मंगलवार, 13 सितंबर 2011

283. अभिवादन की औपचारिकता

अभिवादन की औपचारिकता

***

अभिवादन में पूछते हैं आप
कैसी हो? क्या हाल है? सब ठीक है ?
करती हूँ मैं अविलम्ब 
निःसंवेदित, रटा-रटाया, उल्लासित अभिनन्दन 
अच्छी हूँ! सब कुशल मंगल है! आप कैसे हैं?

क्या सचमुच कोई जानने को उत्सुक है, किसी का हाल?
क्या सचमुच हम बता सकते 
किसी को अपना हाल?
ये प्रचलित औपचारिकता के शब्द हैं 
नहीं चाहता सुनना, कोई किसी का हाल
फिर भी पूछ्तें हैं, मैं भी पूछती हूँ 
मन में समझते हुए दूसरे का हाल। 

क्या सुनना चाहेंगे मेरा हाल
क्या दूसरों की पीड़ा जानना चाहेंगे
क्या सुन सकेंगे मेरा सच?
मेरा कुण्ठित अतीत और व्याकुल वर्तमान 
मेरा सम्पूर्ण हाल, जो शायद आपका भी हो थोड़ा सच। 

मैं तो जुटा न पाई हूँ, आप भी कहाँ कर पाए हैं 
अनौपचारिक बनकर सच बताने की हिम्मत
आज बता ही देती हूँ अपनी सारी सच्चाई 
कर ही देती हूँ हमारे बीच की औपचारिकता का अन्त। 

बताऊँ कैसे मेरा वह दर्द, वह अवसाद, वह दंश 
जो पल-पल मेरे मन को खण्डित करता है
बताऊँ कैसे मेरा वह सच 
जो मेरे अन्तर्मन की जागीर है 
मन के तहख़ाने में दफ़्न है
जानती हूँ, मेरा सच सुनकर आप रूखी हँसी हँस देंगे 
हमारे बीच के रहस्यमय आवरण हट जाएँगे
आप भूले से भी हाल पूछेंगे 
अच्छा ही होगा अब आप कभी 
मुझसे औपचारिकता नहीं निभाएँगे। 

कैसे बताऊँ कि मेरे मन में कितनी टीस है 
शरीर में कितनी पीर है
उम्र और वक़्त का हर एक ज़ख़्म, मुझसे मुझको छीनता है
अपनों की ख़्वाहिशों को पालने में 
ख़ुद को हर पल कितना मारना होता है
एक विफलता सम्बन्धों की 
एक लाचारगी जीने की, मन कितना तड़पता है। 

कैसे बताऊँ, तमाम कोशिशों के बावजूद 
समाज की कसौटी पर खरी नहीं उतरी हूँ
घर के बिखराव को बचाने में 
क्षण-क्षण कितना ढहती, बिखरती हूँ
वक़्त की कमी या फ़ुर्सत की कमी 
एक बहाना-सा बनाकर सबसे छिपती हूँ
त्रासदी-सा जीवन-सफ़र मेरा 
पर घर का सम्मान, सदा उल्लासित दिखती हूँ। 

कैसे बताऊँ, क्यों सम्बन्धों की भीड़ में 
एक अपना तलाशती हूँ
क्यों दुनिया की रंगीनियों में खोकर भी रंगहीन हूँ
क्यों छप्पन व्यंजनो के सामार्थ्य के बाद भी 
भूखी-प्यासी हूँ
क्यों जीवन से पलायान को सदैव तत्पर रहती हूँ।  

नहीं! नहीं! नहीं बता पाऊँगी सम्पूर्ण सत्य 
मंज़ूर है मुखौटा ओढ़ना
हमारी रीति-संस्कृति ने सिखाया है 
कटु सत्य नहीं बोलना
हमारी तहज़ीब है 
आँसुओं को छुपाकर दूसरों के सामने मुस्कुराना
यों भी सलीक़ा अच्छा नहीं होता, अपना भेद खोलना। 

अभिवादन की औपचारिकता है, किसी का हाल पूछना
जज़्बात की बात नहीं, महज़ चलन है ये पूछना
जान-पहचान की चिर-स्थायी है ये परम्परा 
औपचारिकता ही सही, बस यों ही हाल पूछते रहना। 

- जेन्नी शबनम (मई, 2009)
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सोमवार, 12 सितंबर 2011

282. लौट चलते हैं अपने गाँव

लौट चलते हैं अपने गाँव

***

मन उचट गया है शहर के सूनेपन से
अब डर लगने लगा है
भीड़ की बस्ती में अपने ठहरेपन से। 
 
चलो लौट चलते हैं अपने गाँव
अपने घर चलते हैं 
जहाँ अजोर होने से पहले
पहरू के जगाते ही हर घर उठ जाता है 
चटाई बीनती हुक्का गुड़गुड़ाती
बुढ़िया दादी धूप सेंकती है
गाँती बाँधे नन्हकी स्लेट पर पेन्सिल घिसती है। 

अजोर हुए अब तो देर हुई
बड़का बऊआ अपना बोरा-बस्ता लेकर
स्कूल न जाने की ज़िद में खड़ा है
गाँव के मास्टर साहब
आज ले ही जाने को अड़े हैं
क्या ग़ज़ब नज़ारा है, बड़ा अजब माजरा है। 

अँगने में रोज़ अनाज पसराता है
जाँता में रोज़ दाल दराता है
गेहूँ पीसने की अब बारी है
भोर होते ही रोटी भी तो पकानी है
सामने दौनी-ओसौनी जारी है
ढेंकी से धान कूटने की आवाज़ लयबद्ध आती है। 
  
खेत से अभी-अभी तोड़ी
घिउरा और उसके फूल की तरकारी
ज़माना बीता, पर स्वाद आज भी वही है
दोपहर में जन सब के साथ पनपियाई
अलुआ, नमक और अचार का स्वाद
मन में आज भी ताज़ा है। 
 
पगहा छुड़ाते धीरे-धीरे चलते बैलों की टोली
खेत जोतने की तैयारी है  
भैंसी पर नन्हका लोटता है
जब दोपहर बाद घर लौटता है। 
  
गोड़ में माटी की गंध
घूर तापते चचा की कहानी
सपनों सी रातें अब मुझे बुलाती हैं   
चलो लौट चलते हैं अपने गाँव
अपने घर चलते हैं 
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अजोर - रोशनी
पहरू - रात्रि में पहरेदारी करने वाला
चटाई बीनती - चटाई बुनना
गाँती - ठण्ड से बचाव के लिए बच्चों को विशेष तरीक़े से चादर / शॉल से लपेटना
बोरा-बस्ता - बैठने के लिए बोरा और किताब का झोला
जाँता - पत्थर से बना हाथ से चलाकर अनाज पीसने का यंत्र
दराता - दरना
दौनी - धान को निकालने के लिए फ़सल एकत्रित कर उस पर बैल चलाया जाता है
ओसौनी - दौनी होने के बाद धान को अलग करने की क्रिया
ढेंकी - लकड़ी से बना यंत्र जिसे पैर द्वारा चलाया जाता है 
घिउरा - नेनुआ
जन - काम करने वाले मज़दूर / किसान
पनपियाई - दोपहर से पहले का खाना
अलुआ - शकरकंद
गोड़ - पैर
घूर - अलाव
चचा - चाचा
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- जेन्नी शबनम (जुलाई 2003)
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बुधवार, 7 सितंबर 2011

281. अनुबन्ध

अनुबन्ध

***

एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच
कभी साथ-साथ घटित न होना
एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच
कभी साथ-साथ फलित न होना 
एक अनुबन्ध है स्वप्न और यथार्थ के बीच
कभी सम्पूर्ण सत्य न होना 
एक अनुबन्ध है धरा और गगन के बीच
कभी किसी बिन्दु पर साथ न होना 
एक अनुबन्ध है आकांक्षा और जीवन के बीच
कभी सम्पूर्ण प्राप्य न होना 
एक अनुबन्ध है मेरे मैं और मेरे बीच
कभी एकात्म न होना।

- जेन्नी शबनम (27.1.2009)
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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

280. जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ

जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ

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मन में कुछ दरक-सा जाता है
जब क्षितिज पर अस्त होता सूरज देखती हूँ
ज़िन्दगी बार-बार डराती है
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ। 

सपने ध्वस्त हो रहे हैं 
हवा मेरी सारी निशानियाँ मिटा रही है
वुजूद घुटता-सा है
ज़ेहन में मवाद की तरह यादें रिसती हैं
अपेक्षाओं की मुराद दम तोड़ती है
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ। 

सहेजे सपनों की विफलता का मलाल
धराशायी अरमान
मन की विक्षिप्तता
असह्य हो रहा अब ये संताप
मन डर जाता है जीवन के इस रीत से
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ। 

हूँ अब ख़ामोश
मूक-बधिर
निहार रही अपने जीवन का
अरूप अवशेष। 

- जेन्नी शबनम (11. 9. 2008)
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शनिवार, 3 सितंबर 2011

279. दर्द की मियाद और कितनी है (क्षणिका)

दर्द की मियाद और कितनी है

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कोई भी दर्द उम्र से पहले ख़त्म नहीं होता
किससे पूछूँ कि
दर्द की मियाद और कितनी है। 

- जेन्नी शबनम (2. 9. 2011)
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शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

278. फ़िज़ूल हैं अब (क्षणिका)

फ़िज़ूल हैं अब

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फ़िज़ूल हैं अब
इसलिए नहीं कि सब जान लिया
इसलिए कि जीवन बेमक़सद लगता है
जैसे चलती हुई साँसें या फिर बहती हुई हवा
रात की तन्हाई या फिर दिन का उजाला
दरकार नहीं, पर ये रहते हैं अनवरत मेरे साथ चलते हैं
मैं और ये सब, फ़िज़ूल हैं अब। 

- जेन्नी शबनम (28. 8. 2011)
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सोमवार, 29 अगस्त 2011

277. शेष न हो (क्षणिका)

शेष न हो

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सवाल भी ख़त्म और जवाब भी
शायद ऐसे ही ख़त्म होते हैं रिश्ते
जब सामने कोई हो
और कहने को कुछ भी शेष न हो। 

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2011)
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रविवार, 28 अगस्त 2011

276. इन्द्रधनुष खिला (बरसात पर 10 हाइकु) (पुस्तक - 19)

इन्द्रधनुष खिला 
(बरसात पर 10 हाइकु)

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1.
आकाश दिखा
इन्द्रधनुष खिला
मचले जिया।

2.
हुलसे जिया
घिर आए बदरा
जल्दी बरसे।

3.
धरती गीली
चहुँ ओर है पानी
हिम पिघला।

4.
भीगा अनाज
कुलबुलाए पेट
छत टपकी।

5.
बिजली कौंधी
कहीं जब है गिरी
खेत झुलसे।

6.
धरती ओढ़े
बादलों की छतरी
सूरज छुपा।

7.
मेघ गरजा
रिमझिम बरसा
मन हरसा।

8.
कारे बदरा
टिप-टिप बरसे
मन हरसे।

9.
इन्द्र देवता
हुए धरा से रुष्ट
लोग पुकारें।

10.
ठिठके खेत
कर जोड़ पुकारे
बरसो मेघ।

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2011)
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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

275. राखी के धागे (राखी पर 11 हाइकु) (पुस्तक - 18)

राखी के धागे
(राखी पर 11 हाइकु)

*******

1.   
राखी का पर्व   
पूर्णमासी का दिन   
सावन माह   

2.   
राखी-त्योहार   
सब हों ख़ुशहाल   
भाई-बहन   

3.   
बहना आई   
राखी लेकर प्यारी   
भाई को बाँधी   

4.   
रक्षा बंधन   
प्यार का है बंधन   
पवित्र धागा   

5.   
रक्षा का वादा   
है भाई का वचन   
बहन ख़ुश   

6.   
भैया विदेश   
राखी किसको बाँधे   
राह निहारे  

7.   
राह अगोरे   
भइया नहीं आए   
राखी का दिन   

8.   
सजेगी राखी   
भैया की कलाई पे   
रंग-बिरंगी   

9.   
राखी की धूम   
दिखे जो चहुँ ओर   
मनवा झूमे   

10.   
रक्षा-बंधन   
याद रखना भैया   
प्यारी बहना   

11.   
अटूट रिश्ता   
जोड़े भाई-बहन   
रक्षा बंधन   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2011)   
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सोमवार, 22 अगस्त 2011

274. दुनिया बहुत रुलाती है (क्षणिका)

दुनिया बहुत रुलाती है

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प्रेम की चाहत कभी कम नहीं होती
ज़िन्दगी बस दुनियादारी में कटती है
कमबख़्त ये दुनिया बहुत रुलाती है। 

- जेन्नी शबनम (21. 8. 2011 )
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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

273. फिर से मात (तुकांत)

फिर से मात

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बेअख़्तियार-सी हैं करवटें, बहुत भारी है आज की रात
कह दिया यूँ तल्ख़ी से उसने, तन्हाई है ज़िन्दगी की बात। 

साथ रहने की वो गुज़ारिश, बन चली आँखों में बरसात
ख़त्म होने को है ज़िन्दगानी, पर ख़त्म नहीं होते जज़्बात।  

सपने पलते रहे आसमान के, छूटी ज़मीन बने ऐसे हालात
वक़्त से करते रहे थे शिकवा, वक़्त ही था बैठा लगाए घात। 

शिद्दत से जिसे चाहा था कभी, मिले हैं ऐसे कुछ लम्हे सौग़ात
अभी जाओ ओ समंदर के थपेड़ों, आना कभी फिर होगी मुलाक़ात। 

दोराहे पर है ठिठकी ज़िन्दगी, क़दम-क़दम पर खड़ा आघात
देखो सब हँस पड़े क़िस्मत पर, 'शब' ने खाई है फिर से मात। 

- जेन्नी शबनम (11. 8. 2011 )
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सोमवार, 15 अगस्त 2011

272. राम नाम सत्य है

राम नाम सत्य है

***

कोई तो पुकार सुनो
कोई तो साहस करो
चीख नहीं निकलती
पर दम निकल रहा है उनका

वे अपने दर्द में ऐसे टूटे हैं
कि ज़ख़्म दिखाने से भी कतराते हैं
उनकी सिसकी मुँह तक नहीं आती
गले में ही अटक जाती है
करुणा नहीं चाहते
मेहनत से जीने का अधिकार चाहते हैं
जो उन्हें मिलता नहीं
और छीन लेने का साहस नहीं
क्योंकि बहुत तोड़ा गया वर्षों-वर्ष उनको
दम टूट जाए, पर ज़ुबान चुप रहे
इसी कोशिश में रोज़-रोज़ मरते हैं

चिथड़ों में लिपटे बच्चों की ज़ुबान भी चुप हो गई है
रोने के लिए पेट में अनाज तो हो
देह में जान तो हो
लहलहाती फ़सलें, प्रकृति लील गई
देह की ताक़त, ख़ाली पेट की मजूरी तोड़ गई।   

हाथ अकेला, भँवर बड़ा
उफ़! इससे तो अच्छा है जीवन का अन्त 
एक साथ सब बोलो-
''राम नाम सत्य है!''

- जेन्नी शबनम (15.8.2011)
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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

271. अलविदा कहती हूँ

अलविदा कहती हूँ

*******

ख़्वाहिशें ऐसे ही दम तोड़ेंगी
जानते हुए भी नए-नए ख़्वाब देखती हूँ
दामन से छूटते जाते  
जाने कितने पल
फिर भी वक़्त को समेटती हूँ
शमा फिर भी जलेगी
रातें फिर भी होंगी
साथ तुम्हारे बस एक रात आख़िरी चाहती हूँ
चाहकर टूटना या टूटकर चाहना
दोनों हाल में 
मैं ही तो हारती हूँ
दूरियाँ और भी बढ़ जाती है
मैं जब-जब पास आती हूँ
पास आऊँ या दूर जाऊँ
सिर्फ़ मैं ही 
मात खाती हूँ
न आए कोई आँच तुम पर
तुमसे दूर चली जाती हूँ
एक वचन देती हूँ प्रिय
ख़ुद से नाता तोड़ती हूँ
'शब' की हँसी गूँज रही
महफ़िल में सन्नाटा है
रूख़सत होने की बारी है
अब मैं
अलविदा कहती हूँ

- जेन्नी शबनम (अगस्त 10, 2011)
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रविवार, 7 अगस्त 2011

270. तुम मेरे दोस्त जो हो

तुम मेरे दोस्त जो हो

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मेरे लिए एक काम कर दोगे
''ज़हर ला दोगे
बहुत थक गई हूँ
ज़िन्दगी से ऊब गई हूँ'',
जानती हूँ, तुम ऐसा नहीं करोगे
कभी ज़हर नहीं ला दोगे
मेरी मृत्यु सह नहीं सकते
फिर भी कह बैठती हूँ तुमसे 
तुम भी जानते हो
मुझमें मरने का साहस नहीं
न जीने की चाहत बची है
पर हर बार जब-जब हारती हूँ
तुमसे ऐसा ही कहती हूँ
तुम्हारे काँधे पे मेरा माथा
सहारा और भरोसा तुम ही तो देते हो
मेरे हर सवाल का जवाब भी
तुम ही देते हो
बिना रोके बिना टोके
शायद तुम ही हो
जो मेरे गुस्से को सह लेते हो
मेरे आँसुओं को बदल देते हो
कई बार सोचती हूँ
तुम्हारी ग़लती नहीं
दुनिया से नाराज़ हूँ
फिर क्यों ख़फ़ा होती हूँ तुम पर
क्यों खीझ निकालती हूँ तुम पर
तुम चुपचाप सब सुनते हो
मुझे राहत देते हो 
कई बार मन होता है
तुमसे अपना नाता तोड़ लूँ
अपने ज़ख़्म ख़ुद में समेट रखूँ
पर न जाने क्यों
किस्त-किस्त में सब कह जाती हूँ तुमसे 
शायद यह भी कोई नाता है
जन्म का तो नहीं पर जन्मों का रिश्ता है
इसलिए बेख़ौफ़
कभी ज़हर माँगती 
कभी नज़र माँगती
कभी रूठ जाती हूँ
महज़ इस बात के लिए कि
मेरे लिए मृत्यु क्यों नहीं ख़रीद लाये
तुम बहुत कंजूस हो
जानती हूँ
तुम मेरे दोस्त जो हो
मेरे लिए मौत नहीं
सदैव ज़िन्दगी लाते हो

- जेन्नी शबनम (7. 8. 2011)
(मित्रता दिवस पर)
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शनिवार, 6 अगस्त 2011

269. उन्हीं दिनों की तरह (पुस्तक - 37)

उन्हीं दिनों की तरह

*******

चौंककर उसने कहा-
''जाओ लौट जाओ 
क्यों आई हो यहाँ
क्या सिर्फ़ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
मैं अवाक्! निरुत्तर!
फिर भी कह उठी-
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी
गवाह तो थे न तुम
जीवन की दशा और दिशा को, तुमने ही तो बदला था
सब जानते तो थे तुम, तब भी और अब भी
सच है, तुम भी बदल गए हो
वो न रहे, जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं
एक भूलभुलैया या फिर अपरिचित-सी फ़िज़ा
जाने क्यों लग रही है मुझे?
तुम न समझो पर अपना-सा लग रहा है मुझे
थोड़ा-थोड़ा ही सही
आस है, शायद तुम वापस अपना लो मुझे
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे
और तुमने बेझिझक, सहारा दिया था मुझे
यह जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ
और हमेशा रहूँगी
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थी
और मैं बेफ़िक्र, ज़िन्दगी के नये रूप देख रही थी
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी
सब कुछ बदल गया है, वक़्त के साथ
जानती हूँ
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ!
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ
फ़र्क़ सिर्फ वज़ह का है
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ!
तनिक सुकून दे दो, फिर लौट जाना है मुझे
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी, तुमसे दूर
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी
अब तक जीवित हूँ!
मत कहो-
''जाओ लौट जाओ'',
एक बार कह दो-
''शब, तुम वही हो, मैं भी वही
फिर आना, कुछ वक़्त निकालकर
एक बार साथ-साथ जिएँगे
फिर से, उन्हीं दिनों की तरह
कुछ पल!''

- जेन्नी शबनम (17. 7. 2011)
(20 साल बाद शान्तिनिकेतन आने पर)
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बुधवार, 3 अगस्त 2011

268. कह न पाऊँगी कभी

कह न पाऊँगी कभी

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अपने जीवन का सत्य
कह न पाऊँगी किसी से कभी
अपने पराए का भेद समझती हूँ
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी किसी से कभी

न जाने कब कौन अपना बनकर
जाल बिछा रहा हो
किसी तरह फँसकर
उसके जलसे का
मैं बस हिस्सा रह जाऊँ 

बहुत घुटन होती है
जब-जब भरोसा टूटता है
किसी अपने के सीने से
लिपट जाने का मन करता है 

समय-चक्र और नियति
कहाँ कौन जान पाया है?
किसी पराए की प्रीत
शायद प्राण दे जाए
जीवन का कारण बन जाए
पर पराए का अपनापन
कैसे किसी को समझाएँ?

अपनों का छल
बड़ा घाव देता है
पराए से अपना कोई नहीं 
मन जानता है
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी किसी से कभी। 

- जेन्नी शबनम (19. 7. 2011)
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सोमवार, 1 अगस्त 2011

267. कुछ तो था मेरा अपना

कुछ तो था मेरा अपना

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जी चाहता है
सब कुछ छोड़कर
लौट जाऊँ, अपने उसी अँधेरे कोने में
जहाँ कभी किसी दिन
दुबकी हुई, मैं मिली थी तुम्हें
और तुम खींच लाए थे उजाले में
चहकने के लिए
। 

खिली-खिली मैं
जाने कैसे सब भूल गई
वो सब यादें विस्मृत कर दी
जो टीस देती थी मुझे
और मैं तुम्हारे साथ
सतरंगी सपने देखने लगी थी
जानते हुए कि
बीते हुए कल के अँधेरे साथ नहीं छोड़ेंगे
और एक दिन तुम भी छोड़ जाओगे
मैंने एक भ्रम लपेट लिया था कि
सब कुछ अच्छा है
जो बीता वो कल था
आज का सपना सब सच्चा है

अब तो जो शेष है
बस मेरे साथ
मेरा ही अवशेष है
जी चाहता है
लौट जाऊँ अपने उसी अँधेरे कोने में
अपने सच के साथ
जहाँ कुछ तो था
मेरा अपना...!

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2011)
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बुधवार, 20 जुलाई 2011

266. एक चूक मेरी

एक चूक मेरी

***

रास्ते पर चलते हुए मैं उससे टकरा गई
उसके हाथ में पड़े सभी फ़लसफ़े गिर पड़े
जो मेरे लिए ही थे
सभी टूट गए और मैं देखती रही।   

उसने कहा 
ज़रा-सी चूक
तमाम जीवन की सज़ा बन गई तुम्हारी
तुम जानती हो कि उचित क्या है
क्योंकि तुमने देखे हैं उचित फ़लसफ़े
जो जन्म के साथ तुम्हें मिलने थे
जिनके साथ तुम्हें जीना था। 

अडिग रहने का साहस, अब तुममें न होगा
जाओ और जियो, उन सभी की तरह
जो किसी फ़लसफ़ा के बिना जीते और मर जाते हैं
बस एक फ़र्क़ होगा 
तुम्हें पता है कि तुम्हारे लिए सही क्या है
यह जानते हुए भी तुम्हें बेबस जीना होगा
अपनी आत्मा को मारना होगा।  

मेरे पास मेरे तर्क थे
कि यह अनजाने में हुआ
एक मौका और...!
इतने न सही, थोड़े से...!

पर उसने कहा 
यह सबक़ है, इस जीवन के लिए
ज़रा-सी चूक
और सब ऐसे ही ख़त्म हो जाता है
कोई मौक़ा दुबारा नहीं मिलता है।  

आज तक मैं जी रही
मेरे फ़लसफ़ों के टूटे टुकड़ों में
अपनी ज़िन्दगी को बिखरते देख रही
रोज़-रोज़ मेरी आत्मा मर रही। 
  
वह वापस कभी नहीं आया
न दुबारा मिला
एक चूक मेरी और...!

- जेन्नी शबनम (20.7.2011)
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

265. मैं भी इंसान हूँ (पुस्तक - 30)

मैं भी इंसान हूँ

*******

मैं, एक शब्द नही, एहसास हूँ, अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की, मैं भी जीवित इंसान हूँ। 
दर्द में आँसू निकलते हैं, काटो तो रक्त बहता है
ठोकर लगे तो पीड़ा होती है, दग़ा मिले तो दिल तड़पता है। 
कुछ बंधन बन गए, कुछ चारदीवारी बन गई
पर ख़ुद में, मैं अब भी जी रही। 
कई चेहरे ओढ़ लिए, कुछ दुनिया पहन ली
पर कुछ बचपन ले, मैं आज भी जी रही। 
मेरे सपने, आज भी मचलते हैं
मेरे जज़्बात, मुझसे अब रिहाई माँगते हैं। 
कब, कहाँ, कैसे-से कुछ प्रश्न
यूँ ही पनपते हैं, और ये प्रश्न
मेरी ज़िन्दगी उलझाते हैं। 
हाँ, मैं सिर्फ़ एक शब्द नहीं
साँसे भरती हाड़-मांस की
मैं भी जीवित इंसान हूँ।   

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2009)
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रविवार, 10 जुलाई 2011

264. आत्मकथा

आत्मकथा

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एक सदी तक चहकती फिरी
घर आँगन गलियों में
थी कथा परियों की
और जीवन फुदकती गौरैया-सी।   

दूसरी सदी में आ बसी
हर कोने चौखट चौबारे में
कण-कण में बिछती रही
बगिया में ख़ुशबू-सी।    

तीसरी सदी तक आ पहुँची
घर की गौरैया अब उड़ जाएगी
घर आँगन होगा सूना
याद बहुत आएगी
कोई गौरैया है आने को
अपनी दूसरी सदी में जीने को
कण-कण में समाएगी
घर आँगन वो खिलाएगी।  

ख़ुद को अब समेट रही
बिखरे निशाँ पोंछ रही
यादों में कुछ दिन जीना है
चौथी सदी बिताना है
फिर तस्वीर में सिमट जाना है।   

जाने कैसी ये आत्मकथा
मेरी उसकी सबकी
एक जैसी है
खिलना बिछना सिमटना
ख़त्म होती यूँ
गौरैया की कहानी है।   

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2011)
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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

263. स्तब्ध खड़ी हूँ

स्तब्ध खड़ी हूँ

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ख़्वाबों के गलियारे में, स्तब्ध मैं हूँ खड़ी
आँखों से ओझल, ख़ामोश पास तुम भी हो खड़े,
साँसे हैं घबराई-सी, वक़्त भी है परेशान खड़ा
जाने कौन सी विवशता है, वक़्त ठिठका है
जाने कौन सा तूफ़ान थामे, वक़्त ठहरा है। 

मेरी सदियों की पुकार तुम तक नहीं पहुँचती
तुम्हारी ख़ामोशी व्यथित कर रही है मुझे, 
अपनी आँखों से अपने बदन का लहू पी रही
और जिस्म को आँसुओं से सहेज रही हूँ। 

मैं, तुम और वक़्त
सदियों से सदियों का तमाशा देख रहे हैं
न हम तीनों थके न सदियाँ थकीं, 
शायद एक और इतिहास रचने वाला है
या शायद एक और बवंडर आने वाला है। 

- जेन्नी शबनम (23. 1. 2009)
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बुधवार, 6 जुलाई 2011

262. ज़िन्दगी मौक़ा नहीं देती (क्षणिका)

ज़िन्दगी मौक़ा नहीं देती

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ख़ौफ़ के साये में ज़िन्दगी को तलाशती हूँ
ढेरों सवाल हैं पर जवाब नहीं
हर पल हर लम्हा एक इम्तहान से गुज़रती हूँ
ख़्वाहिशें इतनी कि पूरी नहीं होती
कमबख़्त, ये ज़िन्दगी मौक़ा नहीं देती। 

- जेन्नी शबनम (24. 1. 2009)
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शनिवार, 2 जुलाई 2011

261. विजयी हो पुत्र (पुस्तक - 52)

विजयी हो पुत्र

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मैं, तुम्हारी माँ, एक गांधारी
मैंने अपनी आँखों पे नहीं
अपनी संवेदनाओं पे पट्टी बाँध रखी है
इसलिए नहीं कि
तुम्हारा शरीर वज्र का कर दूँ
इसलिए कि
अपनी तमाम संवेदनाएँ तुममें भर दूँ। 

यह युद्ध दुर्योधन का नहीं
जिसे माँ गांधारी की समस्त शक्ति मिली
फिर भी हार हुई
क्योंकि उसने मर्यादा को तोड़ा
अधर्म पर चला 
अपनों से छल किया
स्त्री, सत्ता और संपत्ति के कारण युद्ध किया। 

मेरे पुत्र,
तुम्हारा युद्ध धर्म का है
जीवन के सच का है
अंतर्द्वंद्व का है
स्वयं के अस्तित्व का है। 

तुम पांडव नहीं
जो कोई कृष्ण आएगा सारथी बनकर
और युद्ध में विजय दिलाएगा
भले ही तुम धर्म पर चलो
नैतिकता पर चलो
तुम्हें अकेले लड़ना है और सिर्फ़ जीतना है
 
मेरी पट्टी नितांत अकेले में खुलेगी
जब तुम स्वयं को अकेला पाओगे
दुनिया से हारे, अपनों से थके
मेरी संवेदना, प्रेम, विश्वास, शक्ति
तुममें प्रवाहित होगी
और तुम जीवन-युद्ध में डटे रहोगे
जो तुम्हें किसी के विरुद्ध नहीं
बल्कि स्वयं को स्थापित करने के लिए करना है। 

मेरी आस और आकांक्षा
अब बस तुम से ही है
और जीत भी। 

- जेन्नी शबनम (22. 6. 2011)
(पुत्र अभिज्ञान के 18 वें जन्मदिन पर)
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

260. तुम्हारे सवाल

तुम्हारे सवाल

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न तो सवाल बनी तुम्हारे लिए कभी
न ही कोई सवाल किया तुमसे कभी
फिर क्यों हर लम्हों का हिसाब माँगते हो?
फिर क्यों उगते हैं नए-नए सवाल तुममें?

कहाँ से लाऊँ उनके जवाब
जिसे मैंने सोचा ही नहीं
कैसे दूँ उन लम्हों का जवाब
जिन्हें मैंने जिया ही नहीं।  

मेरे माथे की शिकन की वज़ह पूछते हो
मेरे हर आँसुओं का सबब पूछते हो
अपने साँसों की रफ़्तार का जवाब कैसे दूँ?
अपने हर गुज़रते लम्हों का हिसाब कैसे दूँ?

तुम्हारे बेधते शब्दों से
आहत मन के आँसुओं का क्या जवाब दूँ?
तुम्हारी कुरेदती नज़रों से
छलनी वजूद का क्या जवाब दूँ?

बिन जवाबों के तुम मेरी औक़ात बताते हो
बिन जवाबों के तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं अपनाती हूँ
फिर क्या बताऊँ कि कितना चुभता है
तुम्हारा ये अनुत्तरित प्रश्न
फिर क्या बताऊँ कि कितना टूटता है
तुम्हारे सवालिया आँखों से मेरा मन। 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 10, 2008)
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बुधवार, 29 जून 2011

259. आत्मीयता के क्षण

आत्मीयता के क्षण

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आत्मीयता के ये क्षण
अनकहे भले ही रह जाए
अनबूझे नहीं रह सकते। 

नहीं-नहीं, यह भ्रम है
निरा भ्रम, कोरी कल्पना
पर नहीं, उन क्षणों को कैसे भ्रम मान लूँ
जहाँ मौन ही मुखरित होकर
सब कुछ कह गया था।  

शाम का धुँधलका
मन के बोझ को और भी बढ़ा देता है
मंज़िलें खो गई हैं, राहें भटक गई हैं
स्वयं नहीं मालूम, जाना कहाँ है। 

क्या यूँ निरुद्देश्य भटकन ही ज़िन्दगी है?
क्या कोई अंत नहीं?
क्या यही अंत है?
क्या कोई हल नहीं?
क्या यही राह है?
कब तक इन अनबूझ पहेलियों से घिरे रहना है?

काश!
आत्मीयता के ये अनकहे क्षण
अनबूझे ही रहते।  

- जेन्नी शबनम (25. 1. 2009)
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मंगलवार, 28 जून 2011

258. नन्ही भिखारिन (पुस्तक - 84)

नन्ही भिखारिन

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यह उसका दर्द है,
पर मेरे बदन में 
क्यों रिसता है?
या खुदा! 
नन्ही-सी जान, कौन-सा गुनाह था उसका?
शब्दों में खामोशी, आँखों में याचना, पर शर्म नही
हर एक के सामने, हाथ पसारती
सौ में से कोई एक कुछ दे जाता
उतने में ही संतुष्ट!
थोड़ा थमकर, गिनकर   
फिर अगली गाड़ी के पास, बढ़ जाती। 
उफ़! 
उसे पीड़ा नही होती?
पर क्यों नही होती?
कहते हैं पिछले जन्म का इस जन्म में 
भुगतता है जीवन
फिर इस जन्म का भुगतना
कब सुख पाएगा जीवन?
मन का धोखा या सब्र की एक ओट
जीने की विवशता
पर मुनासिब भी तो नही अंत। 
कुछ सिक्कों की खनक में, खोया बचपन
फिर भी शांत, जैसे यही नसीब
जीवित हैं, जीना है, नियति है
ख़ुदा का रहम है।  
उफ़!
उसे खुदा पर रोष नही होता?
पर क्यों नही होता?
उसका दर्द उसका संताप, उसकी नियति है
उसका भविष्य उसका वर्तमान, एक ज़ख़्म है। 
यह उसका दर्द है
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?

- जेन्नी शबनम (10. 1. 2009)
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शनिवार, 25 जून 2011

257. बस धड़कनें चलेंगी

बस धड़कनें चलेंगी

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भला ऐसा भी होता है
न जीते बनता है
न कोई रास्ता मिलता है,
साथ चलते तो हैं लेकिन
कुछ दूरी 
बनाए रहना होता है,
मन में 
बहुत कुछ अनबोला रहता है
बहुत कुछ अनजीया रहता है,
मन तो चाहता है
सब कह दें
जो जी चाहता सब कर लें,
कई शर्तें भी साथ होती हैं
जिन्हें मानना अपरिहार्य है
ऐसा भी हो सकता है
न मानो तो अनर्थ हो जाए,
संसार के दाँव-पेंच
मन बहुत घबराता है
बेहतर है
अपने कुआँ के मेढ़क रहो
या अपने चारों तरफ़
काँटों के बाड़ लगा लो,
न कोई आएगा
न कोई भाव उपजेंगे
न मन में कोई कामना जागेगी,
मृत्यु की प्रतीक्षा में
बस धड़कनें चलेंगी। 

- जेन्नी शबनम (जून 20, 2011)
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बुधवार, 22 जून 2011

256. सूरज ने आज ही देखा है मुझे

सूरज ने आज ही देखा है मुझे

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रोज़ ही तो होती है
नयी सुबह
रोज़ ही तो देखती हूँ
सूरज को उगते हुए
पर मन में उमंगें
आज ही क्यों?
शायद पहली बार सूरज ने
आज ही देखा है मुझे। 

अपनी समस्त ऊर्जा
और ऊष्णता से
मुझमें जीवन भर रहा है
अपनी धूप की सेंक से
मेरी नम ज़िन्दगी को
ताज़ा कर रहा है। 

जाने कितने सागर हैं
समाये मुझमें
समस्त संभावनाएँ और सृष्टी की पहचान
दे रहा है
ज़िन्दगी अवसाद नहीं न विरोध है
अद्भूत है
अपनी तेज किरणों से
ज्ञान दे रहा है। 

बस एक अनुकूल पल
और तरंगित हो गया
समस्त जीवन-सत्य
बस एक अनोखा संचार
और उतर गया
सम्पूर्ण शाश्वत-सत्य। 

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2009)
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मंगलवार, 21 जून 2011

255. मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है / meri zindagi palaayan kar rahi hai

मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है

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मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है
या मैं स्व-रचित संसार में सिमट रही हूँ
शायद मैंने भ्रम-जाल रच लिया है
और ख़ुद ही उससे लिपट झुँझला रही हूँ
मेरे हिस्से में प्रेम और जीवन भी है
पर अपना हिस्सा मैं ही गुम कर रही हूँ
वज़ह नहीं न तो कोई इल्ज़ाम है
बस स्वप्नलोक-सी एक दुनिया तलाश रही हूँ
मेरे कई सवाल मुझे बरगलाते हैं
अब सवाल नहीं ख़ुद को ही ख़त्म कर रही हूँ। 

- जेन्नी शबनम (अगस्त 11, 2010)
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meri zindagi palaayan kar rahi hai

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meri zindagi palaayan kar rahi hai
ya main swa-rachit sansaar men simat rahi hun
shaayad maine bhram-jaal rach liya hai
aur khud hi usase lipat jhunjhala rahi hun
mere hisse men prem aur jivan bhi hai
par apna hissa main hi gum kar rahi hun
vazah nahin na to koi ilzaam hai
bas swapnlok-si ek duniya talaash rahi hun
mere kai sawaal mujhe bargaalate hain
ab sawaal nahin khud ko hi khatm kar rahi hun.

- jenny shabnam (august11, 2010)
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सोमवार, 20 जून 2011

254. मेरे मीत

मेरे मीत

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देखती हूँ तुम्हें
चाँद की काया पर
हर रोज़ जब भी चाहा कि देखूँ तुम्हें
पाया है तुम्हें
चाँद के सीने पर। 

तुम मेरे हो और मेरे ईश भी
तुम मेरे हो और मेरे मीत भी
तुम्हारी छवि में मैंने खुदा को है पाया
तुम्हारी छवि में मैंने खुद को है पाया। 

कभी चाँद के दामन से
कुछ रौशनी उधार माँग लाई थी
और उससे तुम्हारी तस्वीर
उकेर दी थी चाँद पर
जब जी चाहता है मिलूँ तुमसे
देखती हूँ तुम्हें चाँद की काया पर। 

- जेन्नी शबनम (8 फ़रवरी, 2009)
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बुधवार, 15 जून 2011

253. वो दोषी है

वो दोषी है

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कच्ची उम्र
कच्ची सड़क पर
अपनी समस्त पूँजी
घसीट रही
उसे जाना है सीमा के पार
अकेले रहने
क्योंकि
वो पापी है
वो दोषी है!
छुपा रही है लूटा धन
लपेट रही है अपना बदन
शब्द-वाणों से है छलनी मन
नरभक्षियों ने किया है घायल तन
सगे-संबंधी विवश
मूक ताक रहे सभी निस्तब्ध!
नोच खाया जिसने
उसी ने ठराया दोषी उसे
अब न मिलेगी छाँव
भले कितने ही थके हों पाँव
कोई नहीं है साथ
जिसे कहे मन की बात
हार गई स्वयं अपने से
झुकी आँखें शर्म से!

- जेन्नी शबनम (14. 6. 2011)
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शनिवार, 11 जून 2011

252. हो ही नहीं (क्षणिका)

हो ही नहीं

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कौन जाने सफ़र कब शुरू हो
या कि हो ही नहीं
रास्ते तो कहीं जाते नहीं
चलना मेरे नसीब में हो ही नहीं। 

- जेन्नी शबनम (1. 2. 2011)
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