शुक्रवार, 22 मई 2020

665. स्वाद / बेस्वाद (10 क्षणिका)

स्वाद / बेस्वाद

******* 

1. 
इश्क़ का स्वाद 
***
तेरे इश्क़ का स्वाद   
मीठे पानी के झरने-सा   
प्यास से तड़पते राही को   
इक घूँट भर भी मिल जाए   
पीर-पैगंबर की दुआ   
क़ुबूल हो जाए।   

2. 
तेरा स्वाद
***
एक घूँट इश्क़    
और तेरा स्वाद   
अस्थि-मज्जा में जा घुला   
जिसके बिना   
जीवन नामुमकिन।   

3. 
स्वाद चख लिया 
***
उस रोज़ नथुनों में समा गई   
रजनीगंधा की ख़ुशबू   
जो तेरे बदन को छूती हुई   
मुझसे आकर लिपट गई थी   
और मेरी साँसों में तू ठहर गया था   
रजनीगंधा की ख़ुशबू अब भी आती है   
और मुझे छूकर गुज़र जाती है   
पर कोई और ख़ुशबू अब मुझे भाती नहीं   
तेरा स्वाद मेरे मन ने   
एक बार चख जो लिया है।   

4. 
मर्ज़ी का स्वाद 
***
तेरी बातें तेरी मर्ज़ी    
तेरी दीद तेरी मनमर्ज़ी   
तेरी मर्जी तेरी मनमर्ज़ी    
इसमें कहाँ मेरी मर्ज़ी    
तेरी मर्ज़ी का स्वाद बड़ा ही तीखा   
भा गई मुझको तेरी मर्ज़ी    
अब तेरी मर्ज़ी मेरी मर्ज़ी।   

5. 
जीवन का स्वाद 
***
जीवन का स्वाद   
मैंने घूँट-घूँट पीकर लिया   
एक घूँट तेरे वास्ते बचाकर रखा है   
गर मिलो कभी तुम   
वह घूँट तुम पी लेना   
मेरी ज़िन्दगी की कड़वाहट   
तुम भी जी लेना।   

6. 
स्वाद भरी ज़िन्दगी 
***
कुछ खट्टी कुछ मीठी   
स्वाद से भरी मेरी ज़िन्दगी   
थोड़ी नरम थोड़ी गरम   
गुलगुले-सी मेरी ज़िन्दगी   
आओ थोड़ा तुम भी चख लो   
एक और स्वाद का मजा ले लो।   

7.
बेस्वाद इश्क़ 
*** 
तेरा स्वाद बदन में घुल गया था   
जब इश्क़ का जाम पिया मैंने   
अब सब बेस्वाद हो गया है   
जब से तेरा इश्क़    
कहीं और आबाद हुआ है।   

8. 
स्वाद बह जाए 
***
झामे से खुरच-खुरचकर   
पूरे बदन को छील दिया है   
कि रिसते लहू के साथ   
तेरे इश्क़ का स्वाद बह जाए।   

9.
कसैला स्वाद 
*** 
तेरे इश्क़ का स्वाद   
कितना कसैला है   
जब-जब तेरी याद आई   
उबकाई-सी आती है।   

10. 
ज़िन्दगी का कसैला स्वाद 
***
कैसी कसक थी   
झिझक में जीती रही   
कहने की बेताबी   
मगर कभी कह न सकी   
दर्दे ए एहसास नहीं रेशमी   
मेरे अल्फ़ाज़ हो गए काग़ज़ी   
जाने किस चूल्हे पर पकी क़िस्मत   
जो ज़िन्दगी का स्वाद कसैला हुआ।   

- जेन्नी शबनम (22. 5. 2020) 
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बुधवार, 20 मई 2020

664. कहासुनी जारी है

कहासुनी जारी है

*** 

पल-पल समय के साथ कहासुनी जारी है   
वो कहता रहता है, मैं सुनती रहती हूँ,   
अरेब-फ़रेब, जो उसका मन बोलता रहता है   
कान में पिघलता सीसा, उड़ेलता रहता है   
मैं हुँकारी भरती रहती हूँ, मुस्कुराती रहती हूँ   
अपना अपनापा दिखाती रहती हूँ। 
  
नहीं याद क्या-क्या सुनती रहती हूँ   
नहीं याद क्या-क्या बिसराती जाती हूँ   
जितना मेरा मन किया, उतना ही सुनती हूँ   
बहुत कुछ अनसुना करती हूँ।
   
न उसे पता कि मैंने क्या-क्या न सुना   
न मुझे पता कि उसने 
मुझे कितना-कितना धिक्कारा   
कितना-कितना दुत्कारा। 
  
फिर भी सब कहते हैं   
हमारे बीच बड़ा प्यारा सम्बन्ध है   
न हम लड़ते-झगड़ते दिखते हैं   
न कभी कहासुनी होती है   
बहुत प्यार से हम जीते हैं। 
  
यह हर कोई जानता है   
कहासुनी में दोनों को बोलना पड़ता है   
अपना-अपना कहना होता है   
दूसरों का सुनना होता है।
   
पर समय और मेरे बीच अजब-सा नाता है   
वह कहता जाता है, मै सुनती जाती हूँ   
कहासुनी जारी रहती है   
कहासुनी जारी है।

 -जेन्नी शबनम (20.5.2020) 
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शुक्रवार, 15 मई 2020

663. लॉकडाउन

लॉकडाउन

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लॉकडाउन से जब शहर हुए हैं वीरान   
बढ़ चुकी है मन के लॉकडाउन की भी मियाद   
अनजाने भय से मन वैसे ही भयभीत रहता है 
जैसे आज महामारी से पूरी दुनिया डरी हुई है   
मन को हज़ारों सवाल बेहिसाब तंग करते हैं   
जैसे टी. वी. पर चीखते ख़बरनवीसों के कुतर्क असहनीय लगते हैं   
कितना कुछ बदल दिया इस नन्हे-से विषाणु ने   
मानव को उसकी औक़ात बता दी, इस अनजान शत्रु ने,   
आज ताक़त के भूखे नरभक्षी, अपने बनाए गढ्ढे में दफ़न हो रहे हैं   
भात-छत के मसले, वोटों की गिनती में जुट रहे हैं   
सैकड़ों कोस चल-चलकर, कोई बेदम हो टूट रहा है   
बदहवास लोगों के ज़ख़्मों पर, कोई अपनी रोटी सेंक रहा है   
पेट-पाँव झुलस रहे हैं, आत्माएँ सड़कों पर बिलख रही हैं   
रूह कँपाती ख़बरें हैं, पर अधिपतियों को व्याकुल नहीं कर रही हैं   
अफ़वाहों के शोर में, घर-घर पक रहे हैं तोहमतों के पकवान   
दिल दिमाग दोनों त्रस्त हैं, चारों तरफ है त्राहि-त्राहि कोहराम,   
मन की धारणाएँ लगातार चहलक़दमी कर रही हैं   
मंदिर-मस्जिद के देवता लम्बी छुट्टी पर विश्राम कर रहे हैं   
इस लॉकडाउन में मन को सुकून देती पक्षियों की चहचहाहट है   
जो सदियों से दब गई थी मानव की चिल्ला-चिल्ली में   
खुला-खुला आसमान, खिली-खिली धरती है   
सन्न-सन्न दौड़ती हवा की लहरें हैं   
आकाश को पी-पीकर ये नदियाँ नीली हो गई हैं   
संवेदनाएँ चौक-चौराहों पर भूखे का पेट भर रही हैं   
ढेरों ख़ुदा आसमान से धरती पर उतर आए हैं अस्पतालों में   
ख़ाकी अपने स्वभाव के विपरीत मानवीय हो रही है   
सालों से बंद घर फिर से चहक रहा है   
अपनी-अपनी माटी का नशा नसों में बहक रहा है,   
बहुत कुछ भला-भला-सा है, फिर भी मन बुझा-बुझा-सा है   
आँखें सब देख रहीं हैं, पर मन अपनी ही परछाइयों से घबरा रहा है   
आसमाँ में कहकशाँ हँस रही है, पर मन है कि अँधेरों से निकलता नहीं   
जाने यह उदासियों का मौसम कभी जाएगा कि नहीं,   
तय है, शहर का लॉकडाउन टूटेगा   
साथ ही लौटेंगी बेकाबू भीड़, बदहवास चीखें   
लौटेगा प्रदूषण, आसमान फिर ओझल होगा   
फिर से क़ैद होंगी पशु-पक्षियों की जमातें,   
हाँ, लॉकडाउन तो टूटेगा, पर अब नहीं लौटेगी पुरानी बहार   
नहीं लौटेंगे वे जिन्होंने खो दिया अपना संसार   
सन्नाटों के शहर में अब सब कुछ बदल जाएगा   
शहर का सारा तिलिस्म मिट जाएगा   
जीने का हर तरीक़ा बदल जाएगा   
रिश्ते, नाते, प्रेम, मोहब्बत का सलीका बदल जाएगा,   
यह लॉकडाउन बहुत-बहुत बुरा है   
पर थोड़ा-थोड़ा अच्छा है   
यह भाग-दौड़ से कुछ दिन आराम दे रहा है   
चिन्ताओं को ज़रा-सा विश्राम दे रहा है,   
यह समय कुदरत के स्कूल का एक पाठ्यक्रम है   
जीवन और संवेदनाओं को समझने का पाठ पढ़ा रहा है!   

- जेन्नी शबनम (15. 5. 2020) 
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बुधवार, 13 मई 2020

662. अलविदा

अलविदा  

***

तपती रेत पर पाँव के नहीं   
जलते पाँव के ज़ख़्मों के निशान हैं   
मंज़िल दूर, बहुत दूर दिख रही है  
पाँव थक चुके हैं 
पाँव और मन जल चुके हैं  
हौसला देने वाला कोई नहीं  
साँसें सँभालने वाला कोई नहीं।
   
यह तय है 
ज़िन्दगी वहाँ तक नहीं पहुँच पाएगी   
जहाँ पाँव-पाँव चले थे 
जहाँ सपनों को पंख लगे थे  
जहाँ से ज़िन्दगी को सींचने 
बहुत दूर निकल पड़े थे। 
  
आह! अब और सहन नहीं होता  
तलवे ही नहीं, आँतें भी जल गई हैं  
जल की एक बूँद भी नहीं  
जिससे अन्तिम क्षण में तालू तर हो सके  
उम्मीद की अन्तिम तीली बुझने को है  
आख़िरी साँस अब उखड़ने को है। 
  
सलाम उन सबको   
जिनके पाँव ने उनका साथ दिया 
मेरे उन सपनों, उन अपनों 
उन यादों को अलविदा।   

-जेन्नी शबनम (12.5.2020) 
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शुक्रवार, 8 मई 2020

661. अनुभूतियों का सफ़र

अनुभूतियों का सफ़र 

*** 

अनुभूतियों के सफ़र में   
सम्भावनाओं को ज़मीन न मिली  
हताश हूँ, परेशान हूँ, मगर हार की स्वीकृति 
मन को नहीं सुहाती।   

फिर-फिर उगने और उड़ने के लिए   
पुरज़ोर कोशिश करती हूँ    
कड़वे-कसैले से कुछ अल्फ़ाज़, मन को बेधते हैं   
फिर-फिर जीने की तमन्ना में   
हौसलों की बाग़वानी करती हूँ। 
 
सँभलने और स्थिरता की मियाद   
पूरी नहीं होती कि सब ध्वस्त हो जाता है
जाने कौन-सा गुनाह था या किसी जन्म का शाप   
अनुभूतियों के सफ़र में महज़ कुछ फूल मिले   
शेष काँटे ही काँटे   
जो वक़्त-बेवक्त चुभते रहे, मन को बेधते रहे।
   
पर अब सम्भावनाओं को जिलाना होगा   
उसे ज़मीन में उगाना होगा   
थके हों क़दम, मगर चलना होगा   
आसमान छिन जाए, मगर   
ज़मीन को पकड़ना होगा। 
  
जीवन की अनुभूतियाँ सम्बल हैं और   
जीवन की सम्भावना भी।


-जेन्नी शबनम (7.5.2020) 
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मंगलवार, 5 मई 2020

660. सरेआम मिलना (तुकांत)

सरेआम मिलना 

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अकेले मिलना अब हो नहीं सकता  
जब भी मिलना है सरेआम मिलना   

मेरे रंजों ग़म उन्हें भाते नहीं
फिर क्या मिलना और क्योंकर मिलना   

नहीं होती है रुतबे से यारी
इनसे दूरी भली फ़िजूल मिलना   

कब मिटते हैं नाते उम्र भर के
कभी आना अगर तो जीभर मिलना।   

काश! ऐसा मिलना कभी हो जाए
ख़ुद से मिलना और ख़ुदा से मिलना।   

ऐसा मिलना कभी तो हम सीखेंगे  
रूह से मिलना और दिल से मिलना   

ऐसा हुनर अब भी नहीं हम सीख पाए  
जो चुभाए नश्तर उससे अदब से मिलना   

रोज़ गुम होते रहे भीड़ में हम  
आसान नहीं होता ख़ुद से मिलना।   

ज़ीस्त की यादें अब सोने नहीं देती  
यूँ जाग-जागकर किससे मिलना?   

सच्ची बातें हैं चुभती बर्छी-सी  
'शब' तुम चुप रहना किसी से न मिलना।  

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2020) 
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शुक्रवार, 1 मई 2020

659. गँवारू लड़की

गँवारू लड़की

***   

एक गाँव की लड़की   
शहर में पनाह ढूँढती रही   
अपना नाम बताकर अपना पता पूछती रही   
अपने हिस्से के कुछ क़िस्से लेकर   
सबके मन के द्वार खटखटाती थी   
थोड़ा अपनापन माँगती थी 
मुट्ठी भर ज़मीन चाहती थी। 
  
कभी किसी ने उसकी परवाह न की   
पर अब वह ख़ुद भी बेपरवाह हो चुकी है   
न घर मिला, न मन मिला, न मान मिला   
न ठौर, न ठिकाना मिला   
सबने कहा, वह गँवारू है, किसी काम की नहीं   
न शहर के लायक़, न किसी घर के लायक़   
पर अब वह उदास नहीं रहती 
अब उसकी चुप्पी टूट चुकी है   
वह पलायन न करेगी, ढीठ होकर बढ़ेगी। 
   
वह देसी बोली बोलती है 
उसे गर्व है अपनी बोली पर   
वह गाँव की गँवार है 
उसे गर्व है, अपने गँवारूपन पर   
कम-से-कम उसने सोंधी मिट्टी को तो चूमा है   
अपनी बोली में सपनों को पाला है   
शहर आकर भी, जो गाँव से लाई थी 
सब सँभाला है   
पेड़-पौधों को दुलराया है   
वह हाथ से खाती है, तो अन्न को पहचानती है   
धड़कनों से बात करती है, तो मन को पहचानती है   
खेतों-डरेरों पर कूदती-फाँदती 
पशु-पक्षियों से यारी निभाई है   
वह सारे रिश्ते जीकर शहर आई है। 
   
हाँ! वह शहरी नहीं, शहर के लिए पराई है   
पर वो बहुत प्यारे गाँव से आई है   
शायद इसलिए वह अबतक कंक्रीट पहन नहीं पाई   
मोम को ओढ़कर बैठी है, पत्थर बन नहीं पाई   
इस जंगल में खो नहीं पाई   
अच्छा है, शहर की हो नहीं पाई   
वह गाँव की लड़की गँवारू है   
मगर अब शहर की नब्ज़ और शहरियों का शातिरपना 
पहचान गई है   
ख़ुद को समझने लगी है
शहर को जान गई है।   

-जेन्नी शबनम (1.5.2020)
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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

658. निपटाया जाएगा (तुकांत)

निपटाया जाएगा  

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विरोध के स्वर को कुछ यूँ दबाया जाएगा  
होश में जो हो उसे पागल बताया जाएगा।    

काट छाँटकर बाँट-बाँटकर यह संसार चलेगा  
रोटी और बेटी का मसला यूँ निपटाया जाएगा।    

क्रूरता और पाश्विकता कई खेमों में बँटे  
चौक चौराहों पर टँगा जिस्म दिखाया जाएगा।    

हदों की परवाह किसे बेहद से हम सब गुज़रे  
मुट्ठियों का इंक्लाब अब बेदम कराया जाएगा।    

नहीं परवाह सबको ज़माने के बदख्याली की  
नफ़रतों में अमन का पौधा खिलाया जाएगा।    

बाट जोहकर समय जब हथेलियों से फिसल जाएगा  
बद्दुआएँ 'शब' को देकर फिर ख़ूब पछताया जाएगा।   

- जेन्नी शबनम (27. 4. 2020) 
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रविवार, 26 अप्रैल 2020

657. झरोखा

झरोखा

*** 

समय का यह दौर   
जीवन की अहमियत 
जीवन की ज़रूरत सिखा रहा है। 
   
मुश्किल के इस रंगमहल में   
आशाओं का एक झरोखा 
जिसे पत्थर का महल बनाने में   
सदियों पहले बन्द किया था    
अब खोलने का वक़्त आ गया है   
ताकि एक बार फिर लौट सके 
सपनों का सुन्दर संसार   
सूरज की किरणों की बौछार   
बारिश की बूँदों की फुहार   
हो सके चाँदनी की आवाजाही   
आ सके हवा झूमती, नाचती, गाती। 
  
हम ताक सकें आसमान में चाँद-तारों की बैठक   
आकृतियाँ गढ़ती बादलों की जमात   
पक्षियों का कलरव   
रास्ते से गुज़रता इन्सानी रेला   
ज़रूरतों के सामानों का ठेला। 
  
हम सुन सकें हवाओं का नशीला राग   
बादलों की गड़गड़ाहट   
धूल-मिट्टी की थाप   
प्रार्थना की गुहार   
पड़ोसी की पुकार   
रँभाते मवेशियों की तान   
गोधूलि में पशुओं के खुरों और घंटियों की धुन   
हम मिला सकें कोयल के साथ कूउउ-कूउउ   
हम चिढ़ा सकें कौओं को काँव-काँव,   
हम कर सकें कोई ऐसी चित्रकारी   
जिसमें खूबसूरत नीला आसमान 
गेरुआ रंग धारण कर लेता है। 
   
पौधों की हरियाली में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं   
मानो बच्चा लाड़-दुलार से माँ की गोद में जा सिमटता है   
हम बसा सकें सपनों के बड़े-बड़े चौबारे पर   
कोई अचम्भित करने वाली कामनाएँ। 
  
ओह! कितना कुछ था, जिसे खोया है हमने   
मन के झरोखों को बन्दकर   
कृत्रिमता से लिपटकर   
पत्थर के आशियाने में सिमटकर
अब समझ आ गया है   
जीवन की क्षणभंगुरता और क़ायनात की शिक्षा। 
   
खोल दो सबको   
आने दो झरोखे से वह सब   
जिसे हमने ख़ुद ही गँवाया था  
खोल दो झरोखा।   

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2020) 
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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

656. सच (9 क्षणिका)

1. 
सच  
***  

न कोई कल था  
न कोई आज है  
जो पाया, सब खोया  
जीवन का यही सच है।  
__________________

2. 
संवेदना  
***  

संवेदनाओं को  
ज़मीन नहीं मिलती  
आकाश चाहिए नहीं  
फिर क्या?  
यूँ ही घुट-घुटकर मर जाए !  
जल सूखता जाता है, नदी उतरती है  
संवेदनशून्यता यूँ ही तो बढ़ती है।  
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3. 
काश!  
***  

ढेरों काश इकठ्ठा हो गए हैं  
पर मन है कि ठहरता नहीं  
काश! यह किया होता, काश! वह कर पाते  
इकत्रित काश के साथ, भविष्य के और काश न जुड़े  
मन को समझना होगा  
मन को रुकना होगा या मरना होगा  
या फिर सन्यस्त होना होगा।  
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4. 
नींद  
***  

दिल को जलाया है  
दिल मेरा ख़ाली है  
कोई नहीं जो सुकून दे  
मेरी तल्खियों को नींद दे  
आ जाओ ऐ फरिश्ते  
दिल में एक ख़्वाब उगा दो  
रूह को ज़रा-सा चैन दे दो  
आज बस सुला दो।  
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5. 
करवट  
***  

यादों के बिस्तर पर करवट ही करवट है  
हर करवट में टूटते दिल की सलवट है  
सलवटें तो मिट जाएँगी  
करवटें नींद में समा जाएगी  
पर यादें?  
कितने फूल कितने शूल  
हँसता दिल ज़ख़्मी सीना  
क्या ये यादों से दूर जा पाएँगे?  
______________________

6. 
शर्त  
***  

बेशर्त ज़िन्दगी चलती नहीं  
शर्तें मन को फबती नहीं  
इसी उधेड़बुन में ठहरी रही  
करूँ तो अब मैं क्या करूँ  
शर्तें मानूँ या ज़िन्दगी मिटा लूँ  
अपनी बचाऊँ कि साँसें सँभालूँ।  
_______________________

7. 
भूल जाते हैं  
***  

चलो आज सारी रात जागते हैं  
आधा आसमान तुम्हारा आधा मेरा  
तुम तारे गिनो  
हम आधे आसमान में चाँद को सजाते हैं  
दिन भी निकलेगा भूल जाते हैं।  
________________________

8. 
मुबारक़  
***  

अँधेरों का सैलाब बढ़ता जा रहा है  
रोशनी का एक तिनका भी नहीं, सब डूब रहा है  
हाथ थामने को कुछ नहीं सूझ रहा है  
सूरज ने अँधेरों को थामने से मना कर दिया है  
वह रोशनी भेजने को तैयार नहीं है  
मेरे लिए कुछ भी न इस पार न उस पार है  
उसने कहा- तुम्हें अँधेरे पसंद थे न  
लो, तुम्हें अँधेरे मुबारक़।  
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9. 
मेरा घर  
*******  

रात के सीने में  
हज़ारों चमकते कोने हैं  
पर वहाँ एक महफूज़ कोना भी है  
जहाँ सबका प्रवेश वर्जित है  
वहाँ अँधेरा ही अँधेरा है  
बस वहीं, घर मेरा है।  
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- जेन्नी शबनम (20. 4. 2020)  
______________________  
 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

655. फूल यूँ खिले (10 हाइकु) पुस्तक 116,117

फूल यूँ खिले 

*******  

1.  
फूल यूँ खिले,  
गलबहियाँ डाले  
बैठे हों बच्चे।    

2.  
अम्बर रोया,  
ज्यों बच्चे से छिना  
प्यारा खिलौना।    

3.  
सूरज ने की  
किरणों की बिदाई  
शाम जो आई।    

4.  
फसलें हँसी,  
ज्यों धरा ने पहना   
ढेरों गहना।    

5.  
नाम तुम्हारा  
मन की रेत पर  
गहरा लिखा।    

6.  
देख गगन  
चिहुँकती है धरा  
हो कोई सगा।    

7.  
रूठा है सूर्य  
कैकेयी-सा, जा बैठा  
कोप-भवन।    

8.  
मन झरना  
कल-कल बहता  
पाके अपना।    

9.  
मिश्री-सी बोली  
बहुत ही मँहगी,  
ताले में बंद।    

10.  
चुभता रहा  
खुरदरा-सा रिश्ता  
फिर भी जिया।    

- जेन्नी शबनम (27. 1. 2020)  
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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

654. समय चक्र (10 क्षणिका)

क्षणिकाएँ 

*******  

1. 
समय चक्र  
***  
समय चक्र और जीवन चक्र  
दोनों घूम रहे हैं  
उन्हें रोकने की कोशिशों में  
मेरे दोनों हाथ छिल चुके हैं  
मैं उन्हें न रोक पाई न साथ चल पाई  
सदा नाकाम रही  
उसी तरह जिस तरह  
ख़ुद को अपने साथ रखने में नाकाम होती हूँ  
मुझे नहीं पता कि मैं कहाँ होती हूँ।
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2.
परत
***  
मेरे मौसम में अब कोई नहीं  
न मेरे मिज़ाज में कोई शामिल है  
मेरे मन पर जो एक नरम परत लिपटा था  
समय की ताप से पककर  
वह अब लोहे का हो गया है।  
____________________  

3..
यारी
***  
फूल तो सबको प्रिय, मैंने काँटों से यारी की  
इस यारी में लाचारी थी, मेरी नहीं मनमानी थी  
नसीब का लेखा-जोखा है, सब कुदरत का धोखा है  
यह क़िस्मत की साज़िश है, नहीं कोई गुंजाइश है  
काँटों की कलम से चाक-चाक, सीना मेरा छलनी है  
दर्द भले पुराना है, लेकिन नयी-नयी मेरी कहानी है।  
____________________________________  

4.  
ज़ख़्म   
***  
काँटों ने चुभाकर, जब भी ज़ख़्म दिए  
एक संतोष-सा मन में ठहर गया  
काँटों ने ज़ख़्म दिए हैं, तन छलनी हुआ तो क्या हुआ  
गर फूलों ने ज़ख़्म दिया होता, तो मन छलनी होता  
घाव तो भर जाएँगे  
मन तो साबुत रहेगा।
__________________________

5.  
पुल  
***  
ढेरों इल्ज़ामों की तरह एक और  
ढेरों कटु वचनों की तरह एक और  
फ़र्क नहीं पड़ता अब दुर्भावनाओं से  
न ही असर होता है, इल्ज़ामों की इन गिनतियों से  
वह जो एक पुल था, हमारे दरम्यान  
उसे वक़्त ने ढहा दिया है।  
___________________________  

6.  
चेहरा  
***  
चेहरे तो कई ओढ़े कई उतारे  
कब कौन पहना अब याद नहीं  
सबसे सच्चा वाला चेहरा  
जो गुम हो चुका है, इन चेहरों की भीड़ में  
अब कभी नहीं पहन पाऊँगी  
पर एक टीस तो उठेगी  
जब-जब आईना निहारूँगी।  
_____________________

7.  
बेजान सड़क  
***  
बेजान सड़क में जैसे जान आ जाती है
मेरे पाँव में पहिया पहना देती है
फिर मुझे पहुँचा आती है वहाँ-वहाँ
जहाँ भीड़ में मैं अक्सर गुम हो जाती हूँ
फिर कोई अनजाना हाथ मुझे थाम लेता है
मगर कुछ क़दम के फ़ासले पर चलता है
सड़क को सब पता है
कहाँ मेरा सुकून है, कहाँ मेरी मंज़िल
और कहाँ थामने वाले हाथ।  
___________________________

8.  
तस्वीर  
***  
काश कि अतीत विस्मृत हो जाए  
ज़ेहन में तस्वीर कुछ ताज़ी आ जाए  
दर्द की ढेरों तहरीर और रिसते ज़ख़्मों के धब्बे हैं  
रिश्तों की ग़ुलामी और अनजीए पहलू की सरगोशी है  
सब बिसराकर नई तस्वीर बसाना चाहती हूँ  
कुछ नए फूल खिलाना चाहती हूँ  
एक नई ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ।  
_________________________________  

9.  
जुर्रत  
***  
लुंज-पुंज से वक़्त में, ज़िन्दगी की अफरा-तफरी में
इश्क़ करने की मोहलत मिल गई
समय संजीदा हुआ 
पूछा- ऐसी जुर्रत क्यों की?
अब इसका क्या जवाब
जुर्रत तो हो गई
अब हो गई तो हो गई।  
_________________________  

10.
दवा-दुआ  
***  
उम्र के इस दौर में, तन्हाइयों के इस ठौर में  
न दवा काम आती है न दुआ काम आती है  
बस किसी अपने की यादें साथ रह जाती हैं  
यूँ सच है खोखले रिश्तों के बेजान शहर में  
कौन किसके वास्ते दुआ करे, करे तो क्यों करे  
कोई किसी को अपना मान ले  
आख़िरी पलों में बस इतना ही काफ़ी है।  
____________________________  

- जेन्नी शबनम (8. 4. 2020)  
____________________

रविवार, 5 अप्रैल 2020

653. मन का दीया (दीया पर 5 हाइकु) पुस्तक 116

मन का दीया  

*******

1.  
आस्था का दीया  
बुझने मत देना  
ख़ुद के प्रति  

2. 
देता सन्देश  
जल-जल के दीया-  
रोशनी देना  

3.  
मन का दीया  
जल ही नहीं पाता  
किसी आग से  

4.  
नन्हा दीपक  
बिन थके जलता  
हिम्मत देता  

5.  
दीपक जला  
मन खिलखिलाया  
उजास फैला  

- जेन्नी शबनम (5. 4. 2020)
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शनिवार, 4 अप्रैल 2020

652. शाम (क्षणिका)

शाम  

*******    

ऐसी शाम जब थका हारा जीवन अपने अंत पर हो  
एक बड़ा चमत्कार हो जाए  
ढलता सूरज सब जान जाए  
भेज दे अपने रथ से थोड़ा सुकून और हर ले उदासी  
भले ही शाम हो पर जीवन की सुबह बन जाए  
शाम से रात तक जीवन को अर्थ मिल जाए  
काश! ऐसी कोई शाम हो- ढलता सूरज देवता बन जाए।

- जेन्नी शबनम (4. 4. 2020)  
__________________

गुरुवार, 26 मार्च 2020

651. एकान्त

एकान्त    

***

अपने आलीशान एकान्त में   
सिर्फ़ अपने साथ रहने का मन है   
जिन बातों को जिलाया मन में   
स्वयं को वह सब कहने का मन है   
सवालों के वृक्ष, जो वटवृक्ष बन गए   
उन्हें ज़मींदोज़ कर देने का मन है।   

मेरे हिस्से में आई है नफ़रत-ही-नफ़रत   
उसे दूर किसी गहरी झील में डूबो देने का मन है   
तोहमतों की फ़ेहरिस्त, जो मेरे माथे पे चस्पा है   
उन सभी को जगज़ाहिर कर देने का मन है   
मीलों लम्बा रेगिस्तान, जिसे मैंने ही चुना है   
अब वहाँ फूलों की क्यारी लगाने का मन है।   

जीवन के सारे अवलम्ब, अब काँटें चुभाते हैं   
सब छोड़कर अपने मौन को जीने का मन है   
ज़ीस्त के बियाबान रास्तों की कसक, कम नहीं होती   
उन सारे रास्तों से मुँह मोड़ लेने का मन है   
पसरी हुई चुप्पी बहुत आवाज़ देती है जब-तब   
सारे बन्धन तोड़, ख़ुद के साथ ज़ब्त हो जाने का मन है।   

जीवन के सारे संतुलन ख़ार हैं बस   
अब और संताप नहीं लेने का मन है   
ज़हर की मीठी ख़ुशबू न्योता देने आती है   
सारे विष पीकर नीलकण्ठ बन जाने का मन है   
अनायास तो कभी कुछ होता नहीं 
पर सायास कुछ भी नहीं करने का मन है
   
अपने आलीशान एकान्त में   
सिर्फ़ अपने साथ रहने का मन है।    

-जेन्नी शबनम (26.3.2020)   
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शुक्रवार, 20 मार्च 2020

650. गौरैया (गौरैया पर 15 हाइकु) पुस्तक- 114-116

गौरैया  
(गौरैया पर 15 हाइकु)

*******

1.  
ओ री गौरैया,  
तुम फिर से आना  
मेरे अँगना।  

2.  
मेरी गौरैया  
चीं चीं-चीं चीं बोल री,  
मन है सूना।  

3.  
घर है सूना,  
मेरी गौरैया रानी  
तू आ जा ना रे।  

4.  
लुप्त अँगना  
सूखे ताल-पोखर  
रूठी गौरैया।  

5.  
कंक्रीट बाधा  
कहाँ जाए गौरैया  
घोंसला टूटा।  

6.  
प्यासी गौरैया  
प्यासे ताल-तलैया  
कंक्रीट-वन।  

7.  
बिछुड़े साथी  
हमारी ये गौरैया  
घर को लौटी।  

8.  
झुंड के झुंड  
सोनकंठी गौरैया  
वन को उड़ी।  

9.  
रात व भोर  
चिरई करे शोर  
हो गई फुर्र।  

10.  
भोज है सजा  
पथार है पसरा  
गौरैया ख़ुश।  

11.  
दाना चुगती  
गौरैया फुदकती  
चिड़े को देती।  

12.  
गौरैया बोली-  
पानी दो, घोंसला दो  
हमें जीने दो।  

13.  
गौरैया रानी  
आज है इतराती  
संग है साथी।  

14.  
छूटा है देस  
चली है परदेस  
गौरैया बेटी।  

15.  
फुर्र-सी उड़ी  
चहकती गौरैया  
घर वीराना।  

(पथार- सुखाने के लिए फैलाया गया अनाज)   

-जेन्नी शबनम (20.3.2020)  
(विश्व गौरैया दिवस पर)
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शनिवार, 14 मार्च 2020

649. रंगीली होली (होली पर 9 हाइकु) पुस्तक 113, 114

रंगीली होली 

*******

1.  
होली की टोली  
बैर-भाव बिसरे  
रंगीली होली।  

2.  
रंगों की मस्ती  
चेहरे भोले-भाले   
रंग हँसते।  

3.  
रंगों की वर्षा  
खिले जावा कुसुम  
घर-घर में।  

4.  
उड़ती आई  
मदमस्त फुहार  
रंग गुलाल।  

5.  
पिया बिदेस  
रंगों का ये गुबार  
जोगिया मन।  

6.  
निष्पक्ष रंग  
मिटाए भेद-भाव  
रंग दे मन।  

7.  
सजी सँवरी  
पिचकारी रँगीली  
होली आई रे।  

8.  
फीके से रिश्ते  
रंगों की बरसात  
रंग दे मन।  

9.  
हँसी ठिठोली  
रौनक-ही-रौनक  
होली हुलसी।  

- जेन्नी शबनम (10. 3. 2020)  
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रविवार, 8 मार्च 2020

648. पूरक

पूरक 

*******  

ओ साथी! 
अपना वजूद तलाशो, दूसरों का नष्ट न करो   
एक ही तराजू से, हम सभी को न तौलो   
जीवन जो नेमत है, हम सभी के लिए है   
इससे असहमत न होओ।   
मुमकिन है, युगों की प्रताड़ना से आहत तुम   
प्रतिशोध चाहती हो   
पर यह प्रतिकार   
एक नई त्रासदी को जन्म देगा   
सामाजिक संरचनाएँ डगमगा जाएँगी   
और यह संसार के लिए मुनासिब नहीं।   
तुम्हारे तर्क उचित नहीं   
तुम पूरी जाति से बदला कैसे ले सकती हो?   
जिसने पीड़ा दी उसे दंड दो   
न कि सम्पूर्ण जाति को   
जीवन और जीवन की प्रक्रिया, हमारे हाथ नहीं   
तुम समझो इस बात को।   
हाँ यह सच है, परम्पराओं से पार जाना   
बेहद कठिन था हमारे लिए   
हम गुनहगार हैं, तुम सभी के दुःख के लिए   
पर युग बदल रहा है   
समय ने पहचान दी है तुम्हें   
पर तुम अपना आत्मविश्वास खो रही हो   
बदला लेने पर आतुर हो   
पर किससे?   
कभी सोचा है तुमने   
हम तुम्हारे ही अपने हैं   
तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं   
हमारी रगों में तुम्हारा ही रक्त बहता है   
जीवन तुम्हारे बिना नहीं चलता है।   
तुम समझो, दूसरों के अपराध के कारण   
हम सभी अपराधी नहीं हैं   
हम भी दुखी होतें हैं   
जब कोई मानव से दानव बन जाता है   
हम भी असहाय महसूस करते हैं   
उन जैसे पापियों से   
जो तुम्हें दोजख में धकेलता है।   
हाँ हम जानते हैं   
घोषित कानून तुम्हारे साथ है   
पर अघोषित सज़ा हम सब भुगतते हैं   
महज़ इस कारण कि हम पुरूष हैं।  
तुम्हें भी इसे बदलना होगा   
हमें भी यह समझना होगा   
कुछ हैवानों के कारण हम सभी परेशान हैं   
कुछ हममें भी राक्षस है, कुछ तुममें भी राक्षसी है   
हमें परखना होगा, हम सब को चेतना होगा   
हमें एक दूसरे का साथ देना होगा।   
हमें चलना है, हमें साथ जीना है   
हम पूरक हैं   
ओ साथी!   
आओ, हम क़दम से क़दम मिला कर चलें।   

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2020)  
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)
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शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

647. फ़ितरत

फ़ितरत 

******* 

थोड़ा फ़लसफ़ा थोड़ी उम्मीद लेकर 
चलो फिर से शुरू करते हैं सफ़र 
जिसे छोड़ा था हमने तब 
जब ज़िन्दगी बहुत बेतरतीब हो गई थी 
और दूरी ही महज़ एक राह बची थी 
साथ न चलने और साथ न जीने के लिए, 
साथ सफ़र पर चलने के लिए 
एक दूसरे को राहत देनी होती है 
ज़रा-सा प्रेम, ज़रा-सा विश्वास चाहिए होता है 
और वह हमने खो दिया था 
ज़िन्दगी को न जीने के लिए 
हमने ख़ुद मज़बूर किया था, 
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं 
न सीने में दफ़न हो सकती हैं 
चलो, अपने-अपने मन के एक कोने में 
बीती बातों को पुचकारकर सुला आते हैं 
अपने-अपने मन पर एक ताला लगा आते हैं, 
क्योंकि अब और कोई ज़रिया भी तो नहीं बचा 
साँसों की रवानगी और समय से साझेदारी का 
अब यही हमारी ज़िन्दगी है और 
यही हमारी फ़ितरत भी। 

- जेन्नी शबनम (20. 2. 2020)
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शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

646. भोली-भाली

भोली-भाली 

*******  

मेरी बातें भोली-भाली  
जीभर कर हैं हँसने वाली  
बात तुम्हारी जीवन वाली  
इक जीवन में ढलने वाली  
दुःख की बातें न करना जो  
घुट-घुटकर हैं मरने वाली  
रद्दी-सद्दी बातें हुईं जो  
समझो वो है भूलने वाली  
बात चली जो भी थक-थकके  
ये समझो है रुकने वाली  
ऐसी बातें कहा करो मत  
धुक-धुक साँसें भरने वाली  
प्यार की बातें करती है 'शब'  
दर्द नहीं अब कहने वाली।  

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2020)  
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शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

645. साथी

साथी  

*******  

मेरी हँसी खो गई साथी  
मेरी यादें रूठ गईं साथी  
दिन महीने और साल बीते  
न जाने कब और कैसे बीते  
हम संग-संग कैसे रहते थे  
हम पल-पल कैसे हँसते थे  
बीती बातें हमें रूलाती हैं  
रूठी यादें तुम्हें बुलाती हैं,  
फिर से हम हँसना सीखें  
यादों को हम जीना सीखें  
विस्मृत हो तो बस वेदना  
विस्मृत न हो मेरा सपना  
थोड़ी हँसी लेकर आओ  
आकर के जीना सिखलाओ,  
सब कुछ हमको दुःख देता है  
हर कोई हमसे छल करता है  
धैर्य नहीं अब मन धरता है  
पल-पल जीवन भारी लगता है  
बस अब तुम आ जाओ साथी  
आकर गले लगाओ साथी,  
ठौर-ठौर जो मन रुठा था  
पल-पल मेरा भ्रम टूटा था  
मेरे लिए तुम आओ साथी  
सारे दुःख तुम हर लो साथी  
मेरी हँसी रूठ गई साथी  
मेरी यादें खो गई साथी।  

- जेन्नी शबनम (8. 2. 2020)  
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रविवार, 2 फ़रवरी 2020

644. ऑक्सीजन

ऑक्सीजन 

*******  

मेरे पुरसुकून जीवन के वास्ते  
तुम्हारा सुझाव-  
जीवन जीने के लिए प्रेम  
प्रेम करने के लिए साँसें  
साँसें भरने के लिए ऑक्सीजन  
ऑक्सीजन है प्रेम  
और वह प्रेम मैं तलाशूँ,  
अब बताओ भला, कहाँ से ढूँढूँ?  
ऐसा समीकरण कहाँ से जुटाऊँ?  
चारों ओर सूखा, वीराना, लिजलिजा  
फिर ऑक्सीजन कहाँ पनपे, कैसे नसों में दौड़े  
ताकि मैं साँसें लूँ, फिर प्रेम करूँ, फिर जीवन जीऊँ,  
सही ग़लत मैं नहीं जानती, पर इतना जानती हूँ  
जब-जब मेरी साँसें उखड़ने को होती हैं  
एक कप कॉफी या एक ग्लास नींबू-पानी के साथ  
ऑक्सीजन की नई खेप तुम मुझमें भर देते हो,  
शायद तुम हँसते होगे मुझपर  
या यह सोचते होगे कि मैं कितनी मूढ़ हूँ  
यह भी सोच सकते हो कि मैं जीना नहीं जानती  
लेकिन तुमसे ही सारी उम्मीदें हूँ पालती  
पर मैं भी क्या करूँ?  
कब तक भटकती फिरुँ?  
अनजान राहों पर क़दम डगमगाता है  
दूर जाने से मन बहुत घबराता है  
किसी तलाश में कहीं दूर जाना नहीं चाहती  
नामुमकिन में ख़ुद को खोना नहीं चाहती,  
ज़रा-ज़रा-सा कभी-कभी  
तुम ही भरते रहो मुझमें जीवन  
और बने रहो मेरे ऑक्सीजन।  
हाँ, यह भी सच है मैंने तुम्हें माना है  
अपना ऑक्सीजन  
तुमने नहीं।   

- जेन्नी शबनम (2. 2. 2020)   
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सोमवार, 27 जनवरी 2020

643. बेफ़िक्र धूप (ठण्ड पर 10 हाइकु)

बेफ़िक्र धूप 

***   

1.   
ठठ्ठा करता   
लुका-चोरी खेलता   
मुआ सूरज।   

2.   
बेफ़िक्र धूप   
इठलाती निकली   
मुँह चिढ़ाती।   

3.   
बिफरा सूर्य   
मनाने चली हवा   
भूल के गुस्सा।   

4.   
गर्म अँगीठी   
घुसपैठिया हवा,   
रार है ठनी।   

5.   
ठिठुरा सूर्य   
अलसाया-सा उगा   
दिशा में पूर्व।   

6.   
धमकी देता   
और भी पिघलूँगा,   
हिम पर्वत।   

7.   
डर के भागा   
सूरज बचकाना,   
सर्द हवाएँ।   

8.   
वक़्त चलता   
खरामा-खरामा-सा   
ठंड के मारे।   

9.   
जला जो सूर्य   
राहत की बारिश,   
मिज़ाज स्फूर्त।   

10.   
शातिर हवा   
चुगली है करती   
सूर्य बिदका।   

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2020)   
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गुरुवार, 23 जनवरी 2020

642. एक शाम ऐसी भी

एक शाम ऐसी भी 

*******   

एक शाम ऐसी भी, एक मुलाक़ात ऐसी भी   
बहुत-बहुत ख़ास जैसी भी   
जीवन का एक रंग यह भी, जीवन का एक पड़ाव यह भी   
एक सुख ऐसा भी और एक भाव यह भी  
ख़ाली सड़क पर दो मन, एक हाथ की दूरी पर दोनों मन   
और ये दूरी मिटाने का जतन   
आत्मीयता में डूबे मन, बतकही करते दोनों मन   
और बहुत कुछ अनकहा समझने का प्रयत्न   
न सिद्धांत की बातें न संस्कृति पर चर्चा   
न समाज की बातें न सरोकारों पर चर्चा   
न संताप की बातें न समझौतों पर चर्चा   
न संघर्ष की बातें न संयमो पर चर्चा   
पर होती रही बेहद लम्बी परिचर्चा   
न शब्दों का खेल, न आश्वासनों का खेल
न अनुग्रह कोई, न भावनाओं का मेल     
न कोई कौतुहल न कोई व्यग्रता   
धीमे-धीमे बढ़ते क़दम बिना किसी अधीरता   
समय भी साथ चला हँसता-गाता-झूमता   
कॉफी की गर्माहट नसों में घुल रही ज़रा-ज़रा   
मीठे पान-सी लाली चेहरे पर ज़रा-ज़रा   
ठंडी रात है और बदन में ताप ज़रा-ज़रा   
ज़िन्दगी हँस रही है आज ज़रा-ज़रा   
ख़ाली जीवन भी आज जैसे भरा-भरा।   

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2020)   
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सोमवार, 13 जनवरी 2020

641. प्यार करते रहे (तुकांत)

प्यार करते रहे 

******* 

तुम न समझे फिर भी हम कहते रहे 
प्यार था हम प्यार ही करते रहे।    

छाँव की बातें कहीं, और चल दिए   
ज़िन्दगी की धूप में जलते रहे।    

तुम न आए जब, जहां हँसता रहा   
ज़िन्दगी रूठी औ हम ठिठके रहे।    

चैन दमभर को न आया था कभी   
और तुम कहते हो, हम हँसते रहें।    

बेवफ़ाई तुमसे है जाना, मगर   
हम वफ़ा के गीत ही रचते रहे।    

ढल गई शब, अब सहर होने को है   
सोच के साये से हम लड़ते रहे।     

बारहा तुमने हमें टोका मगर   
अपनी धुन में गीत हम कहते रहे।    

आए तुम आकर भी कब के जा चुके   
हम सफ़र तन्हा मगर करते रहे।    

अबके जो जाओ, तो आना मत सनम   
हम तुम्हारे बिन भी अब रहते रहे।    

सौ जनम ‘शब‘ ने जिए हैं आज तक   
इस जनम में बोझ क्यों कहते रहे।     

('दिल के अरमां आँसुओं में बह गए' के तर्ज़ पर)
- जेन्नी शबनम (13. 1. 2020)   
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बुधवार, 1 जनवरी 2020

640. जो देखा जो सुना

जो देखा जो सुना   

*******   

जो देखा-सुना जो जिया-गुना   
वह लिखा वह सब लिखा   
जो मन ने कहा जो मन में पला   
वह लिखा बस वही लिखा   
कब कौन सी विधा हुई   
किस तराजू पे परखी गई   
किस नियम में सजी लेखनी   
वो त्रिभुज हुई या वृत्ताकार बनी   
समीप रही या समानांतर चली   
नहीं मालूम यह क्या हुआ   
नहीं मालूम यह क्यों हुआ   
बस हुआ और इतना हुआ   
जो समझा जो पहचाना   
वह लिखा वह सब लिखा।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2020)   
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सोमवार, 2 दिसंबर 2019

639. सवाल (5 क्षणिका)

सवाल 

*******   

1. 
कुछ सवाल
***  
कुछ सवाल ठहर जाते हैं मन में 
माकूल जवाब मालूम है 
मगर कहने की हिमाकत नहीं होती 
कुछ सवालों को 
सवाल ही रहने देना उचित है 
जवाब आँधियाँ बन सकती हैं। 

2. 
एक सवाल 
***  
ख़ुद से एक सवाल- 
कौन हूँ मैं? 
क्या एक नाम? 
या कुछ और भी? 

3. 
आख़िरी सवाल 
***  
सवालों का सिलसिला 
तमाम उम्र पीछा करता रहा 
इनमें उलझकर 
मन लहूलुहान हुआ 
पाँव भी छिले चलते-चलते 
आख़िरी साँस ही आख़िरी सवाल होंगे। 

4. 
सवाल समुद्र की लहरें 
***  
कुछ सवाल समुद्र की लहरें हैं 
उठती गिरती तेज़ क़दमों से चलती हैं 
काले नाग-सी फुफकारती हैं 
दिल की धड़कनें बढ़ाती हैं 
मगर कभी रूकती नहीं 
बेहद डराती हैं। 

5. 
सवालों की उम्र 
***  
सवालों की उम्र 
कभी छोटी क्यों नहीं होती?  
क्यों ज़िन्दगी के बराबर होती है?  
जवाब न मिले तो चुपचाप मर क्यों नहीं जाते?  
सवालों को भी ऐसी ही ख़त्म हो जाना चाहिए 
जैसे साँसे थम जाए तो उम्र खत्म होती है। 

- जेन्नी शबनम (2. 12. 2019)   
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शनिवार, 16 नवंबर 2019

638. धरोहर

धरोहर 

******* 

मेरी धरोहरों में कई ऐसी चीज़ें हैं   
जो मुझे बयान करती हैं, मेरी पहचान करती हैं   
कुछ पुस्तकें, जिनमें लेखकों के हस्ताक्षर   
और मेरे लिए कुछ संदेश हैं   
कुछ यादगार कपड़े   
जिन्हें मैंने किसी ख़ास वक़्त पर लिए या पहने हैं   
कुछ छोटी-छोटी पर्चियाँ   
जिनपर मेरे बच्चों की आड़ी-तिरछी लकीरों में   
मेरा बचपन छुपा हुआ है   
अनलिखे में गुज़रा कल लिखा हुआ है   
कुछ नाते जो क़िस्मत ने छीने   
उनकी यादों का दिल में ठिकाना है   
कुछ अपनों का छल जिससे मेरा सीना छलनी है  
कुछ रिश्ते जो मेरे साथ तब भी होते हैं   
जब हारकर मेरा दम टूटने को होता है   
साँसों से हाथ छूटने को होता है   
कुछ वक़्त जब मैंने जीभरकर जिया है   
बहुत शिद्दत से प्रेम किया है   
यूँ तब भी अँधेरों का राज था, पर ख़ुद पर यक़ीन था  
ये धरोहरें मेरे साथ विदा होंगी जब क़ज़ा आएगी   
मेरे बाद न इनका संरक्षक होगा   
न कोई इनका ख़्वाहिशमंद होगा   
मेरे सिवा किसी को इनसे मुहब्बत नहीं होगी   
मेरी किसी धरोहर की वसीयत नहीं होगी   
मेरी धरोहरें मेरी हैं बस मेरी   
मेरे साथ ही विदा होंगीं।     

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2019) 
______________________

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

637. महज़ नाम (क्षणिका)

महज़ नाम 

*******   

सोचती थी, किसी के आँचल में हर वेदना मिट जाती है   
पर भाव बदल जाते हैं, तो संवेदना मिट जाती है   
न किसी प्यार का, न अधिकार का नाम है   
माँ संबंध नहीं, महज़ पुकार का एक नाम है   
तासीर खो चुका है, बेकार का नाम है।     

- जेन्नी शबनम (7. 11. 2019)   
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बुधवार, 6 नवंबर 2019

636. रेगिस्तान (क्षणिका)

रेगिस्तान 

*******  
 
आँखें अब रेगिस्तान बन गई हैं 
यहाँ न सपने उगते हैं न बारिश होती है 
धूल-भरी आँधियों से 
रेत पे गढ़े वे सारे हर्फ़ मिट गए हैं 
जिन्हें सदियों पहले किसी ऋषि ने लिख दिया था- 
कभी कोई दुष्यंत सब विस्मृत कर दे तो 
शकुंतला यहाँ आकर अतीत याद दिलाए 
पर अब कोई स्रोत शेष नहीं 
जो जीवन को वापस बुलाए 
कौन किसे अब क्या याद दिलाए।  

- जेन्नी शबनम (6. 11. 2019)
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रविवार, 27 अक्टूबर 2019

635. दिवाली (दिवाली पर 7 हाइकु) पुस्तक - 112

दिवाली 
(दिवाली पर 7 हाइकु)   

*******   

1.   
सुख समृद्धि   
हर घर पहुँचे   
दीये कहते।   

2.   
मन से देता   
सकारात्मक ऊर्जा   
माटी का दीया।   

3.   
दीयों की जोत   
दसों दिशा उर्जित   
मन हर्षित।   

4.   
अमा की रात   
जगमगाते दीप   
ज्यों हो पूर्णिमा।   

5.   
धरा ने ओढ़ा   
रोशनी का लिहाफ़   
जलते दीये।   

6.   
दिवाली दिन   
सजावट घर-घर   
फैला उजास।   

7.   
बंदनवार   
स्वागत व सत्कार   
लक्ष्मी प्रसन्न।   

- जेन्नी शबनम (26. 10. 2010)   
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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

634. दंगा

दंगा  

***   

किसी ने कहा ये हिन्दू मरा   
कोई कहे ये मुसलमान था   
अपने-अपने दड़बे में क़ैद    
बँटा सारा हिन्दुस्तान था   

थरथराते जिस्मों के टुकड़े 
मगर जिह्वा पे रहीम-ओ-राम था   
कोई लाल लहू, कोई हरा लहू   
रँगा सारा हिन्दुस्तान था   

घूँघट और बुर्क़ा उघड़ा   
कटा जिस्म कहाँ बेजान था   
नौनिहालों के शव पर   
रोया सारा हिन्दुस्तान था    

दसों दिशाओं में चीख-पुकार   
ख़ौफ़ से काँपा आसमान था   
दहशत और अमानवीयता से   
डरा सारा हिन्दुस्तान था   

मन्दिर बने कि मस्जिद गिरे   
अवाम का नहीं, सत्ता का ये खेल था   
मन्दिर-मस्जिद के झगड़े में   
मरा सारा हिन्दुस्तान था   

-जेन्नी शबनम (24.10.2019)   
(भागलपुर दंगा के 30 साल होने पर)
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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

633. चाँद (चाँद पर 10 हाइकु) पुस्तक 111,112

चाँद 

*******   

1.   
बिछ जो गई   
रोशनी की चादर   
चाँद है खुश।   

2.   
सबका प्यारा   
कई रिश्तों में दिखा   
दुलारा चाँद।   

3.   
सह न सका   
सूरज की तपिश   
चाँद जा छुपा।   

4.   
धुँधला दिखा   
प्रदूषण से हारा   
पूर्णिमा चाँद।   

5.   
चंदा ओ चंदा   
घर का संदेशा ला   
याद सताती।   

6.   
रौशन जहाँ   
शबाब पर चाँद   
पूनम रात।   

7.   
चाँदनी गिरी   
अमृत है बरसा   
पूर्णिमा रात।   

8.   
पूनो की रात   
चंदा ने ख़ूब की है    
अमृत वर्षा।   

9.   
मुख मलिन   
प्रकाश प्रदूषण   
तन्हा है चाँद।   

10.   
दिख न पाया   
बिजली भरमार   
चाँद का मुख।   

- जेन्नी शबनम (18. 10. 2019)   
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सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

632. रिश्ते (रिश्ते पर 10 हाइकु) पुस्तक - 110,111

रिश्ते

******* 

1.   
कौन समझे   
मन की संवेदना   
रिश्ते जो टूटे।   

2.   
नहीं अपना   
कौन किससे कहे   
मन की व्यथा।   

3.   
दीमक लगी   
अंदर से खोखले   
सारे ही रिश्ते।   

4.   
कोई न सुने   
कारूणिक पुकार   
रिश्ते मृतक।   

5.   
मन है टूटा   
रिश्तों के दाँव-पेंच   
नहीं सुलझे।   

6.   
धोखे ही धोखे   
रिश्तों के बाज़ार में   
मुफ़्त में मिले।   

7.   
नसीब यही   
आसमान से गिरे   
धोखे थे रिश्ते।   

8.   
शिकस्त देते   
अपनों की खाल में   
फ़रेबी रिश्ते।   

9.   
जाल में फाँसे   
बहेलिए-से रिश्ते   
क़त्ल ही करें।   

10.   
झूठ-फ़रेब   
कैसे करें विश्वास   
छलावा रिश्ते।   

- जेन्नी शबनम (1. 10. 2019)   
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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

631. जीवन की गंध (क्षणिका)

जीवन की गंध   

******* 
 
यहाँ भी कोई नहीं, वहाँ भी कोई नहीं 
नितान्त अकेले तय करना है 
तमाम राहों को पार करना है
पाप-पुण्य, सुख-दुःख   
मन की अवस्था, तन की व्यवस्था 
समझना ही होगा, सँभालना ही होगा   
यह जीवन और जीवन की गंध। 

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2019)   
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

630. जादुई नगरी

जादुई नगरी

******* 

तुम प्रेम नगर के राजा हो   
मैं परी देश की हूँ रानी   
पँखों पर तुम्हें बिठाकर मैं   
ले जाऊँ सपनो की नगरी।   

मन चाहे तोड़ो जितना   
फूलों की है मीलों क्यारी   
कभी शेष नहीं होती है   
फूलों की यह फूलवारी।   

झुलाएँ तुम्हें अपना झूला   
लता पुष्पों से बने ये झूले   
बासंती बयार है इठलाती   
धरा-गगन तक जाएँ झूले।   

कल-कल बहता मीठा झरना   
पाँव पखारे और भींगे तन-मन   
मन की प्यास बुझाता है यह   
बिना उलाहना रहता है मगन।   

जादुई नगरी में फैली शाँति   
आओ यहीं बस जाएँ हम   
हर चाहत को पूरी कर लें   
जीवन को दें विश्राम हम।   

उत्सव की छटा है बिखरी   
रोम-रोम हुआ है सावन   
आओ मुट्ठी में भर लें हम   
मौसम-सा यह सुन्दर जीवन।   

- जेन्नी शबनम (9. 10. 2019) 
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सोमवार, 30 सितंबर 2019

629. साँझ (साँझ पर 10 हाइकु) पुस्तक - 109,110

साँझ 

*******   

1.   
साँझ पसरी   
''लौट आ मेरे चिड़े!''   
अम्मा कहती।   

2.   
साँझ की वेला   
अपनों का संगम   
रौशन नीड़।   

3.   
क्षितिज पर   
सूरज आँखें मींचे   
साँझ निहारे।   

4.   
साँझ उतरी   
बेदम होके दौड़ी   
रात के पास।   

5.   
चाँद व तारे   
साँझ की राह ताके   
चमकने को।   

6.   
धुँधली साँझ   
डूबता हुआ सूर्य   
तप से जागा।   

7.   
घर को चली   
साँझ होने को आई   
धूप बावरी।   

8.   
नभ से आई   
उतरकर साँझ   
दीए जलाती।   

9.   
गगन हँसा   
बेपरवाह धूप   
साँझ से हारी।   

10.   
संध्या उदास   
क्या करे दीया बाती   
कोई न साथ।   

- जेन्नी शबनम (28. 8. 2019)   
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गुरुवार, 26 सितंबर 2019

628. गुम सवाल (क्षणिका)

गुम सवाल   

******   

ज़िन्दगी जब भी सवालों में उलझी   
मिल न पाया कोई माकूल जवाब   
फिर ठठाकर हँस पड़ी   
और गुम कर दिया सवालों को   
जैसे वादियों में कोई पत्थर उछाल दे।   

- जेन्नी शबनम (26. 9. 2019)
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गुरुवार, 19 सितंबर 2019

627. तमाशा

तमाशा 

***  

सच को झूठ, झूठ को सच कहती है दुनिया   
इसी सच-झूठ के दरमियान रहती है दुनिया   
ख़ून के नाते हों या क़िस्मत के नाते   
फ़रेब के बाज़ार में सब ख़रीददार ठहरे। 
   
सहूलियत की पराकाष्ठा है   
अपनों से अपनों का छल   
मन के नातों का क़त्ल   
कोखजनों की बदनीयती   
सरेबाज़ार शर्मसार है करती। 
   
दुनिया को सिर्फ़ नफ़रत आती है   
दुनिया कब प्यार करती है   
धन-बल के लोभ में इन्सानियत मर गई है   
धन के बाज़ार में सबकी बोली लग गई है। 
   
यक़ीन और प्रेम गौरैया-सी फुर्र हुई   
तमाम जंगल झुलस गए   
कहाँ नीड़ बसाए परिन्दा   
कहाँ तलाशे प्रेम की बगिया। 
   
झूठ-फ़रेब के चीनी माँझे में उलझकर    
लहूलुहान हो गई है ज़िन्दगी   
ऐसा लगता है, खो गई है ज़िन्दगी   
देखो मिट रही है ज़िन्दगी   
मौत की बाहों में सिमट रही है ज़िन्दगी। 
   
आओ-आओ तमाशा देखो  
रिश्तों-नातों का तमाशा देखो   
पैसों के खेल का तमाशा देखो   
बिन पैसों का तमाशा देखो।   

- जेन्नी शबनम (19.9.2019)   
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शनिवार, 14 सितंबर 2019

626. क्षणिक बहार

क्षणिक बहार   

***   

आज वह ख़ूब चहक रही है   
मन-ही-मन में बहक रही है 
साल भर से वह, जो कच्ची थी 
उसका दिन है, तो पक रही है। 

आज वह निरीह नहीं सबल है 
आज वह दुःखी नहीं मगन है 
आज उसके नाम धरती है 
आज उसका ही ये गगन है। 

जहाँ देखो सब उसे बुला रहे हैं 
हर महफ़िल में उसे सजा रहे हैं 
किसी ने क्या ख़ूब वरदान दिया है 
एक पखवारा उसके नाम किया है। 

आज सज-धजकर निकलेगी 
आज बहुरिया-सी दमकेगी 
हर तरफ़ होगी जय-जयकार 
हर कोई दिखाए अपना प्यार 
हर किसी को इसका ख़याल   
परम्परा मनेगी सालों-साल। 

पखवारा बीतने पर मलीन होगी 
धीरे-धीरे फिर ग़मगीन होगी 
मंच पर आज जो बैठी है 
फ़र्श पर तब आसीन होगी 
क्षणिक बहार आज आई है 
फिर सालभर अँधेरी रात होगी। 

हर साल आता है यह त्योहार 
एक पखवारे का जश्ने-बहार 
उस हिन्दी की परवाह किसे है 
राजभाषा तक सिकोड़ा जिसे है 
जो भी अब संगी-साथी इसके हैं 
सालों भर साथ-साथ चलते हैं। 

भले अँगरेज़ी सदा अपमान करे 
हिन्दी का साथ हमसे न छूटे 
प्रण लो हिन्दी बनेगी राष्ट्रभाषा 
यह हमारा अधिकार, हमारी मातृभाषा 
हिन्दी को हमसे है बस यही आशा 
हम देंगे नया जीवन, नई परिभाषा। 

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2019) 
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मंगलवार, 3 सितंबर 2019

625. परम्परा (क्षणिका)

परम्परा   

*******   

मन के अवसाद को   
चूड़ियों की खनक, बिन्दी के आकार   
होठों की लाली और मुस्कुराहट में दफ़नाकर 
खिलखिलाकर दूर करना परम्परा है,   
स्त्रियाँ परम्परा बड़े मन से निभाती हैं।   

- जेन्नी शबनम (1. 9. 2019)   
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शनिवार, 31 अगस्त 2019

624. कश

कश   

*******   

"मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया   
हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया" 
रफी साहब ने गा दिया 
देवानंद ने चित्रपट पर निभा दिया 
पर मैं? मैं क्या करूँ? 
कैसे जियूँ?  कैसे मरुँ? 
हर कश में एक-एक फ़िक्र को फेंकती हूँ 
मैं ऐसे ही मेरे ज़ख़्मों को सेंकती हूँ   
मेरी फ़िक्र तो धुँए के छल्ले के साथ    
मेरे पास लौट आती है 
जाने क्यों धुएँ के साथ आसमान में नहीं जाती है 
मेरी ज़िन्दगी का साथी है फ़िक्र 
और फ़िक्र को भगाने का जरिया है 
जलती सिगरेट और धुँए का जो छल्ला है 
जो बादलों-सा होठों से निकलता है 
हवाओं में गुम होकर मेरे पास लौटता है 
साँस लेने का सबब भी है और साँस लेने से रोकता है 
हाँ मालूम है हर छल्ले के साथ   
वक़्त और उम्र का चक्र भी घूम रहा है 
मुझे नशा नहीं हुआ और लम्हा-लम्हा झूम रहा है   
जल्दी ही धुआँ लील लेगा मेरी ज़िन्दगी 
ज़िन्दगी लम्बी न सही छोटी सही 
हर साँस में नई कसौटी सही   
मैं हर फ़िक्र को धुँए में समेट बुलाती रही 
इस तरह ज़िन्दगी का साथ निभाती रही।   

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2019) 
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मंगलवार, 27 अगस्त 2019

623. अकेले हम (5 हाइकु) पुस्तक 108,109

अकेले हम

*******   

1.
ज़िन्दगी यही   
चलना होगा तन्हा   
अकेले हम।   

2.
राहें ख़ामोश   
सन्नाटा है पसरा   
अकेले हम।   

3.
हज़ारों बाधा   
थका व हारा मन   
अकेले हम।   

4.   
किरणें फूटीं   
भले अकेले हम   
नहीं संशय।   

5.   
उबर आए,   
गुमराह अँधेरा   
अकेले हम।   

- जेन्नी शबनम (21. 8. 2019)   
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मंगलवार, 20 अगस्त 2019

622. औरत (10 क्षणिका)

औरत 

*******

1.
औरत 
***   

एक चुटकी नमक   
एक चुटकी सिन्दूर   
एक चुटकी ज़हर   
मुझे औरत करते रहे   
ज़िन्दगी भर।   


2. 
विद्रोही औरतें 
***   

यूँ मुस्कुराना ख़ुद से विद्रोह-सा लगता है   
पर समय के साथ चुपचाप   
विद्रोही बन जाती हैं औरतें   
अपने उन सवालों से घिरी हुई   
जिनके जवाब वे जानती हैं   
मगर वक़्त पर देती हैं,   
विद्रोही औरतें।   


3. 
समीकरण 
***   

औरत का समीकरण:   
अनुभव का जोड़   
उम्र का घटाव   
भावना का गुणा-भाग   
अंतत: 
जीवन - शून्य।   


4.
ताना-बाना   
***   

जीवन का ताना-बाना   
उलटा-पुलटा चलता रहा 
समय यूँ ही सधता रहा   
कभी कुछ उलझा, कभी कुछ सुलझा 
कभी कुछ टूटकर गिरता रहा   
समय मुझे समझता रहा।   


5. 
मैना   
***   

महल का एक अदना खिलौना   
सोने का एक पिंजरा   
पिंजरे में रहती थी एक मैना   
वो रूठे या हँसे 
परवाह किसे?   
दाना-पानी मिलता जीभर   
फुर्र-फुर्र उड़कर दिखाती करतब   
इतनी ही है उसकी कहानी   
सब कहते- वह है बड़ी तक़दीरवाली।   


6.
बेशऊर   
***   

छोटी-छोटी डिब्बियों में भरकर   
सीलबन्द कर दिए सारे हुनर   
यूँ पहले भी बेशऊर कहलाती थी   
पर अब संतोष है   
सारा हुनर ओझल है सबसे   
अब उसका अपमान नहीं होता।   


7.
दिठौना   
***   

दिठौना तो हर रोज़ लगाया    
भूले से भी कभी न चूकी   
नज़रें तो झुकी ही रहीं    
औरतपना कभी न बिसरी   
फिर ये काली परछाईं कैसी?   
काला जादू हुआ ये कैसे?   
ओह! मर्द और औरत में   
दिठौने ने फ़र्क़ किया।  


8.
शाइस्ता   
***   

कहाँ से ढूँढ़कर लाऊँ वो शाइस्ता   
जो ख़िदमत करे मगर शिकवा नहीं   
बेशऊरी, बेअदबी तुम्हें पसन्द नहीं   
और अदब में रहकर ज़ुल्म सहना   
इस ज़माने की फितरत नहीं।   

(शाइस्ता - सभ्य / सुसंकृत)   


9.
पिछली रोटी   
***   

पहली रोटी भैया की   
अन्तिम रोटी अम्मा की   
यही हमारी रीत है भैया   
यही मिली इक सीख है भैया   
बहुत पुराना वादा है   
कुल की ये मर्यादा है   
ये बेटी का सत है भैया   
ये औरत का पथ है भैया।   


10.
वापसी   
***   

ख़ुदा जाने क्या हो   
चीज़ो को भूलते-भूलते   
कहीं ख़ुद को न भूला बैठूँ   
यूँ किसी ने मुझे याद रखा भी नहीं   
अपनी याद तो ख़ुद ही रखी अबतक   
गर ख़ुद को भुला दिया, फिर वापसी कैसे?   


- जेन्नी शबनम (20. 8. 2019)
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