गुरुवार, 1 जून 2017

547. मर गई गुड़िया

मर गई गुड़िया  

*******  

गुड़ियों के साथ खेलती थी गुड़िया  
ता-ता थइया नाचती थी गुड़िया  
ता ले ग म, ता ले ग म गाती थी गुड़िया  
क ख ग घ पढ़ती थी गुड़िया  
तितली-सी उड़ती थी गुड़िया 

ना-ना ये नही है मेरी गुड़िया  
इसके तो पंख है नुचे  
कोमल चेहरे पर ज़ख़्म भरे  
सारे बदन से रक्त यूँ है रिसता  
ज्यों छेनी-हथौड़ी से कोई पत्थर है कटा   

गुड़िया के हाथों में अब भी है गुड़िया  
जाने कितनी चीख़ी होगी गुड़िया  
हर प्रहार पर माँ-माँ पुकारी होगी गुड़िया  
तड़प-तड़पकर मर गई गुड़िया  
कहाँ जानती होगी स्त्री का मतलब गुड़िया   

जिन दानवों ने गुड़िया को नोच खाया  
पौरुष दम्भ से सरेआम हुंकार रहा  
दूसरी गुड़िया को तलाश रहा  
अख़बार के एक कोने में ख़बर छपी  
एक और गुड़िया हवस के नाम चढ़ी    

मूक लाचार बनी न्याय व्यवस्था  
सबूत गवाह सब अकेली थी गुड़िया  
जाने किस ईश का शाप मिला  
कैसे किसी ईश का मन न पसीजा  
छलनी हुआ माँ बाप का सीना   

जाने कहाँ उड़ गई है मेरी गुड़िया  
वापस अब नही आएगी गुड़िया  
ना-ना अब नही चाहिए कोई गुड़िया  
जग हँसाई को हम कैसे सहें गुड़िया  
हम भी तुम्हारे पास आ रहे मेरी गुड़िया 

- जेन्नी शबनम (1. 6. 2017)  
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शनिवार, 13 मई 2017

546. तहज़ीब (क्षणिका)

तहज़ीब

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तहज़ीब सीखते-सीखते  
तमीज़ से हँसने का शऊर आ गया  
तमीज़ से रोने का हुनर आ गया  
न आया तो तहज़ीब और तमीज़ से  
ज़िन्दगी जीना नहीं आया।  

- जेन्नी शबनम (13. 5. 2017)
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गुरुवार, 11 मई 2017

545. हमारी माटी (गाँव पर 20 हाइकु)

हमारी माटी    

***  

1.  
किरणें आईं   
खेतों को यूँ जगाती   
जैसे हो माई।  

2.  
सूरज जागा  
पेड़-पौधे मुस्काए  
खिलखिलाए।  

3.  
झुलसा खेत  
उड़ गई चिरैया  
दाना न पानी।  

4.  
दुआ माँगता  
थका-हारा किसान  
नभ ताकता।  

5.  
जादुई रूप  
चहूँ ओर बिखरा  
आँखों में भरो।  

6.  
आसमाँ रोया  
खेतिहर किसान  
संग में रोए।  

7.  
पेड़ हँसते  
बतियाते रहते,  
बूझो तो भाषा?  

8.  
बहती हवा  
करे अठखेलियाँ  
नाचें पत्तियाँ।  

9.  
पास बुलाती  
प्रकृति है रिझाती  
प्रवासी मन।  

10.  
पाँव रोकती,  
बिछुड़ी थी कबसे  
हमारी माटी।  

11.  
चाँद उतरा  
चाँदनी में नहाई  
सभी मड़ई।  

12.  
बुढ़िया बैठी  
ओसारे पर धूप  
क़िस्सा सुनाती।  

13.  
हरी सब्ज़ियाँ  
मचान पे लटकी  
झूला झूलती।  

14.  
आम्र मंजरी  
पेड़ों पर खिलके  
मन लुभाए।  

15.  
गिरा टिकोला  
खट्टा-मीठा-ठिगना  
मन टिके ना।  

16.  
रवि हारता  
गरमी हर लेती  
ठण्डी बयार।  

17.  
गप्पें मारती  
पूरबा दिनभर   
गाछी पे बैठी।  

18.  
बुढ़िया दादी  
टाट में से झाँकती  
धूप बुलाती।  

19.  
गाँव का चौक  
जगमग करता  
मानो शहर।  

20.  
धूल उड़ाती  
पशुओं की क़तार  
गोधूली वेला।  

-जेन्नी शबनम (11.5.2017)  
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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

544. सुख-दुःख जुटाया है (क्षणिका)

सुख-दुःख जुटाया है  

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तिनका-तिनका जोड़कर सुख-दुःख जुटाया है  
सुख कभी-कभी झाँककर   
अपने होने का एहसास कराता है   
दुःख सोचता है कभी तो मैं भूलूँ उसे   
ज़रा देर वो आराम करे 
मेरे मायके वाली टिन की पेटी में

- जेन्नी शबनम (24. 4. 2017)
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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

543. एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में (तुकांत)

एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में

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तन्हा रहे ताउम्र अपनों की भीड़ में  
एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में  

वक़्त के आइने में दिखा ये तमाशा
ख़ुद को निहारा पर दिखे न भीड़ में  

एक अनदेखी ज़ंजीर से बँधा है मन
तड़पे है पर लहू रिसता नहीं पीर में  

शानों शौक़त की लम्बी फ़ेहरिस्त है
साँस-साँस क़र्ज़दार गिनती मगर अमीर में  

रूबरू होने से कतराता है मन
जंग देख न ले जग मुझमें औ ज़मीर में  

पहचान भी मिटी सब अपने भी रूठे
पर ज़िन्दगी रुकी रही कफ़स के नजीर में  

बसर तो हुई मगर कैसी ये ज़िन्दगी
हँसते रहे डूब के आँखों के नीर में  

सफ़र की नादानियाँ कहती किसे 'शब'
कमबख़्त उलझी ज़िन्दगी अपने शरीर में  

- जेन्नी शबनम (17. 4. 2017)
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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

542. विकल्प (क्षणिका)

विकल्प  

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मेरे पास कोई विकल्प नहीं  
मैं हर किसी की विकल्प हूँ   
कामवाली, सफ़ाईवाली, रसोईया छुट्टी पर 
पशु को खिलानेवाला, चौकीदार छुट्टी पर 
तो मैं इन सभी की विकल्प बनती हूँ   
पर, मैं विकल्पहीन हूँ    
काश! मेरा भी कोई विकल्प हो  
एक दिन ही सही मैं छुट्टी पर जाऊँ   

- जेन्नी शबनम (1. 4. 2017)  
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शुक्रवार, 24 मार्च 2017

541. साथ-साथ

साथ-साथ 

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तुम्हारा साथ  
जैसे बंजर ज़मीन में फूल खिलना  
जैसे रेगिस्तान में जल का स्रोत फूटना।  
अकसर सोचती हूँ  
तुममें कितनी ज़िन्दगी बसती है  
बार-बार मुझे वापस खींच लाते हो ज़िन्दगी में  
मेरे घर मेरे बच्चे  
सब से विमुख होती जा रही थी  
ख़ुद का जीना भूल रही थी।  
उम्र की इस ढलान पर  
जब सब साथ छोड़ जाते है  
न तुमने हाथ छुड़ाया  
न तुम ज़िन्दगी से गए  
तुमने ही दूरी पार की  
जब लगा कि 
इस दूरी से मैं खंडहर बन जाऊँगी।   
तुमने मेरे जज़्बातों को ज़मीन दी  
और उड़ने का हौसला दिया  
देखो मैं उड़ रही हूँ  
जी रही हूँ!  
तुम पास रहो या दूर रहो  
साथ-साथ रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना।   

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2017)  
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मंगलवार, 21 मार्च 2017

540. नीयत और नियति

नीयत और नियति  

***  

नीयत और नियति समझ से परे है
एक झटके में सब बदल देती है  
ज़िन्दगी अवाक्! 
 
काँधे पर हाथ धरे चलते-चलते  
पीठ में गहरी चुभन  
अनदेखे लहू का फ़व्वारा  
काँधे पर का हाथ काँपता तक नहीं  
ज़िन्दगी हतप्रभ! 
 
सपनों के पीछे दौड़ते-दौड़ते  
जाने कितनी सदियाँ गुज़र जातीं   
पर सपने न मुठ्ठी में, न नींद में  
ज़िन्दगी रुख़्सत! 
 
सुख के अम्बार को देखते-देखते  
चकाचौंध से झिलमिल
दुःख का ग़लीचा, पाँवों के नीचे बिछ जाता  
ज़िन्दगी व्याकुल!  

पहचाने डगर पर  
ठिठकते-ठिठकते क़दम तो बढ़ते  
पर पक्की सड़क गड्ढे में तब्दील हो जाती  
ज़िन्दगी बेबस! 
 
पराए घर को सँवारते-सँवारते  
उम्र की डोर छूट जाती  
रिश्ते बेमानी हो जाते  
हर कोने में मौजूद रहकर 
हर एक इंच दूसरों का  
पराया घर, पराया ही रह जाता  
ज़िन्दगी विफल! 
 
बड़ी लम्बी कहानी सुनते-सुनते  
हर कोई भाग खड़ा होता  
अपना-पराया कोई नहीं  
मन की बात मन तक  
साँसों की गिनती थमती नहीं  
ज़िन्दगी बेदम!
  
नीयत और नियति के चक्र में  
लहूलुहान मन 
ज़िन्दगी कब तक?

-जेन्नी शबनम (21.3.2017)  
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शनिवार, 18 मार्च 2017

539. रेगिस्तान

रेगिस्तान

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मुमकिन है यह उम्र  
रेगिस्तान में ही चुक जाए  
कोई न मिले उस जैसा  
जो मेरी हथेलियों पर  
चमकते सितारों वाला  
आसमान उतार दे।   

यह भी मुमकिन है  
एक और रेगिस्तान  
सदियों-सदियों से  
बाँह पसारे मेरे लिए बैठा हो  
जिसकी हठीली ज़मीन पर  
मैं ख़ुशबू के ढाई बोल उगा दूँ।   

कुछ भी हो सकता है  
अनदेखा अनचाहा  
अनकहा अनसुना  
या यह भी कि तमाम ज़माने के सामने  
धड़धड़ाता हुआ कँटीला मौसम आए  
और मेरे पेशानी से लिपट जाए।  

यह भी तो मुमकिन है  
मैं रेगिस्तान से याराना कर लूँ  
शबो-सहर उसके नाम गुनगुनाऊँ  
साथ जीने मरने की कस्में खाऊँ  
और एक दूसरे के माथे पर  
अपने लहू से ज़िन्दगी लिख दूँ।   

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2017)
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सोमवार, 13 मार्च 2017

538. जागा फागुन (होली के 10 हाइकु)

जागा फागुन 

***  

1.  
होली कहती-  
खेलो रंग गुलाल  
भूलो मलाल   

2.  
जागा फागुन  
एक साल के बाद,  
खिलखिलाता   

3.  
सब हैं रँगे  
फूल, तितली, भौंरे  
होली के रंग   

4.  
खेल तो ली है  
रंग-बिरंगी होली  
रँगा न मन   

5.  
छुपती नहीं  
होली के रंग से भी  
मन की पीर   

6.  
रंग-अबीर  
तन को रँगे, पर  
मन फ़क़ीर  

7.  
रंगीली होली  
इठलाती आई है  
मस्ती छाई है   

8.  
उड़के आता  
तन-मन रँगता  
रंग-गुलाल   

9.  
मुर्झाए रिश्ते  
किसकी राह ताके  
होली बेरंग  

10.  
रंग-अबीर  
फगुनाहट लाया  
मन बौराया   

-जेन्नी शबनम (12.3.2017)
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बुधवार, 1 मार्च 2017

537. हवा बसन्ती (बसन्त ऋतु पर 10 हाइकु) पुस्तक 83,84

हवा बसन्ती  

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1.  
हवा बसन्ती  
लेकर चली आई  
रंग-बहार   

2.  
पीली ओढ़नी  
लगती है सोहणी  
धरा ने ओढ़ी   

3.  
पीली सरसों  
मस्ती में झूम रही,  
आया बसन्त   

4.  
कर शृंगार  
बसन्त ऋतु आई  
जग मोहित   

5.  
कोयल कूकी-  
आओ सखी बसन्त   
साथ में नाचें   

6.  
धूप सुहानी  
छटा है बिखेरती  
झूला झूलती   

7.  
पात झरते,  
जीवन होता यही,  
सन्देश देते   

8.  
विदा हो गया  
ठिठुरता मौसम,  
रुत सुहानी   

9.  
रंग फैलाती  
कूदती-फाँदती ये,  
बसन्ती हवा   

10.  
मधुर तान  
चहूँ ओर छेड़ती  
हवा बसन्ती   

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2017)
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सोमवार, 23 जनवरी 2017

536. मुआ ये जाड़ा (ठंड के हाइकु 10) पुस्तक 82, 83

मुआ ये जाड़ा  

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1.  
रज़ाई बोली-  
जाता क्यों नहीं जाड़ा,
अब मैं थकी   

2.  
फिर क्यों आया  
सबको यूँ कँपाने,  
मुआ ये जाड़ा   

3.  
नींद से भागे
रजाई मे दुबके  
ठंडे सपने   

4.  
सूरज भागा  
थर-थर काँपता,  
माघ का दिन   

5.  
मुँह तो दिखा-  
कोहरा ललकारे,  
सूरज छुपा   

6.  
जाड़ा! तू जा न-  
करती है मिन्नतें,
काँपती हवा   

7.  
रवि से डरा  
दुम दबा के भागा  
अबकी जाड़ा   

8.  
धुंध की शाल  
धरती ओढ़े रही  
दिन व रात   

9.  
सबको देती  
ले के मुट्ठी में धूप,  
ठंडी बयार   

10.  
पछुआ हवा  
कुनमुनाती गाती  
सूर्य शर्माता   

- जेन्नी शबनम (23. 1. 2017)  
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सोमवार, 16 जनवरी 2017

535. तुम भी न बस कमाल हो

तुम भी न बस कमाल हो  

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धत्त!
तुम भी न बस कमाल हो!  
न सोचते न विचारते  
सीधे-सीधे कह देते  
जो भी मन में आए  
चाहे प्रेम या गुस्सा  
और नाराज़ भी तो बिना बात ही होते हो  
जबकि जानते हो  
मनाना भी तुम्हें ही पड़ेगा  
और ये भी कि  
हमारी ज़िन्दगी का दायरा  
बस तुम तक  
और तुम्हारा बस मुझ तक  
फिर भी अटपटा लगता है  
जब सबके सामने  
तुम कुछ भी कह देते हो  
तुम भी न बस कमाल हो!  

- जेन्नी शबनम (16. 1. 2017)
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रविवार, 1 जनवरी 2017

534. जीवन को साकार करें (क्षणिका)

जीवन को साकार करें 

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अति बुरी होती है  
साँसों की हो या संयम की  
विचलन की हो या विभोर की  
प्रेम की हो या परित्याग की  
जीवन सहज, निरंतर और मंगल है  
अतियों का त्यागकर, सीमित को अपनाकर  
जीवन के लय में बहकर  
जीवन का सत्कार करें, जीवन को साकार करें  

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2017)
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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

533. जग में क्या रहता है (9 माहिया)

जग में क्या रहता है  
(9 माहिया)

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1.  
जीवन ये कहता है  
काहे का झगड़ा  
जग में क्या रहता है!  

2.  
तुम कहते हो ऐसे  
प्रेम नहीं मुझको  
फिर साथ रही कैसे!  

3.  
मेरा मौन न समझे  
कैसे बतलाऊँ  
मैं टूट रही कबसे!  

4.  
तुम सब कुछ जीवन में  
मिल न सकूँ फिर भी  
रहते मेरे मन में!  

5.  
मुझसे सब छूट रहा  
उम्र ढली अब तो  
जीवन भी टूट रहा!  

6.  
रिश्ते कब चलते यूँ  
शिकवे बहुत रहे  
नाते जब जलते यूँ!  

7.  
सपना जो टूटा है  
अँधियारा दिखता  
अपना जो रूठा है!  

8.  
दुनिया का कहना है  
सुख-दुख जीवन है  
सबको ही बहना है!  

9.  
कहती रो के धरती  
न उजाड़ो मुझको  
मैं निर्वसना मरती!  

- जेन्नी शबनम (6. 12. 2016)  

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रविवार, 27 नवंबर 2016

532. मानव-नाग

मानव-नाग  
 
*** 

सुनो! अगर सुन सको    
ओ मानव केंचुल में छुपे नाग!
   
डसने की आज़ादी मिल गई तुम्हें   
पर जीत ही जाओगे 
यह भ्रम क्यों? 
केंचुल की ओट में छुपकर   
नाग जाति का अपमान क्यों करते हो?  
नाग बेवजह नहीं डसता 
पर तुम?
  
धोखे से कब तक धोखा दोगे   
बिल से बाहर आकर पृथक होना होगा   
छोड़ना होगा केंचुल तुम्हें   
कौन नाग, कौन मानव   
किसका केंचुल, किसका तन   
बीन बजाता संसार सारा   
वक़्त के खेल में सब हारा। 
   
ओ मानव-नाग!
कब तक बच पाओगे?   
नियति से आख़िर हार जाओगे   
समय रहते मानव बन जाओ   
अन्यथा वह होगा, जो होता है 
ज़हरीले नाग का अन्त   
सदैव क्रूर होता है।

-जेन्नी शबनम (27.11.2016)
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सोमवार, 14 नवंबर 2016

531. बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज

*******   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,  
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

देस परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

जाने कितने ख़्वाब सँजोता    
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से ख़ुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2016) 
(बाल दिवस)  
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शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

530. पुकार (क्षणिका)

पुकार

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हाँ! मुझे मालूम है  
एक दिन तुम याद करोगे  
मुझे पुकारोगे पर मैं नहीं आऊँगी  
चाहकर भी न आ पाऊँगी  
इसलिए जब तक हूँ क़रीब रहो
ताकि उस पुकार में ग्लानि न हो  
महज़ दूरी का गम हो

- जेन्नी शबनम (4. 11. 2016)
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बुधवार, 14 सितंबर 2016

529. हिन्दी खिलेगी (हिन्दी दिवस पर 9 हाइकु)

हिन्दी खिलेगी

***   

1.   
मन की बात   
कह पाएँ सबसे   
हिन्दी के साथ।   

2.   
हिन्दी रूठी है   
अँग्रेज़ी मातृभाषा   
बन ऐंठी है।   

3.   
सपना दिखा   
हिन्दी अब भी रोती   
आज़ादी बाद।   

4.   
हिन्दी की बोली   
मात खाती रहती   
पढ़े लिखों से।   

5.   
हिन्दी दिवस   
एक दिन का जश्न   
फिर अँधेरा।   

6.   
हमारी हिन्दी   
हमारा अभिमान   
सब दो मान।   

7.   
है इन्क़िलाब     
सब जुट जाएँ तो   
हिन्दी की शान।   

8.   
हिन्दी हँसती   
राजभाषा तो बनी,   
कहने भर।   

9.   
सुबह होगी   
देश के ललाट पे   
हिन्दी खिलेगी।   

-जेन्नी शबनम (14.9.2016)
(हिन्दी दिवस) 
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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

528. देर कर दी

देर कर दी   

*******   

हाँ! देर कर दी मैंने   
हर उस काम में जो मैं कर सकती थी   
दूसरों की नज़रों में ख़ुद को ढालते-ढालते
सबकी नज़रों से छुपाकर   
अपने सारे हुनर दराज़ में बटोरकर रख दी   
दुनियादारी से फ़ुर्सत पाकर   
करूँगी कभी मन का।

अंतत: अब   
मैं फ़िजूल साबित हो गई
रिश्ते सहेजते-सहेजते ख़ुद बिखर गई
साबुत कुछ नहीं बचा
न रिश्ते न मैं न मेरे हुनर।

मेरे सारे हुनर   
चीख़ते-चीख़ते दम तोड़ गए  
बस एक दो जो बचे हैं   
उखड़ी-उखड़ी साँसें ले रहे हैं   
मर गए सारे हुनर के क़त्ल का
इल्ज़ाम मुझको दे रहे है
मेरे क़ातिल बन जाने का सबब
वे मुझसे पूछ रहे हैं।

हाँ! बहुत देर कर दी मैंने
दुनिया को समझने में
ख़ुद को बटोरने में
अर्धजीवित हुनर को बचाने में।   

हाँ! देर तो हो गई
पर सुबह का सूरज
अपनी आँच मुझे दे रहा है
अँधेरों की भीड़ से खींचकर मुझे
उजाला दे रहा है।

हाँ! देर तो हो गई मुझसे
पर अब न होगी   
नहीं बचा वक़्त मेरे पास अब
जो भी बच सका है रिश्ते या हुनर   
सबको एक नई उम्र दूँगी   
हाँ! अब देर न करूँगी।   

- जेन्नी शबनम (9. 9. 2016)
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बुधवार, 31 अगस्त 2016

527. शबनम (तुकांत)

शबनम   

*******   

रात चाँदनी में पिघलकर   
यूँ मिटी शबनम   
सहर को ये ख़बर नहीं थी   
कब मिटी शबनम।    

दर्द की मिट्टी का घर   
फूलों से सँवरा   
दर्द को ढकती रही पर   
दर्द बनी शबनम।     

अपनों के शहर में   
है कोई अपना नहीं   
ठुकराया आसमाँ और   
उफ़ कही शबनम।     

चाँद तारों के नगर में   
हुई जो तकरार   
आसमान से टूटकर   
तब ही गिरी शबनम।     

शब व सहर की दौड़ से   
थकी तो बहुत मगर   
वक़्त के साथ चली   
अब भी है वही शबनम।     

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2016)   
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

526. प्रलय (क्षणिका)

प्रलय   

*******   
नहीं मालूम कौन ले गया रोटी और सपनों को   
सिरहाने की नींद और तन के ठौर को   
राह दिखाते ध्रुव तारे और दिन के उजाले को    
मन की छाँव और अपनों के गाँव को,    
धधकती धरती और दहकता सूरज   
बौखलाई नदी और चीखता मौसम 
बाट जोह रहा है, मेरे पिघलने और बिखरने का   
मैं ढहूँ तो एक बात हो, मैं मिटूँ तो कोई बात हो। 

- जेन्नी शबनम (24. 8. 2016)   
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