधी
कहीं जब है गिरी
खेत झुलसे।

6.
धरती ओढ़े
बादलों की छतरी
सूरज छुपा।

7.
मेघ गरजा
रिमझिम बरसा
मन हरसा।

8.
कारे बदरा
टिप-टिप बरसे
मन हरसे।

9.
इन्द्र देवता
हुए धरा से रुष्ट
लोग पुकारें।

10.
ठिठके खेत
कर जोड़ पुकारे
बरसो मेघ।

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2011)
_____________________

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

275. राखी के धागे (राखी पर 11 हाइकु) (पुस्तक - 18)

राखी के धागे
(राखी पर 11 हाइकु)

*******

1.   
राखी का पर्व   
पूर्णमासी का दिन   
सावन माह   

2.   
राखी-त्योहार   
सब हों ख़ुशहाल   
भाई-बहन   

3.   
बहना आई   
राखी लेकर प्यारी   
भाई को बाँधी   

4.   
रक्षा बंधन   
प्यार का है बंधन   
पवित्र धागा   

5.   
रक्षा का वादा   
है भाई का वचन   
बहन ख़ुश   

6.   
भैया विदेश   
राखी किसको बाँधे   
राह निहारे  

7.   
राह अगोरे   
भइया नहीं आए   
राखी का दिन   

8.   
सजेगी राखी   
भैया की कलाई पे   
रंग-बिरंगी   

9.   
राखी की धूम   
दिखे जो चहुँ ओर   
मनवा झूमे   

10.   
रक्षा-बंधन   
याद रखना भैया   
प्यारी बहना   

11.   
अटूट रिश्ता   
जोड़े भाई-बहन   
रक्षा बंधन   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2011)   
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सोमवार, 22 अगस्त 2011

274. दुनिया बहुत रुलाती है (क्षणिका)

दुनिया बहुत रुलाती है

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प्रेम की चाहत कभी कम नहीं होती
ज़िन्दगी बस दुनियादारी में कटती है
कमबख़्त ये दुनिया बहुत रुलाती है। 

- जेन्नी शबनम (21. 8. 2011 )
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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

273. फिर से मात (तुकांत)

फिर से मात

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बेअख़्तियार-सी हैं करवटें, बहुत भारी है आज की रात
कह दिया यूँ तल्ख़ी से उसने, तन्हाई है ज़िन्दगी की बात। 

साथ रहने की वो गुज़ारिश, बन चली आँखों में बरसात
ख़त्म होने को है ज़िन्दगानी, पर ख़त्म नहीं होते जज़्बात।  

सपने पलते रहे आसमान के, छूटी ज़मीन बने ऐसे हालात
वक़्त से करते रहे थे शिकवा, वक़्त ही था बैठा लगाए घात। 

शिद्दत से जिसे चाहा था कभी, मिले हैं ऐसे कुछ लम्हे सौग़ात
अभी जाओ ओ समंदर के थपेड़ों, आना कभी फिर होगी मुलाक़ात। 

दोराहे पर है ठिठकी ज़िन्दगी, क़दम-क़दम पर खड़ा आघात
देखो सब हँस पड़े क़िस्मत पर, 'शब' ने खाई है फिर से मात। 

- जेन्नी शबनम (11. 8. 2011 )
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सोमवार, 15 अगस्त 2011

272. राम नाम सत्य है

राम नाम सत्य है

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कोई तो पुकार सुनो
कोई तो साहस करो
चीख नहीं निकलती
पर दम निकल रहा है उनका

वे अपने दर्द में ऐसे टूटे हैं
कि ज़ख़्म दिखाने से भी कतराते हैं
उनकी सिसकी मुँह तक नहीं आती
गले में ही अटक जाती है
करुणा नहीं चाहते
मेहनत से जीने का अधिकार चाहते हैं
जो उन्हें मिलता नहीं
और छीन लेने का साहस नहीं
क्योंकि बहुत तोड़ा गया वर्षों-वर्ष उनको
दम टूट जाए, पर ज़ुबान चुप रहे
इसी कोशिश में रोज़-रोज़ मरते हैं

चिथड़ों में लिपटे बच्चों की ज़ुबान भी चुप हो गई है
रोने के लिए पेट में अनाज तो हो
देह में जान तो हो
लहलहाती फ़सलें, प्रकृति लील गई
देह की ताक़त, ख़ाली पेट की मजूरी तोड़ गई।   

हाथ अकेला, भँवर बड़ा
उफ़! इससे तो अच्छा है जीवन का अन्त 
एक साथ सब बोलो-
''राम नाम सत्य है!''

- जेन्नी शबनम (15.8.2011)
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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

271. अलविदा कहती हूँ

अलविदा कहती हूँ

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ख़्वाहिशें ऐसे ही दम तोड़ेंगी
जानते हुए भी नए-नए ख़्वाब देखती हूँ
दामन से छूटते जाते  
जाने कितने पल
फिर भी वक़्त को समेटती हूँ
शमा फिर भी जलेगी
रातें फिर भी होंगी
साथ तुम्हारे बस एक रात आख़िरी चाहती हूँ
चाहकर टूटना या टूटकर चाहना
दोनों हाल में 
मैं ही तो हारती हूँ
दूरियाँ और भी बढ़ जाती है
मैं जब-जब पास आती हूँ
पास आऊँ या दूर जाऊँ
सिर्फ़ मैं ही 
मात खाती हूँ
न आए कोई आँच तुम पर
तुमसे दूर चली जाती हूँ
एक वचन देती हूँ प्रिय
ख़ुद से नाता तोड़ती हूँ
'शब' की हँसी गूँज रही
महफ़िल में सन्नाटा है
रूख़सत होने की बारी है
अब मैं
अलविदा कहती हूँ

- जेन्नी शबनम (अगस्त 10, 2011)
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रविवार, 7 अगस्त 2011

270. तुम मेरे दोस्त जो हो

तुम मेरे दोस्त जो हो

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मेरे लिए एक काम कर दोगे
''ज़हर ला दोगे
बहुत थक गई हूँ
ज़िन्दगी से ऊब गई हूँ'',
जानती हूँ, तुम ऐसा नहीं करोगे
कभी ज़हर नहीं ला दोगे
मेरी मृत्यु सह नहीं सकते
फिर भी कह बैठती हूँ तुमसे 
तुम भी जानते हो
मुझमें मरने का साहस नहीं
न जीने की चाहत बची है
पर हर बार जब-जब हारती हूँ
तुमसे ऐसा ही कहती हूँ
तुम्हारे काँधे पे मेरा माथा
सहारा और भरोसा तुम ही तो देते हो
मेरे हर सवाल का जवाब भी
तुम ही देते हो
बिना रोके बिना टोके
शायद तुम ही हो
जो मेरे गुस्से को सह लेते हो
मेरे आँसुओं को बदल देते हो
कई बार सोचती हूँ
तुम्हारी ग़लती नहीं
दुनिया से नाराज़ हूँ
फिर क्यों ख़फ़ा होती हूँ तुम पर
क्यों खीझ निकालती हूँ तुम पर
तुम चुपचाप सब सुनते हो
मुझे राहत देते हो 
कई बार मन होता है
तुमसे अपना नाता तोड़ लूँ
अपने ज़ख़्म ख़ुद में समेट रखूँ
पर न जाने क्यों
किस्त-किस्त में सब कह जाती हूँ तुमसे 
शायद यह भी कोई नाता है
जन्म का तो नहीं पर जन्मों का रिश्ता है
इसलिए बेख़ौफ़
कभी ज़हर माँगती 
कभी नज़र माँगती
कभी रूठ जाती हूँ
महज़ इस बात के लिए कि
मेरे लिए मृत्यु क्यों नहीं ख़रीद लाये
तुम बहुत कंजूस हो
जानती हूँ
तुम मेरे दोस्त जो हो
मेरे लिए मौत नहीं
सदैव ज़िन्दगी लाते हो

- जेन्नी शबनम (7. 8. 2011)
(मित्रता दिवस पर)
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शनिवार, 6 अगस्त 2011

269. उन्हीं दिनों की तरह (पुस्तक - 37)

उन्हीं दिनों की तरह

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चौंककर उसने कहा-
''जाओ लौट जाओ 
क्यों आई हो यहाँ
क्या सिर्फ़ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
मैं अवाक्! निरुत्तर!
फिर भी कह उठी-
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी
गवाह तो थे न तुम
जीवन की दशा और दिशा को, तुमने ही तो बदला था
सब जानते तो थे तुम, तब भी और अब भी
सच है, तुम भी बदल गए हो
वो न रहे, जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं
एक भूलभुलैया या फिर अपरिचित-सी फ़िज़ा
जाने क्यों लग रही है मुझे?
तुम न समझो पर अपना-सा लग रहा है मुझे
थोड़ा-थोड़ा ही सही
आस है, शायद तुम वापस अपना लो मुझे
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे
और तुमने बेझिझक, सहारा दिया था मुझे
यह जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ
और हमेशा रहूँगी
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थी
और मैं बेफ़िक्र, ज़िन्दगी के नये रूप देख रही थी
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी
सब कुछ बदल गया है, वक़्त के साथ
जानती हूँ
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ!
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ
फ़र्क़ सिर्फ वज़ह का है
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ!
तनिक सुकून दे दो, फिर लौट जाना है मुझे
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी, तुमसे दूर
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी
अब तक जीवित हूँ!
मत कहो-
''जाओ लौट जाओ'',
एक बार कह दो-
''शब, तुम वही हो, मैं भी वही
फिर आना, कुछ वक़्त निकालकर
एक बार साथ-साथ जिएँगे
फिर से, उन्हीं दिनों की तरह
कुछ पल!''

- जेन्नी शबनम (17. 7. 2011)
(20 साल बाद शान्तिनिकेतन आने पर)
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बुधवार, 3 अगस्त 2011

268. कह न पाऊँगी कभी

कह न पाऊँगी कभी

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अपने जीवन का सत्य
कह न पाऊँगी किसी से कभी
अपने पराए का भेद समझती हूँ
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी किसी से कभी

न जाने कब कौन अपना बनकर
जाल बिछा रहा हो
किसी तरह फँसकर
उसके जलसे का
मैं बस हिस्सा रह जाऊँ 

बहुत घुटन होती है
जब-जब भरोसा टूटता है
किसी अपने के सीने से
लिपट जाने का मन करता है 

समय-चक्र और नियति
कहाँ कौन जान पाया है?
किसी पराए की प्रीत
शायद प्राण दे जाए
जीवन का कारण बन जाए
पर पराए का अपनापन
कैसे किसी को समझाएँ?

अपनों का छल
बड़ा घाव देता है
पराए से अपना कोई नहीं 
मन जानता है
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी किसी से कभी। 

- जेन्नी शबनम (19. 7. 2011)
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सोमवार, 1 अगस्त 2011

267. कुछ तो था मेरा अपना

कुछ तो था मेरा अपना

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जी चाहता है
सब कुछ छोड़कर
लौट जाऊँ, अपने उसी अँधेरे कोने में
जहाँ कभी किसी दिन
दुबकी हुई, मैं मिली थी तुम्हें
और तुम खींच लाए थे उजाले में
चहकने के लिए
। 

खिली-खिली मैं
जाने कैसे सब भूल गई
वो सब यादें विस्मृत कर दी
जो टीस देती थी मुझे
और मैं तुम्हारे साथ
सतरंगी सपने देखने लगी थी
जानते हुए कि
बीते हुए कल के अँधेरे साथ नहीं छोड़ेंगे
और एक दिन तुम भी छोड़ जाओगे
मैंने एक भ्रम लपेट लिया था कि
सब कुछ अच्छा है
जो बीता वो कल था
आज का सपना सब सच्चा है

अब तो जो शेष है
बस मेरे साथ
मेरा ही अवशेष है
जी चाहता है
लौट जाऊँ अपने उसी अँधेरे कोने में
अपने सच के साथ
जहाँ कुछ तो था
मेरा अपना...!

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2011)
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बुधवार, 20 जुलाई 2011

266. एक चूक मेरी

एक चूक मेरी

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रास्ते पर चलते हुए मैं उससे टकरा गई
उसके हाथ में पड़े सभी फ़लसफ़े गिर पड़े
जो मेरे लिए ही थे
सभी टूट गए और मैं देखती रही।   

उसने कहा 
ज़रा-सी चूक
तमाम जीवन की सज़ा बन गई तुम्हारी
तुम जानती हो कि उचित क्या है
क्योंकि तुमने देखे हैं उचित फ़लसफ़े
जो जन्म के साथ तुम्हें मिलने थे
जिनके साथ तुम्हें जीना था। 

अडिग रहने का साहस, अब तुममें न होगा
जाओ और जियो, उन सभी की तरह
जो किसी फ़लसफ़ा के बिना जीते और मर जाते हैं
बस एक फ़र्क़ होगा 
तुम्हें पता है कि तुम्हारे लिए सही क्या है
यह जानते हुए भी तुम्हें बेबस जीना होगा
अपनी आत्मा को मारना होगा।  

मेरे पास मेरे तर्क थे
कि यह अनजाने में हुआ
एक मौका और...!
इतने न सही, थोड़े से...!

पर उसने कहा 
यह सबक़ है, इस जीवन के लिए
ज़रा-सी चूक
और सब ऐसे ही ख़त्म हो जाता है
कोई मौक़ा दुबारा नहीं मिलता है।  

आज तक मैं जी रही
मेरे फ़लसफ़ों के टूटे टुकड़ों में
अपनी ज़िन्दगी को बिखरते देख रही
रोज़-रोज़ मेरी आत्मा मर रही। 
  
वह वापस कभी नहीं आया
न दुबारा मिला
एक चूक मेरी और...!

- जेन्नी शबनम (20.7.2011)
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

265. मैं भी इंसान हूँ (पुस्तक - 30)

मैं भी इंसान हूँ

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मैं, एक शब्द नही, एहसास हूँ, अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की, मैं भी जीवित इंसान हूँ। 
दर्द में आँसू निकलते हैं, काटो तो रक्त बहता है
ठोकर लगे तो पीड़ा होती है, दग़ा मिले तो दिल तड़पता है। 
कुछ बंधन बन गए, कुछ चारदीवारी बन गई
पर ख़ुद में, मैं अब भी जी रही। 
कई चेहरे ओढ़ लिए, कुछ दुनिया पहन ली
पर कुछ बचपन ले, मैं आज भी जी रही। 
मेरे सपने, आज भी मचलते हैं
मेरे जज़्बात, मुझसे अब रिहाई माँगते हैं। 
कब, कहाँ, कैसे-से कुछ प्रश्न
यूँ ही पनपते हैं, और ये प्रश्न
मेरी ज़िन्दगी उलझाते हैं। 
हाँ, मैं सिर्फ़ एक शब्द नहीं
साँसे भरती हाड़-मांस की
मैं भी जीवित इंसान हूँ।   

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2009)
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रविवार, 10 जुलाई 2011

264. आत्मकथा

आत्मकथा

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एक सदी तक चहकती फिरी
घर आँगन गलियों में
थी कथा परियों की
और जीवन फुदकती गौरैया-सी।   

दूसरी सदी में आ बसी
हर कोने चौखट चौबारे में
कण-कण में बिछती रही
बगिया में ख़ुशबू-सी।    

तीसरी सदी तक आ पहुँची
घर की गौरैया अब उड़ जाएगी
घर आँगन होगा सूना
याद बहुत आएगी
कोई गौरैया है आने को
अपनी दूसरी सदी में जीने को
कण-कण में समाएगी
घर आँगन वो खिलाएगी।  

ख़ुद को अब समेट रही
बिखरे निशाँ पोंछ रही
यादों में कुछ दिन जीना है
चौथी सदी बिताना है
फिर तस्वीर में सिमट जाना है।   

जाने कैसी ये आत्मकथा
मेरी उसकी सबकी
एक जैसी है
खिलना बिछना सिमटना
ख़त्म होती यूँ
गौरैया की कहानी है।   

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2011)
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